Saturday, January 30, 2016

अकेला मोदी और दुश्मन हजार :- नरेन्द्र मोदी का नाम ही दुश्मनों के होश उड़ाने को काफी हैं | लेकिन जबसे मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने हैं | तब से दुश्मनों की संख्या दिन दुगनी बढती ही जा रही है.इन दुश्मनों की कतार में आप दुश्मन देश पाकिस्तान के साथ-साथ लश्कर, ISIS जैसे कई आतंकी संगठनों और भारत के अधिकांश राजीनीतिक दल जैसे कांग्रेस, राजद, जदयू, सपा, कजरी गैंग्स, वामपंथी दलों को भी रख सकते हैं |

मित्रों, नरेन्द्र मोदी एक एैसा व्यक्तित्व है, जिसकी सोच ही देश की शक्ति और विकास से शुरू होता है | यह व्यक्ति अपने परिवार को देश नहीं, बल्कि समूचे देश को ही अपना परिवार मान रहा है | देश की उन्नति के लिए दी रात एक कर देने वाला ये नेता आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की खो चुकी ख्याति को पुनः प्रतिष्ठित कर चुका है | हाँ, इस व्यक्ति से आतंकी सोच वाले मुसलमानो की जरुर सुलगने लगती है, क्यूकि आतंकी सोच के मुस्लिमों के लिए मोदी का नाम एक काल के समान है |

अगर बीते हुए एक वर्ष में मोदी के क्रिया कलापों को देखा जाए तो उसके दुश्मनों के शब्दों में मोदी ने खूब विदेश दौरा किया है, लेकिन आप भारत के औद्योगिक प्रगति के गति को देखिए | आज जगह-जगह नई-नई कंपनियों और कारखानों का निवेश, मोदी जी के विदेश दौरों की कहानियाँ सुनाता है |  इन कंपनियों और फैक्टरीयो में रोजगार प्राप्त करने वाले युवा वर्ग मोदी जी की गाथा बताते हैं | देश में जर्जर हो चुके अर्थव्यवस्था होते हुए भी वैश्विक मंदी की छाया से देश को उबार लेना उनकी सफलता बताता है | अभी तो तीन वर्ष और बचे हैं, जिस तरह मोदी जी के कार्य करने की गति है, एक वर्ष के बाद तो उनके विरोधियों को भी मोदी जी के विरोध के लिए कोई कारण ही नहीं मिलेगा | अब निकम्मे लोगो को ये कहते हुए आप जरुर सुनिएगा कि मेरे खाते में पंद्रह लाख क्यूँ नहीं आए ? तो निकम्मों, कभी पन्द्रह सौ रूपये तो मेहनत से कमा के देख लो, फ्री का देने के लिए केजरीवाल है न ?

आज हम सब ये देखते होंगे कि देश में ही मौजूद राजनितिक दल मोदी जी के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं | उनका मुख्य उद्देश्य मोदी जी को देश की विकासवादी सोच से भटकाना है | वो चाहते हैं कि देश सामाजिक उलझनों और आपसी लडाई में ही फंसा रह जाए | वो चाहते हैं कि देश में अस्थिरता का माहौल बना रहे ताकि वो अपनी राजनीती रोटिया सेंकते रहें | लेकिन मोदी जी भी आखिर मोदी जी ही हैं | जब उन्होंने 2002 में अपने हर तरह के दुश्मनों को छठी का दूध याद करा दिया तो अभी तो सारा देश उनके साथ है सिवाय आतंकी सोच के जमात को छोड़कर | अकेला मोदी इन सारे दुश्मनों के हर प्रहार को झेलने को हर पल तैयार है और साथ में तैयार है मोदी जी की हम राष्ट्रवादी नौजवानों की एक लम्बी चौड़ी फ़ौज, जिनकी सोच राष्ट्र से शुरू होकर राष्ट्र को ही समर्पित हो जाती है | हम भी मोदी जी के हर दुश्मनों को लतियाने को तैयार है | अब कोई ये न कहे की बिहार और दिल्ली में मोदी जी को जनता ने क्यू नकार दिया ? वहाँ हार का भाजपा का स्वयं का अनेक कारण है | मोदी एक, लेकिन दुश्मन अनेक पर सारा देश आज ही मोदी के साथ है और 2025 तक मोदीमय ही होगा अपना भारत |

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Saturday, January 23, 2016

पत्रकारिता करते हुये भी पत्रकार बने रहने की चुनौती..,......!!!!???

पत्रकारिता मीडिया में तब्दील हो जाये। मीडिया माध्यम माना जाने लगे। माध्यम सत्ता का सबसे बेहतरीन हथियार हो जाये। तो मीडिया का उपयोग करेगा कौन और सत्ता से सौदेबाजी के लिये मीडिया का प्रयोग होगा कैसे? जाहिर है 2016 में बहुत ही पारदर्शिता के साथ यह चुनौती पत्रकारिता करने वालेमीडियाकर्मियों के सामने आने वाली है। चुनौती इसलिये नहीं क्योकि पत्रकारिता अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य है । बल्कि चुनौती इसलिये क्योंकि राजनीतिक सत्ता खुद को राज्य मानने लगी है। संस्थानों के राजनीतिकरण को राज्य की जरुरत करार देने लगी है। चुनावी जीत को संविधान से उपर मानने लगी है। यानी पहली बार संविधान के दायरे में लोकतंत्र का गीत राजनीतिक सत्ता के लोकतंत्रिक राग के सामने बेमानी साबित हो रहा है। जाहिर है ऐसे में हर वह प्रभावी खिलाडी मीडिया को अपने अनुकूल बनाने की मशक्कत करने लगा है जिसे अपने दायरे में सत्ता का सुकून चाहिये। और सत्ता को जहा लगे कि वह कमजोर हो रही है तो मीडिया से नहीं बल्कि मीडिया को माध्यम की तरह संभाले प्रभावी खिलाडियो से ही सीधे सौदा हो जाये। कह सकते है कि सबकुछ इतना सरल नहीं है। और जो खतरे पत्रकारिता को लेकर लगातार बढ़ रहे है उसमें बहुत कुछ मीडिया मीडियाकर्मियों की अपनी समझ पर भी निर्भर करता है। लेकिन 2016 में यह सवाल और छोटा हो जायेगा कि पत्रकारिता की किस लिये जा रही है। जो रिपोर्ट छापी जा रही है उसका महत्व क्या है। इसकी बारीकी को समझे तो जैसे खनिज संपदा की लूट के लिये आदिवासियों के साथ शहर के संवाद ही खत्म कर दिये गये और विकास की परिभाषा यह कहकर गढ़ी गई कि इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिये खनिज संपदा से लेकर आदिवासियों तक की सफाई जरुरी है। उसके बाद खेती की जमीन को भी निगलने के लिये पहले स्पेशल इक्नामी जोन, उसके बाद इक्नामिक कारीडोर और स्मार्ट शहर से लेकर अब आदर्श गांव तक की सोच ही इस तरह पैदा की जा रही है जहां खेती की जमीन पर खडे होते कंक्रीट को ही आदर्श हालात मान लिया जाये। यानी देश की उस सोच को ही माध्यमो के जरिये बदल दिया जाये जो अपने अपने दायरे में सत्ता है तो फिर देश की परिभाषा भी राजनीतिक सत्ता के अनुकूल

गढने की कवायद आसानी से हो सकती है ।

और बहस की गुंजाइश ही नहीं बचती कि कोई रास्ता गांव का भी था । देश में आदिवासी भी रहते थे । रिपोर्ट शहरों के बढने पर तैयार होगी ना कि बढते शहरी गरीबों की वजहो को लेकर । यानी झटके में विकल्प की वह सोच ही मीडिया से गायब हो रही है जो सत्ता ही नहीं बल्कि संसद और विकास की नीतियो को लेकर कारपोरेट फार्मूले पर भी सवाल खड़ा करती रही है। इसमें और तेजी आ रही है क्योंकि बहुसंख्यक तबके के लिये नीति का मतलब नीति लागू कराने वालो की एक सोच हो चली है। ना कि जिनके लिये नीतियां बनायी जाती है उनकी कोई जरुरत या उनकी कोई सोच कोई मायने भी रखती हो। इतना ही नहीं राजनीतिक सत्ता जिस तरह हर संस्थान को अपनी गिरफ्त में ले रही है, उसका असर कैसे मीडिया के माध्यम में तब्दील होने पर हो रहा है उसका बेहतरीन उदाहरण बिहार चुनाव के परिणाम के बाद लालू यादव की राजनीतिक ताकत से बने नीतिश मंत्रिमंडल का चेहरा है। सवाल यह नहीं है कि कानून के जरीये राजनीतिक तौर पर खारिज लालू यादव उस सामाजिक समीकरण को जीवित कर देते है जो दिल्ली की सत्ता के विकास मॉडल को खारिज कर दें। बल्कि सवाल यह है कि जिस मॉडल को राजनीतिक सत्ता तले दिल्ली सही बताती है और 2014 का जनादेश किसी सपने की तरह पांरपरिक राजनीति को हाशिये पर ढकेल देता है वही मॉडल उसी बिहार में 2015 के जनादेश तले हाशिये पर चला जाता है और वहीं पारपरिक राजनीति फिर से ना बदलने वाली हकीकत की तरह सामने आ जाती है। और झटके में यह सवाल बडा हो जाता कि इस दौर में पत्रकारिता किस समझ को जी रही थी। या मीडिया की भूमिका रही क्या । यानी 2014-15 का पाठ तो यही निकला कि राजनीतिक सत्ता की जो दिशा होगी उसी हवा में मीडिया बहेगी। राजनीतिक सत्ता का सामाजिक मतलब चुनावी जीत-हार होगी। मीडिया का विश्लेषण भी उसी दिशा में होगा। यानी पत्रकारिता अगर 2015 में उन सवालो से बचती रही कि आखिर जो सीबीआई चार बरस तक अमित शाह को अपराधी मान कर फाइले तैयार करती रही तो फाइले मोदी की पीएम बनते ही बंद ही नहीं हुई बल्कि उसमें लिखा भी बदल गया ।

और 2015 के बिहार जनादेश ने बाद पत्रकारिता इस सवाल पर भी खामोश हो गई कि आखिर वह कौन से सामाजिक समीकरण रहे जो विकास के नाम पर गरीबी को विस्तार भी देते रहे और सामाजिक न्याय का नारा लगाते हुये विकास को दरकिनार भी करते रहे । यह सवाल भी गौण हो गया कि गांव खेत में शिक्षा का नायाब प्रयोग 25 बरस पहले चरवाहा विघालय के नाम पर विधानसभा से निकला। 25 बरस बाद वही चरवाहा विघालय विधानसभा के भीतर नजर आने लगा। यहा सवाल यह उठ सकता है कि क्या राजनीतिक सत्ता के दायरे में ही मीडिया की महत्ता है । जाहिर है यह सवाल वाकई बडा है कि राजनीतिक सत्ता से इतर मीडिया कैसे काम करें । पत्रकारिता कैसी हो । क्योकि पत्रकारिता अगर देश के हर तबके को देख समझ रही है । यानी सत्ता के वोट बैंक से इतर विपक्ष की सोच को भी अगर आंक रही है तो यह सवाल व्यापक दायरे में देखा समझा जा सकता है कि क्या देश में हर सत्ता का दायरा अल्पसंख्यक सरीका ही है । राजनीतिक सत्ता के पक्ष में 50 फिसदी वोट नहीं है तो कारपोरेट पूंजी के मुनाफा बनाने के तौर तरीको के पक्ष में देश का बहुसंख्यक तबका नहीं है ।औघोगिक घरानो की जीने के अंदाज या उनके जरीये देश के संसाधनों के उपयोग से देश की नब्बे फिसदी आबादी का कोई वास्ता नहीं है। फिर ऐसा भी नहीं है कि संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में देश के बहुसंख्यक तबके के हित साधे जा रहे हो । निचली अदालत से निकल कर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक तो देश का वही तबका पहुंच पाता है जिसकी आय देश की 80 फिसदी आबादी से उपर हो। स्वास्थय सेवा हो या शिक्षा देने के संस्थान। देश के 80 करोड वोटरो के लिये वह आज भी नहीं है । और इसी दायरे को अगर मीडिया घरानो में समेटा जाये तो उसके सरोकार भी देश के अस्सी फिसद आबादी से इतर ही नजर आयेंगे। यानी पहली बार लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी लोकतंत्र के बाकि तीन खम्मो की कतार में उसी तरह खड़ा किया जा रहा है जिसमें लोकतंत्र का राग सत्ता की आवाज में सुनायी दे। और मीडिया लोकतंत्र के राग को सत्ता के दायरे से बाहर होकर कैसे सुन सकता है। पत्रकारिता राज्यसत्ता के प्रभाव से कैसे मुक्त हो सकती है । भारत जैसे देश को चलाने के लिये पूंजी से ज्यादा मानव संसाधन को तरजीह दी जानी चाहिये यह सवाल कैसे कोई रिपोर्ट उठा सकती है। जबकि खुद मीडिया घरानों का विकास पूंजी पर जा टिका है। और बतौर माध्यम अगर सत्ता अपना प्यादा मीडिया को बना रही है तो मीडिया घरानो के लिये भी पूंजी ही माध्यम को मजबूत बनाने का माध्यम बन चुका है । यानी 2014 के चुनाव के बाद से हर चुनाव ही कैसे सत्ता और लोकतंत्र का एसिड टेस्ट बनाया गया या बनाया जा रहा है उसे मीडिया क्या समझ नहीं पा रहा है। यकीनन पत्रकारिता उन हालातों को देख रही है कि कैसे सारी ताकत राजनीतिक सत्ता में सिमट रही है। लेकिन राजनीतिक सत्ता ही लोकतंत्र हो और वहीं पूंजी का माध्यम बन जाये तो फिर मीडिया के सामने कैसे चुनौती होगी इसे महसूस करना भी आने वाले बरसों में
मुश्किल होगा । मसलन सलमान खान की गाड़ी तले फुटपाथ पर सोये शख्स को किसने मारा । इसका जबाब हाईकोर्ट के फैसले में दिखायी नहीं देता बल्कि सलमान खान की रिहाई के जश्न में मीडिया को जाता है। क्योंकि सलमान खान के फैन्स ही फैसले के बाद जनता के किरदार में नजर आते हैं। यानी पहली बार मीडिया के सामने यह भी चुनौती उभर रही है कि सूचना तकनीक के माध्यम से बनते और व्यापक होते समाज को वह कैसे सही या गलत माने। मसलन एक वक्त इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को अपनी जेबी पार्टी बनाने के लिये कांग्रेस के संगठन के बाहर से ही इतना दबाव बना दिया कि काग्रेस संगठन भी समझ नहीं पाया कि वह सही है या बाहर से दिरा के पक्ष में खड़ा होता समूह सही है । कमोवेश यही प्रयोग नरेन्द्र मोदी ने भी किया। बीजेपी संगठन के बाहर से मोदी फैन्स का दबाब ही कुछ ऐसा बना कि बीजेपी संगठन को भी सारे निर्णय मोदी के अनुकूल लेने पड़े। ध्यान दे तो पारंपरिक मीडिया भी कुछ इसी तर्ज पर सोशल मीडिया के दबाब में है। दादरी से लेकर मालदा की घटना को लेकर सोशल मीडिया के दबाब में यह सवाल भी खडे होने लगे कि जिम्मेदारी मुक्त सोशल मीडिया कही ज्यादा जिम्मेदार है। यानी समाचार पत्र या न्यूज चैनलों की पत्रकारिता संदेह के घेरे में आ गई। हर किसी पर राजनीतिक प्यादा बनकर काम करने का आरोप सोशल मीडिया में लगने लगा। यानी पहली बार पत्रकारों के
सामने चुनौती उस खुलेपन की सूचना को लेकर भी है, जो झटके में किसी भी पत्रकार, किसी भी मीडिया घराने या किसी भी रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक सत्ता से जोड़ कर एक सामानांतर पत्रकारिता की लकीर खींच देती है । यानी पत्रकारिता करते हुये साख बनाने के संघर्ष पर साख पर बट्टा लगाने के
तरीकों से जूझना कही ज्यादा मुश्किल हो चला है । और इसकी बारिकी को समझने के लिये लौटना उसी राजनीतिक गलियारे में पड़ रहा है, जिसकी जरुरत ने ही मीडिया को माध्यम में तब्दील कर अपना हित साधना शुरु किया है । यानी पहली बार मीडिया के सामने तीन चुनौती बेहद साफ है। पहला , चुनावी राजनीति के
दबाब से मुक्त होना। दूसरा, पूंजी के दबाब से मुक्त होना। तीसरा, जन भागेदारी से मीडिया संस्थान को खडा करने की कोशिश करना। यानी यह तीन चुनौती मौजूदा पत्रकारिता के उस संकट को उभारती है, जिसमें मीडिया का घालमेल राजनीति और कारपोरेट पूंजी से कुछ इस तरह हो रहा है जिसमें
पत्रकार राजनीति करने लगा है। राजनेता पत्रकारीय मापदंडों को तय करने लगा है और पूंजी राजनीति और मीडिया दोनो का आधार बन चुकी है । वजह भी यही है कि मौजूदा मीडिया राजनेताओं और उघोगपतियों से इतर कुछ कार्य करता नजर नहीं
आता। और राजनीतिक सत्ता पाने के बाद मीडिया की जरुरत राजनेताओं के लिये किस रुप में रहती है यह इससे भी समझा जा सकता है कि पीएम बनने के बाद से नरेन्द्र मोदी ने कत्र कोई पत्रकार वार्ता नहीं की। नीतीश कुमार ने सीएम बनने के बाद किसी पत्रकार को कोई इंटरव्यू नहीं दिया। वसुधरा राजे
सिंधिया ने सीएम बनने के बाद से कोई प्रेस कान्फ्रेस नहीं की। केजरीवाल ने अपनी राजनीति को ही मीडिया के खिलाफ बनाकर जनता के पैसे पर एक न्यूज चैनल के खिलाफ उन्ही अखबारो पर पन्ने भर का विज्ञापन देने में कोताही नहीं बरती जिन अखबारों को वह कारपोरेट की काली कारतूत की उपज बताते रहे।
यानी मीडिया के अंतर्विरोध। राजनीति सत्ता की अपनी कमजोरी को ताकत में बदलने के लिये मीडिया का उपयोग। और कारपोरेट पूंजी का धंधे के लिये मीडिया का प्रयोग। इन हालातों को बदले के लिये कौन सा तरीका कैसे और किस रुप में उठाया जाये। यह समझ पैदा करनी होगी । अन्यथा पत्रकारीय विश्लेषण का दायरा 2016 में बंगाल-असम चुनाव की जीत हार पर टिकेगा। 2017 में यूपी
चुनाव को मोदी का सेमीफाइनल मान लिया जायेगा। और चुनावी जीत हार के दायरे में ही विदेशी निवेश या स्वदेशी पर चर्चा होगी। मंदिर तले हिन्दू राष्ट्र तो विकास तले आर्थिक सुधार पर बहस होगी। और देश के वह सवाल हाशिये पर चले जायेंगे जिसे चुनावी दौर में भावनाओ के उभार के लिये उठाये
तो जाते है लेकिन सत्ता में आने के बाद भुला दिये जाते हैं। शायद मीडिया के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह देश में राजनीतिक सत्ता की बिसात के तरीके बदल दें। क्योंकि तमाम मुद्दो के बीच देश के हर क्षेत्र में सवाल न्याय ना मिलने का हो चला है। और इंसाफ का सवाल देश के उस अस्सी
फिसद लोगों से जुड़ा है जिनके लिये इंसाफ का मतलब भी रोटी ही है । यानी हर दिन रोटी चाहिये तो हर क्षेत्र में इंसाफ भी चाहिये। हर पल चाहिये । हर दिन चाहिये । और यह सरोकार मीडियाकर्मियों के नहीं रहे । पत्रकार की द्दश्टी पत्रकारिता को तकनीक के आसरे मापने लगी है । इसलिये उसके जहन में
बदलती पत्रकारिता का मतलब 3 जी के बाद 4 जी आना भी हो सकता है । न्यूज चैनलो को अखबार सरीखा बनाना और समाचार पत्र को न्यूज चैनल से सरीखा बना देना भी हो सकता है । लगातार सोशल मीडिया पर खुलती अलग अलग न्यूज पोर्टल
भी हो सकते है । इंटरनेट की तेजी से सूचनाओ के जल्दी पहुंचने या पहुंचाने से भी हो सकता है । इंटरएक्टिविटी के जरीये दर्शक-पाठक के बीच संवाद में तेजी भी ला सकती है और इसे भी पत्रकारिता के नये आयाम से जोडा जा सकता है यह सोच भी पैदा होगी । लेकिन समझना यह भी होगा कि तकनीक पत्रकारिता नहीं
होती । सूचना की तेजी का मतलब मीडिया के सरोकार नहीं होते । और सरोकार या देश की जमीन से संवाद की कमी ने ही पत्रकारिता के माप-दंड बदलने शुरु किये । मनमोहन सिंह के दौर में बडी तादाद में पत्रकार कारपोरेट सेक्टर के लिये काम करने लगे। और उन्होंने भी माना कि जब मीडिया घराने ही कारपोरेट
के कब्जे में जा रहे हैं। या फिर पत्रकारिता का मतलब ही अलग मुनाफा साधना हो चला है तो सीधे कारपोरेट के हित साधने के लिये उसी से क्यों ना जुड़ जाया जाये। वहीं अब यानी मोदी के दौर में सोशल मीडिया की पत्रकारिता ही
महत्वपूर्ण बना दी गई। तो हर नेता को फेसबुक चलाने से लेकर सोशल मीडिया में छा जाने के लिये पत्रकारो की एक फौज चाहिये। सत्ता चलाने वाले हो या सत्ता पाने के लिये संघर्ष करने वाले नेता कमोवेश हर किसी की अपनी अपनी
सोशल साइट्स चल पड़ी हैं। और 2016 बीतते बीतते हर विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र के लिहाज से नेता अपने काम को दिखाने बताने के लिये पोर्टल या साइट्स शुरु कर चुके होंगे। यानी एक तरफ पत्रकारिता का वह मिशन जो सत्ता
पर निगरानी रखते हुये देश के मुद्दों को सतह पर लाये। जिससे अपराध-भ्रष्टाचार या विकास के नाम पर खुद को लाभ पहुंचाने की सत्तधारियों की पहल के खिलाफ सामाजिक दबाब बनाया जा सके। वही दूसरी तरफ सत्ता के
अनुकुल , मुनाफा बनाने की सोच और विकास तले अपराध-भ्रष्ट्रचार को गौण मानकर सत्ताधारियो को देश करार देने की सोच । तो लकीर कही मोटी होगी तो कही इतनी महीन जिसे परखना भी पत्रकारिता हो जायेगी यह किसने सोचा होगा ।
शायद इसीलिये सबसे बडी चुनौती तो यही है मीडिया संस्थानों से जुडकर पत्रकारिता करते हुये भी पत्रकार रहा जाये।

संघ-सरकार के बीच अमित शाह फिर अध्यक्ष ..........!!!!???

जोश-हंगामा, खामोशी-सन्नाटा और उम्मीद । दिल्ली के 11 अशोक रोड पर मौजूद बीजेपी हेडक्वार्टर का यह ऐसा रंग है जो बीते दो बरस से भी कम वक्त में कुछ इस तरह बदलता हुआ नजर आया । जिसने मोदी की चमक तले अमित शाह की ताकत देखी । तो जोश-हंगामा दिखा । फिर सरकार की धूमिल होती चमक तले अमित शाह की अग्निपरीक्षा के वक्त खामोशी और सन्नाटा देखा । और अब एक उम्मीद के आसरे फिर से अमित शाह को ही प्रधानमंत्री मोदी का सबसे भरोसेमंद-जरुरतमंद अध्यक्ष के तौर पर नया कार्यकाल मिलते देखा । तो क्या सबसे बडी सफलता से जो उड़ान बीजेपी को भरनी चाहिये थी वह अमित शाह के दौर में जमीन पर आते आते एक बार फिर बीजेपी को उड़ान देने की उम्मीद में बीजेपी की लगाम उसी जोडी के हवाले कर दी गई है । जिसके आसरे बीजेपी ने 16 मई 2014 को इतिहास रचा था । इतिहास रचने के पीछे मनमोहन सिंह की सत्ता का वह काला दौर थाि जिससे जनता नाखुश थी । लेकिन अब इतिहास संभालने का दौर है जब सत्ता भी

है । सबसे बडा संगठन भी है । सबसे बडी तादाद में पार्टी सदस्य भी है । फिर भी उम्मीद की आस तले भविष्य की हार का भय है। क्योंकि जीत के दौर में चुनावी जीत ही अमित शाह ने पहचान बनायी । और हार के दौर में कौन सी पहचान के साथ अगले तीन बरस तक अमित शाह बीजेपी को हांकेंगे यह सबसे बड़ा सवाल है । क्योंकि अगले तीन बरस तक मोदी का मुखौटा पहन कर ना तो बीजेपी को हांका जा सकता है और ना ही मुखौटे को ढाल बनाकर निशाने पर आने से बचा जा सकता है । तो असल परिक्षा अमित शाह की शुरु हो रही है । जहा संगठन को मथना है । नीचे से उपर तक कार्यकर्ताओं को उसकी ताकत का एहसास करना है और ताकत भी देनी है। दिल्ली की डोर ढीली छोड़ कर क्षेत्रीय नेताओं को उभारना भी है ।

स्वयंसेवकों में आस भी जगानी है और अनुभवी प्रचारकों को उम्र के लिहाज से खारिज भी नहीं करना है । और पहली बार मोदी की ताकत का इस्तेमाल करने की जगह मोदी को सरकार चलाने में ताकत देना है । तो क्या 2015 में दिल्ली और बिहार चुनाव में हार के बाद क्या वाकई अमित शाह के पास कोई ऐसा मंत्र है जो 2016 में बंगाल, असम,तमिलनाडु,केरल तो 2017 में यूपी, पंजाब और गुजरात तक को बचा लें या जीत लें । यह मुश्किल काम इसलिये है क्योंकि देश में पहली बार गुजरात माडल की धूम गुजरात से दिल्ली के क्षितिज पर छाये नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने ही गुनगुनाये । और मोदी के दिल्ली पहुंचते ही गुजरात में ही गुजरात के पाटीदार समाज ने गुजरात माडल को जमीन सूंघा दी । फिर दिल्ली की नई राजनीति और बिहार की पारंपरिक राजनीति के आगे वही बीजेपी हारी ही नहीं बल्कि नतमस्तक दिखी जो वैकल्पिक सपनों के साथ 2014 में इतिहास रच कर जनता की इस उम्मीद को हवा दे चुकी थी कि जाति-धर्म से इतर विकास की राजनीति अब देश में फलेगी-फुलेगी । लेकिन गरीब-पिछडों को ताकत देने के बदले इनकी कमोजरी-बेबसी को ही चुनावी ताकत बनाने की कोशिश इस स्तर पर हुई कि देश को प्रधानमंत्री की जाति के आसरे बीजेपी की चुनावी रणनीति देखने समझने का मौका मिला । लेकिन मुश्किल जीत के इतिहास को सहेजने भर की नहीं है । मुश्किल तो यह है कि उत्तर भारत के राजनीतिक मिजाज की जटिलता और पूर्वी भारत की सासंकृतिक पहचान को भी सिर्फ संगठन के आसरे मथा जा सकता है । क्योंकि पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ र जनीतिक तौर पर सक्रिय होने में गर्व महसूस करने लगा है। पहली बार राजनीतिक सत्ता के करीब स्वयसेवकों में आने की होड़ है क्योंकि सारी ताकत राजनीतिक सत्ता में ही सिमट रही है । पहली बार जनसंघ के दौर से भारतीय राजनीतिक मिजाज के समझने वाले स्वयंसेवक हो या प्रचारक या फिर संघ से निकल कर बीजेपी में आ चुके नेताओं की कतार वह महत्वहीन माने जा रहे हैं। और अनुभवों ने ही जिस तरह राष्ट्रीय स्वयसेवक को विस्तार दिया अब वही संघ सत्ता की अनुकूलता तले अपना विस्तार देख रहा है । यानी सत्ता पर निर्भरता और सत्ता में बने रहने जद्दोजहद के दौर में अमित शाह को दोबारा बीजेपी अध्यक्ष बनाया जा रहा है तो वह अध्य़क्ष की कार्यकुशलता से ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी से निकटता और मोदी की कार्यशौली को समझने का हुनर है । तो सवाल यह भी होगा कि क्या वाकई गुजरात से दिल्ली पहुंचकर मोदी से तालमेल बैठाकर पार्टी चलाने वाले सबसे हुनरमंद अब भी गुजरात से दिल्ली आये अमित शाह ही हैं । और संघ परिवार मौजूदा वक्त सत्ता, सरकार , संगठन , पार्टी हर किसी
के केन्द्र में प्रदानमंत्री मोदी को ही मान रहा है । यानी विचारों के तौर पर जो संघ परिवार जनता से सरोकार बैठाने के लिये सरकार पर बाहर से दबाब बनाता था वह भी वैचारिक तौर पर सत्ता को ही महत्वपूर्ण मान रहा है । तो अगला सवाल है कि क्या विदेशी पूंजी के निवेश के आसरे विकास की सोच । किसानो की जरुरतो को पूरा करने के लिये बीमा और राहत पैकेज । दुनिया में भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार के तौर पर बताने की समझ । संवैधानिक संस्थानों से लेकर न्यायपालिका और राज्यसभा तक की व्याख्या सत्तानुकूल करने की सोच । पड़ोसियों के साथ दूरगामी असर के बदले चौकाने वाले तात्कालिक निर्णय । और इन सबपर आरएसएस की खामोशी और बीजेपी की भी चुप्पी । यानी समाज के भीतर चैक-एंड-बैलेस ही नहीं बल्कि वह तमाम संगठन जो अलग अलग क्षेत्र में काम भी कर रहे है तो फिर उनके होने का मतलब क्या है । और मतलब है तो फिर क्या सत्ता में रहते हुये स्वयंसेवक के पैसले और संघ के स्वयंसेवक के तौर पर स्वदेशी जागरण मंच , किसान संघ, आदिवासी कल्याण संघ , भारतीय मजदूर संघ की सोच भी एक सरीखी मान ली गई या सत्ता बनी रहे इसलिये दबायी जा रही है ।

असल में यह सवाल देश के लिये इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसदीय राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलो की समझ व्यापक होना देश के ही हित में होता है । और बीजेपी के पास संघ परिवार सरीखा ऐसा अनूठा सामाजिक संगठन है जिसके स्वयंसेवक हर मुद्दे पर देश की नब्ज पकडे रहते है । लेकिन सभी एक ही लकीर पर एक ही बिन्दु के इर्द-गिर्द घुमड़ने लगे तो फिर रास्ता चाहे अनचाहे उस मूल को पकड़ेगा जिसके आसरे संघ परिवार बना । यानी हिन्दू राष्ट्र की सोच हर निर्णय के बाद डगमगाते हुये राजनीतिक सत्ता के लिये भी ढाल का काम करेगी और पार्टी के लिये भी हथियार बनेगी । और संघ परिवार सामाजिक सासंकृतिक संगठन होते हुये भी हमेशा राजनीतिक नजर आयेगा या बीजेपी राजनीतिक पार्टी होते हुये भी आरएसएस के राजनीतिक संगठन के तौर पर ही काम कर पायेगी । ध्यान दें तो हो यही रहा है । बीजेपी का अध्यक्ष अमित शाह को दोबारा बनाना चाहिये की नहीं इसपर जलगांव में 6 से 8 जनवरी तक संघ परिवार के प्रमुख स्वयंसेवक ही चिंतन करते है । चिंतन के बाद 17 जनवरी को सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल प्रधानमंत्री मोदी को जानकारी देते है । उनकी राय लेते है । और प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति या इच्छा  मान कर 18 जनवरी को कृष्णगोपाल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलते है , उन्हें खुशखबरी देते है । चुनौतियों का सामना करने में अमित शाह के साथ संघ परिवार भी खड़ा है , इसका भरोसा देते है ।फिर 19 जनवरी को अमित शाह से रुठे मुरली मनोहर जोशी
और लालकृष्ण आडवाणी से मिलते है । जोशी और आडवाणी की तंज भरी खामोशी को अनदेखा करते है । और अनुभवी पीढी को मोदी के सामने चुकी हुई पीढी करार दिये जाने पर संघ परिवार खामोशी बरतता है । और 20 जनवरी को 11 अशोक रोड पर यह सूचना चस्पा कर दी जाती है कि 24 जनवरी को सुबह 10 से दोपहर एक बजे तक अध्यक्ष पद के लिये नामांकन होगा । एक से डेढ बजे तक नाम वापस लेने और जांच का काम होगा । और
जरुरी हुआ तो 25 को चुनाव होगा । यानी समूची कवायद संघ परिवार के आसरे प्रधानमंत्री मोदी को केन्द्र में रखकर अगर बीजेपी अध्यक्ष की जरुरत समझी जाती है तो सवाल तीन है । क्या बीजेपी राजनीतिक दल नहीं बल्कि संघ परिवार का राजनीतिक संगठन मात्र है । क्या मौजूदा राजनीतिक शून्यता में संघ परिवार राजनीतिक हो रहा है ।

क्या राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ हो चुकी है । यानी जिसके पास सत्ता तक पहुंचने या सत्ता पर बने रहने के मंत्र है वहीं सबसे ताकतवर हो चुका है । और उसी अनुकुल समूची कवायद मौजूदा राजनीतिक सच है । अगर हा तो फिर चुनाव जीतने के तरीके अपराध, भ्र्ष्ट्रचार और कालाधन के नैक्सस से कैसे जुडे है इसपर तो नब्बे के दशक में ही वोहरा कमेटी की रिपोर्ट अंगुली उठा चुकी है । यानी देश का रास्ता उसी चुनावी व्यवस्था पर टिक रहा है जिसे ना तो स्टेट्समैन चाहिये । ना ही सामाजिक समानता । ना ही राजनीतिक शुद्दीकरण । और ना ही हिन्दु राष्ट्र । उसे सिर्फ सत्ता चाहिये । और सत्ता की इसी सोच में एक तरफ संघ है तो दूसरी तरफ सरकार और बीच में अमित शाह दुनिया की सबसे बडे राजनीतिक दल के अध्यक्ष । जिनसे निकलेगा क्या इसके लिये 2019 तक इंतजार करना होगा ।

Saturday, January 9, 2016

-पाकिस्तान के भारतबीच एलओसी का सच........!!!!!

लश्कर-ए-तोएबा , जैश-ए मोहमम्द, हिजबुल मुज्जाहिद्दीन ,हरकत-उ मुज्जाहिद्दीन , पाकिसातन तालिबान और इस फेरहिस्त में 19 से ज्यादा और नाम । इन नामो से जुडे दफ्तर की संख्या 127 । जो कि पीओके में नहीं बल्कि कराची, मुल्तान, बहावलपुर, लाहौर और रावलपिडी तक में । जबकि ट्रेनिंग सेंटर मुज्जफराबाद और मीरपुर तक में । यानी पाकिस्तान के एक छोर से दूसरे छोर तक आंतकवादियो की मौजूदगी । भारत के लिये हर नाम आंतक का खौफ पैदा करने वाला लेकिन पाकिस्तान के लिये पाकिस्तान के भीतर आंतक के इन चेहरोपर कोई बंदिश नहीं है । तो सबसे बडा सवाल यही है कि जिस आतंकवाद पर नकेल कसने के लिये भारत पाकिसातन से बार बार बातचीत करता है जब वहीं अपनी जमीन पर आतंक को आतंक नहीं मानता तो पठानकोट हमले के बाद ऐसा माहौल क्यो बनाया गया कि पाकिस्तान पहली बार पठानकोट के दोषियो के खिलाफ कारर्वाई कर रहा है । तो सवाल है कि पहली बार किसी आंतकी हमले को लेकर भारत ने यह दिखला दिया कि पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करें नही तो उसका रुख कडा हो जायेगा । या फिर पठानकोट हमले को ही बातचीत का आधार बनाया जा रहा है । क्योकि मोदी सरकार भी इस सच को समझती है कि भारत के लिये जो आंतकी संगठन है वह पाकिस्तान की राज्यनीति का हिस्सा रहे है । और नवाज शरीफ सरकार भी इस सच को समझ रही है कि आंतकवाद उसके घर में सामाजिक-आर्थिक हालात की उपज भी है और सेना -आईएसआई की पालेसी का हिस्सा भी । तो फिर पठानकोट हमले पर कार्रवाई के साथ वह अपने दाग को छुपा सकती है ।क्योंकि सभी आंतकी संगठनो ने खुलकर कश्मीर को अपने जेहाद का हिस्सा भी बनाया हुआ है । और कश्मीर से हमले निकलकर अब पंजाब के मैदानी हिस्सो में पहुंचे है तो फिर पाकिसातन से बातचीत के दायरे में आंतकवाद और कश्मीर से आगे निकलना दोनो सत्ता की जरुरत बन चुकी है । तो सवाल है कि क्या पठानकोट हमले पर तुरंत कार्र्वाई दिखा कर आंतक से बचने का रास्ता भी पाकिस्तान को मिल रहा है । और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी संवाद बनाकार संवाद तोडने से अब बचना चाहते है ।खासकर लाहौर यात्रा के बाद । यानी करगिल के बाद से ही बातचीत के जो सवाल बार बार हर आंतकी हमले के बाद उलझ जाते थे उसमे पहली बार मौदी की लाहौर यात्रा और हफ्ते भर के भीतर ही पठानकोट हमले ने दोनो देशो को इस कश्मकश से उबार दिया कि हमलो को खारिज कर आगे बढा जाये तो आंतकी संगठनों के हमलबेमानी साबित हो जायेगें । ध्यान दीजिये तो लगातार दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारो की बातचीत और नवाज शरीफ - मोदी की बातचीत संकेत यही दे रही है कि पठानकोट हमला सिर्फ बातचीत को बंद कराने के लिये किया गया । तो सवाल है कि लश्कर-ए-तोएबा हो या जैश -ए मोहम्मद या फिर कश्मीर से निकल कर पाकिसातन की जमीन पर पनाह लिये हुये सैय्यद सलाउद्दीन का संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन । इनका अतीत बताता है कि सत्ता की कमजोरी का लाभ आंतकवादी संगठनो को नहीं मिला बल्कि हर सत्ता ने अपनी कमजोरी को सौदेबाजी की ताकत में बदलने के लिये आंतकवादी संगठनो की पनाह ली । इसका बेहतरीन उदाहरण तो जैश-ए-मोहम्मद के अजहर मसूद ही है । जो पठानकोट हमले को लेकर कटघरे में है । लेकिन पाकिसातन के भीतर का सच यह है कि अजहर मसूद पर दिसबंर 2003 में मुशर्रफ पर हमला करने का दोषी माना । लेकिन मुशर्रफ की सरकार ही अजहर मसूद का कुछ नहीं बिगाड सकी । सिवाय इसके कि जनवरी 2002में जब जैश पर प्रतिबंध लगा तो उसने अपना नाम बदल कर खुदम-उल-इस्लाम कर लिया । इतना ही नहीं अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के इल्जाम में भी अमेरिका ने अजहर मसूद को अपने कानून के तहत तलब किया । इंटरपोल ने मसूद की गिरफ्तरी पर जोर दिया । लेकिन इन सबसे इतर मसूद की खुली आवाजाहीकराची के बिनौरी मसजिद में भी रही और बहावलपुर में जैश के हेडक्वार्टर में भी रही । दिखावे के तौर पर जिस तरह लशकर को छोड जमात-उल-दावा को हाफिज सईद ने ढाल बनाया वैसे ही अजहर मसूद ने खुदम-उल -इस्लाम के साथ साथ जमायत-उल -अंसार और जमात-उल -फुरका या फिर हिजबुल तहरीर को भी ढाल बनाया

। यानी आतंकवाद को लेकर जो चिंता भारत जता रहा है या फिर मोदी सरकार पठानकोट हमले में ही पाकिस्तान की कार्रवाई को सीमित कर अपनी जीत दिखाने पर अडे है उसकी सबसे बडी त्रासदी तो यही है कि आंतकवाद की परिभाषा लाइन आफ कन्ट्रोल पार करते ही जब बदल जाती है तो सवाल संवाद का नहीं बल्कि
अतीत के उन रास्तो को भी टटोलना होगा । जो कभी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बनाया , या फिर फिर वाजपेयी ने एलओसी पर एक लाख सैनिकों की तैनाती कर मुशर्रफ के गरुर को तोड़ा । इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि पाकिसातन में आतंक के पनपने की बडी वजह गरीबी-मुफलिसी है । और भारत
में आतंकवादियों की घुसपैठ की बडी वजह भ्रष्ट्रचार और आतंकवाद को लेकर राज्य-केन्द्र के बीच कोई तालमेल का ना होना है । एक तरफ पाकिस्तान की आंतकवाद पर तैयार रिपोर्ट ‘प्रोबिंग माइंडसेट आफ टेररइज्म’ के अनुसार करीब दो लाख परिवार आतंक की फैक्ट्री के हिस्से है । इनमें 90 फीसदी गरीब
परिवार है । इन नब्बे फिसद में में से 60 फिसद सीधे मस्जिदों से जुड़े हैं । आतंक का आधार इस्लाम से जोडा गया है । और इस्लाम के नाम पर इंसाफ का सवाल हिंसा से कहीं ज्यादा व्यापक और असरदार है । यानी आंतक या जेहाद के नाम पर हिंसा इस्लाम के इंसाफ के आगे कोई मायने नहीं रखता । फिर पाकिस्तान के
भीतर के सामाजिक ढांचे में उन लडकों या युवाओं का रौब उनके अपने गांव या समाज में बाकियों की तुलना में ज्यादा हो जाता है जो किसी आतंकी संगठन से जुड जाता है । लेकिन समझना यह भी होगा कि पाकिस्तान में आंतकवादी संगठन किसी को नहीं कहा जाता है । जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर-ए-तोएबा तक कट्टरवादी
इस्लामिक संगठन माने जाते है । जाहिर है ऐसे में हालात घुम-फिरकर सवाल भारत के आंतरिक सुरक्षा को लेकर ही उठेगें । और बीजेपी तो इजरायल को ही सुरक्षा के लिहाज से आदर्श मानती रही है तो फिर उस दिशा में वह बढ़ क्यों नहीं पा रही है । क्या संघीय ढांचा भारत में रुकावट है जो एनसीटीसी पर सहमति नहीं बना पाता । या फिर आंतकवाद से निपटना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है । यानी नागरिकों की भूमिका सिर्फ चुनाव में सत्ता तय करने के बाद सिमट चुकी है । असल में भारत की मुश्किल यही है कि नागरिकों की कोई भूमिका सत्ता के दायरे में है ही नहीं । इसलिये सत्ता बदलने का सुकुन लोकतंत्र को जीना है और सत्ता के लिये वोट बैक बनना देश के लिये त्रासदी । इसलिये सच यही है कि भारत और पाकिस्तान कभी आपस में बात नहीं करते और
दोनों देशों की सत्ता कभी नहीं चाहती कि दोनो देशो की आवामों के बीच संवाद हो । बातचीत सत्ता करती है और बंधक आवाम बनती है । जिसकी पीठ पर सवारी कर सियासी बिसात बिछायी जाती है । और बातचीत के दायरे में आंतकवाद और कश्मीर का ही जिक्र कर उन भावनाओं को उभारा जाता है जिसके आसरे सत्ता को या तो
मजबूती मिलती है या फिर सत्ता पलटती है । फिर आंतकी घटनाओं के पन्नों को पलटे तो 1993 के मुबंई सिरियल ब्लास्ट के बाद पाकिस्तानी आतंकवाद की दस्तक 2000 में लालकिले पर हमले से होती है । और सच यह भी है कि जिस छोटे से दौर [ अप्रैल 1997-मार्च1998  ] में आई के गुजराल पीएम थे उस दौर में सबसे ज्यादा आवाजाही भारत और पाकिस्तान के नागरिकों की एक दूसरे के घर हुई । उस दौर में दोनो देशो के भीतर ना आईएसआई सक्रिय थी ना रां । तो कह सकते है कि गुजराल दोनो देशों के मिजाज से वाकिफ थे क्योकि ना सिर्फ उनका जन्म अविभाजित भारत के झेलम में हुआ और पढाई लाहौर में । बल्कि 1942 के राजनीतिक संघर्ष में जेल भी पाकिसातन की थी थी । लेकिन नये हालातो में गुजराल की सोच यह कहकर भी खारिज की जा सकती है कि  तब का दौर अलग था अब का दौर अलग है ।

Friday, January 8, 2016

ऐ भाई!तू भारत माँ के सीने की घबराहट सुन,
सोमनाथ पर हावी होती गजनबियों की आहट सुन,



नारा ए तकबीर लगाती भीड़ देख लो लाखों की,
जिन आँखों में राम कृष्ण हैं,खैर नही उन आँखों की,



पहले पढ़ी नमाज़ बाद में आगजनी-बम-गोली थी,
लगता है पूरी की पूरी तालिबान की टोली थी,



ये भारत के मुसलमान हैं,या गुंडे अफगानी हैं
इनके आगे संविधान,कानून सभी बेमानी हैं,



माना ये गुस्सा हो बैठे,उस बयान कमलेशी पर,
बंद हुआ वो आज जेल में,खड़ा हुआ है पेशी पर,



सजा अदालत देगी,ये भी छोड़ें आज अदालत पर,
रखो शरीयत घर में,ऐसे उतरें नही बगावत पर,



लेकिन ये तो टोपी जालीदार पहनकर कूद गए,
अमन शांति भाईचारे पर अपनी आँखे मूँद गए,



दरवाज़ों पर ॐ लिखा ,तो वही घराना फूंक दिया,
इतने थे बेख़ौफ़ मियां जी,पूरा थाना फूंक दिया,



सिर्फ निशाना हिन्दू ही क्यों,चुन चुन कर के पीटे थे,
और मुसाफिर बस के नीचे कॉलर पकड़ घसीटे थे,



फौजी वाहन से भी नफरत?क्यों कर आग लगाई थी?
पूरी भीड़ अचानक कैसे एक साथ बौराई थी,



अगर वजह कमलेश रहा है,सारे हिन्दू दोषी क्यों?
तो फिर अफजल भटकल दाऊद पर छायी ख़ामोशी क्यों?



क्या हम भी ये चेहरे लेकर इनके घर पर टूट पढ़ें?
और एक गुजरात बना दें,भगवा लेकर छूट पढ़ें?



ये गौरव चौहान कहे,हम तो बस प्रेम पुजारी हैं 
हैं कलाम के दीवाने हम,सबसे रखते यारी हैं,



लेकिन भीड़ मालदा वाली तो कुछ और बताती है,
तैमूरी फितरत या औरंगजेबी दौर बताती है,



आईएस सरीखे लगता ये जिहाद में डूबे हैं,
और शरीयत लागू करना,इन सबके मंसूबे हैं,



भीड़ नही ये धमकी समझो संविधान के सीने पर,
प्रश्न चिन्ह है राम राम कहने वालों के जीने पर,



जिन्हें सिर्फ असहिष्णु लगी थी भीड़ दादरी वाली जी,
आज मालदा पर चुप हैं,अब कहाँ गए हड़ताली जी,



पुरस्कार वापस करने वाले किस बिल में समा गए,
आमिर शारुख अपने मुँह में दही अचानक जमा गए,



हमने कपड़ें सौंप दिए हैं,पेशावर के दर्ज़ी को,
भूल हुयी जो दुर्गा समझा इस ममता बैनर्जी को,



अगर सनातन बटाँ रहा यूँ इन्ही सियासी मुखड़ों में,
तिलक मिटेगा और जनेऊ कटा मिलेगा टुकड़ों में,



जागो,वर्ना राम न होंगे,तुलसी के अरमानो में,
काफिर बनकर पड़े रहोगे,बाबर के तहखानों में,


------कवि गौरव चौहान 
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Thursday, January 7, 2016

संघ मान रहा है बीजेपी को परिपक्व नेतृत्व चाहिये ?

बीजेपी अधय्क्ष को लेकर जलगांव में मंथन


एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी तो दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी । और बीच में अमित शाह के अध्यक्ष पद की कुर्सी । जिस पर फैसले की घड़ी अब आ चुकी है और कल से जलगांव में दो दिनों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोर कमेटी इसी पर मंथन करेगी की अमित शाह को दोबारा बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाये कि नहीं। बैठक में संघ के मुखिया मोहन भागवत समेत भैयाजी जोशी, सुरेश सोनी , दत्तात्रेय होसबोले, कृष्ण गोपाल, सह कार्यवाहक विभाग्या और बौद्दिक प्रमुख स्वांत रंजन समेत दर्ज भर अधिकारी चिंतन मनन करेंगे। और चिंतन मनन सिर्फ इस बात को लेकर नहीं होगा कि अमित शाह का क्या किया जाये बल्कि मंथन इस बात को लेकर ज्यादा होगा कि जब केन्द्र में संघ के राजनीतिक संगठन बीजेपी की सरकार है । प्रधानमंत्री स्वयंसेवक है । तो फिर बीजेपी के चुनावी जीत के विस्तार पर दिल्ली और बिहार में ब्रेक क्यों लग गयी । और संघ के सैद्दांतिक मुद्दों से इतर मोदी सरकार निर्णय ले रही है और फिर चुनावी जीत नहीं मिल रही है तो यह रास्ता कब तक अपनाया जा सकता है । यानी अमित शाह को दोबारा बीजेपी अध्यक्ष बनाने के लिये जिस मंथन की तैयारी संघ परिवार कर रहा है उसमें यह कहा जरुर जा सकता है कि आखरी फैसला तो पीएम मोदी को ही लेना होगा लेकिन आडवाणी और जोशी की सहमति भी होनी चाहिये यह संघ भी मान रहा है। क्योंकि अमित शाह का विरोध आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी ,शांता कुमार और यशंवत सिन्हा ने बिहार
चुनाव परिमाम के बाद पत्र को लिख कर किया था । और जिम्मेदारी से बचने और पार्टी को तानाशाह के अंदाज में चलाने का आरोप मढा था। जाहिर है इसपर आजतक जबाब नहीं दिया गया । और संघ परिवार ने भी खामोशी ही बरती । यानी जो सवाल आडवाणी जोशी ने उठाये वह भी बीजेपी के पास पेंडिग पडे है । और आरएसएस यह कतई नहीं चाहेगा कि कोर कमेटी की बैठक में बीजेपी अधयक्ष को लेकर जो भी फैसला हो उसके बाद बीजेपी के भीतर से कोई आवाज विरोध की उठे ।

ऐसे में अगर अमित शाह पर संघ मुहर लगाता है तो यह हो सकता है कि जलगाव में फैसले के बाद खुद सरसंघचालक मोहन भागवत और भैयाजी जोशी दिल्ली आकर आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की सहमति लें । क्योकि जानकारी के मुताबिक जलगांव बैठक से पहले संघ और सरकार के बीच तालमेल बैठाने का काम देख रहे कृषण गोपाल ने आडवाणी और जोशी से मुलाकात की थी । और दोनो ने पार्टी को परिपक्व हाथो में देने की वकालत की । यानी अमित शाह के नाम को लेकर दोनो का रुख नरम पड़ा नहीं था। यूं मोदी सरकार के नीतिगत फैसले और उसपर अमित शाह की खामोश मुहर ने भी बुजुर्ग और अनुभवी स्वयंसेवकों में अंसतोष पैदा किया है। मसलन कश्मीर में सरकार बीजेपी की भी है लेकिन धारा 370 जस का तस है। और माना जा रहा है मेहबूबा मुफ्ती के सीएम बनने के बाद धारा 370 को स्थायी भी बना दिया जायेगा। यानी बीजेपी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की ही लाइन को भूल चुकी है । फिर स्वदेशी का नारा संघ परिवार से निकला लेकिन सरकार एफडीआई के रास्ते चल निकली है । किसान संध और आदिवासी कल्याण संघ सरकार के भूमि अधिग्रहण के रुख को लेकर नाराज है । जनसंघ के दौर से आदर्श गांव का जिक्र हुआ अब स्मार्ट सीटी का जिक्र हो रहा है । संघ को अंखड भारत पर सफाई देनी पड़ रही है और प्रदानमंत्री मोदी पाकिस्तान की पीएम को जन्मदिन की बधाई देने के लिये लाहौर जाकर देश को चौंका रहे हैं। यानी सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या मोदी सरकार और बीजेपी के बीच राजनीतिक तालमेल नहीं है । संघ परिवार के सिद्दांत मोदी सरकार के दौर में बदल रहे है । या फिर सत्ता में आने के बाद से बीजेपी हो या संघ परिवार सभी की पहचान मोदी सरकार के निर्णयो पर आ टिकी है । यह ऐसे सवाल है जिसे लेकर पहली बार आरएसएस परेशान है । इसलिये जलगांव में संघ के कोर कमेटी की बैठक के
केन्द्र में वह सवाल है जिनके आसरे बीजेपी को परिपक्व नेतृत्व मिल सके या परिवपक्वता आ जाये। जनसंघ के दौर के नारे, एक निशान, एक विधान , एक प्रधान की सोच जाग सके। संघ की बुनियादी सोच को बीजेपी राजनीतिक तौर पर विस्तार दें । यानी मोदी के सत्ता में आने के बाद पहली बार संघ परिवार के भीतर इस बात को लेकर चिंता कही ज्यादा है कि राजनीतिक सफलता भर के लिये कहीं सामाजिक-आर्थिक जमीन पर से स्वयंसेवकों के पांव तो नहीं उखड़ रहे।

क्योंकि बीते हफ्ते ही इन्दौर में संघ की सभा हो या पुणे में संघ का समागम दोनो जगहों पर संघ के मुखिया ने सवाल सामाजिक मुद्दो के आसरे उठाये। तो सवाल यही है दिल्ली में अपनी सत्ता होने के बावजूद संघ अपने विस्तार के लिये अपने ही आधारो को अगर लगातार खंगाल रहा है तो फिर उसी के राजनीतिक संगठन बीजेपी को चुनावी जीत क्यो नहीं मिल पा रही है । और चुनाव में जीत अगर पार्टी सदस्य संख्या में बढोतरी या सांगठनिक ढांचे को दुरस्त करने के बाद भी नहीं मिल रही है तो क्या जिस परिपक्व नेतृत्व का सवाल आडवाणी जोशी उठा रहे हैं अब उस दिशा में बीजेपी को संघ ले जाना चाहेगा । यानी वैचारिक ताकत भी होनी चाहिये । जाहिर है संघ के कोर कमेटी की बैठक में इन सारे सवालो पर मंथन होगा । और माना जा रहा है कि 14 जनवरी को ही तमाम मशक्कत के बाद एलान होगा कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष होगा कौन।

Tuesday, January 5, 2016

मेरे प्रिय मित्रजनो ! प्यार भरा नमस्कार ! कुशलता के आदान-प्रदान पश्चात विषय ये है कि मेरी बेटी सुकुमारी सुकृति शर्मा जो पिछले 3 - 4 वर्षों से ज़ी पंजाब हरियाणा हिमाचल,टीवी 24 और इंडिया-क्राइम चैनलों में , एंकर कम असोसिएट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्य कर चुकी है !इसके इलावा कई समाचार पत्रों में और विद्वित पत्रकारों एवं एडिटरों के साथ भी कार्य कर चुकी है !उसने जर्नलिज़्म एंड मॉस कम्युनिकेशन में मास्टर तक की शिक्षा ग्रहण की हुई है !
               पारिवारिक कारणों के चलते अब हम उसे जयपुर में शिफ्ट करवाना चाहते हैं ! अतः जो भी मेरा मित्र इस काम में मेरी मदद कर सकता हो वो अवश्य करे !सधन्यवाद !! आपका अपना मित्र - पीताम्बर दत्त शर्मा - (लेखक-विश्लेषक) मो.न. - 9414657511

sukriti sharma

Attachments12:57 PM (14 minutes ago)
Dear Sir/Mam

First of all, Greetings for the day and a very happy new year to you and family.

Further, I am sharing my profile to you for any suitable opening. Presently i am  working with India Crime News Channel, Meerut as an Associate Producer and have 2.5 years of rich experience with Zee Media Corp Limited, Noida as Assistant Producer in Zee Punjab Haryana Himachal and very confident with following Roles/jobs. 

 Bulletin Rundown
 Special Bulletin
 Packages
 Fast News
 Anchoring
 Voice Over (News, Programming)
 Production work
 Ticker
 PCR (Graphics, Playlist, Panel Production)
 Octopus

Please find attached my resume, also sharing short clips links of my very recent Videos For references, I have did Live Bulletins like Fast news- 50 ka punch , Desh at 9 accompanying with Multiple Voice Overs, PTC and special programs. 

For ready references, seniors may also available .    

Please give me an opportunity to prove my caliber for the same.
  
Video references:

with Best regards,
Sukriti Sharma
9555215279  




                       

"कुछ नहीं ,है भाता ,जब रोग ये लग जाता".....!!! - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतंत्र टिप्पणीकार) मो.न.+ 9414657511

वैसे तो मित्रो,! सभी रोग बुरे होते हैं !लेकिन कुछ रोग तो हमारा पीछा छोड़ देते हैं और कुछ आदमी की मौत तलक साथ देते हैं !पुराने जमाने में ऐसे ...