Thursday, July 28, 2016

आरएसएस और गांधी हत्या !!

 राजनेताओं  को यह समझना होगा कि अपने राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए किसी व्यक्ति या संस्था पर झूठे आरोप लगाना उचित परंपरा नहीं है। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी शायद यह भूल गए थे कि अब वह दौर नहीं रहा, जब नेता प्रोपोगंडा करके किसी को बदनाम कर देते थे। आज पारदर्शी जमाना है। आप किसी पर आरोप लगाएंगे तो उधर से सबूत मांगा जाएगा। बिना सबूत के किसी पर आरोप लगाना भारी पड़ सकता है। भले ही कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष इस मामले पर माफी माँगने से इनकार करके मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार दिखाई देते हैं लेकिन, कहीं न कहीं उन्हें यह अहसास हो रहा होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का अनर्गल आरोप लगाकर उन्होंने गलती की है। इसका सबूत यह भी है कि वह अदालत गए ही इसलिए थे ताकि यह प्रकरण खारिज हो जाए। गौरतलब है कि गांधी हत्या का आरोप संघ पर लगाने के मामले में कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके सीताराम केसरी को भी माफी का रास्ता चुनना पड़ा था। प्रसिद्ध स्तम्भकार एजी नूरानी को भी द स्टैटसमैन अखबार के लेख के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। बहरहाल, वर्ष 2014 में ठाणे जिले के सोनाले में आयोजित चुनावी सभा में संघ को गांधी का हत्यारा बताने पर राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि के मामले की सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा है कि राहुल गांधी इस मामले में माफी माँगे या फिर मुकदमे का सामना करें। उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी के भाषण पर सवाल उठाए और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि 'उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य का उद्धरण लेकर भाषण क्यों दिया? राहुल गांधी को इस तरह एक संगठन की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करनी चाहिए थी।' हमें गौर करना होगा कि कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति विरोध और द्वेष प्रारंभ से ही है। वैचारिक विरोध और द्वेष के कारण ही कांग्रेस का एक धड़ा अनेक अवसर पर संघ को बदनाम करने का प्रयास करता रहा है। 
  पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक संघ के प्रति वही संकीर्ण नजरिया और द्वेष कायम है। साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखने के कारण जवाहरलाल नेहरू संघ का विरोध करते थे। वह किसी भी प्रकार संघ को दबाना चाहते थे। वर्ष 1948 में जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की, तब संघ को बदनाम करने और उसे खत्म करने का मौका प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मिल गया। 'नाथूराम गोडसे संघ का स्वयंसेवक है और गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र आरएसएस ने रचा है।' यह आरोप लगवाकर कांग्रेसनीत तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर न केवल प्रतिबंध लगाया, बल्कि देशभर में उससे संबंद्ध नागरिकों को जेल में ठूंस दिया। परंतु, साँच को आँच क्या? तमाम षड्यंत्र के बाद भी सरकार गांधीजी की हत्या में संघ की किसी भी प्रकार की भूमिका को साबित नहीं कर सकी। संघ अग्नि परीक्षा में निर्दोष साबित हुआ। नतीजा, सरकार को संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। क्या राहुल गांधी और संघ विरोधी बता सकते हैं कि जब संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, तब कांग्रेस ने ही उससे प्रतिबंध क्यों हटाया? राहुल गांधी संभवत: अब भी यह नहीं समझ पाए हैं कि गांधीजी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, संघ ने नहीं। उन्हें इसके लिए उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी पर ध्यान देना होगा। न्यायालय ने कहा है कि गोडसे ने गांधी को मारा और संघ या संघ के लोगों ने गांधी को मारा, दोनों कथनों में बहुत बड़ा अंतर है। बहरहाल, नाथूराम गोडसे और संघ के संबंध में स्वयं गोडसे ने अदालत में कहा था कि वह किसी समय संघ की शाखा जाता था लेकिन बाद में उसने संघ छोड़ दिया। बहरहाल, यदि यह माना जाए कि एक समय गोडसे संघ का स्वयंसेवक था, इसलिए संघ गांधी हत्या के लिए जिम्मेदार है। तब यह भी बताना उचित होगा कि एक समय नाथूराम गोडसे कांग्रेस का पदाधिकारी रह चुका था। लेकिन, संघ विरोधियों ने नाथूराम गोडसे और कांग्रेस के संबंध को कभी भी प्रचारित नहीं किया। इससे स्पष्ट होता है कि आज की तरह उस समय का तथाकथित बौद्धिक नेतृत्व, वामपंथी लेखक/इतिहासकार और कांग्रेस का नेतृत्व ऐन केन प्रकारेण संघ को कुचलना चाहता था। यह सच है कि एक समय में नाथूराम गोडसे संघ की गतिविधियों में शामिल रहा। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि वह संघ की विचारधारा के साथ संतुलन नहीं बैठा सका। संभवत: वह संघ को कट्टर हिन्दूवादी संगठन समझकर उससे जुड़ा था। लेकिन, बाद में जब आरएसएस के संबंध में गोडसे की छवि ध्वस्त हुई, तब गोडसे न केवल संघ से अलग हुआ बल्कि एक हद तक संघ का मुखर विरोधी भी बन गया था। उनके समाचार पत्र 'हिन्दू राष्ट्र' में संघ विरोधी आलेख प्रकाशित होते थे। गोडसे ने संघ की आलोचना करते हुए सावरकर को पत्र भी लिखा था। इस पत्र में उसने लिखा कि संघ हिन्दू युवाओं की ऊर्जा को बर्बाद कर रहा है, इससे कोई आशा नहीं की जा सकती। स्पष्ट है कि गोडसे संघ समर्थक नहीं, बल्कि संघ विरोधी था। गांधी हत्या की जांच के लिए गठित कपूर आयोग को दी अपनी गवाही में आरएन बनर्जी ने भी इस सत्य को उद्घाटित किया था। बनर्जी की की गवाही इस मामले में बहुत महत्त्वपूर्ण थी। क्योंकि, गांधीजी की हत्या के समय आरएन बनर्जी केन्द्रीय गृह सचिव थे। बनर्जी ने अपने बयान में कहा था कि यह साबित नहीं हुआ है कि वे (अपराधीगण) संघ के सदस्य थे। वे तो संघ की गतिविधियों से संतुष्ट नहीं थे। संघ के खेलकूद, शारीरिक व्यायाम आदि को वे व्यर्थ मानते थे। वे अधिक उग्र और हिंसक गतिविधियों में विश्वास रखते थे। (कपूर आयोग रिपोर्ट खंड 1 पृष्ठ 164)
   राजनीतिक और वैचारिक षड्यंत्र के तहत ही गांधी हत्या के मामले में आरएसएस को घसीटा गया था। गांधी हत्या की प्राथमिकी (एफआईआर) तुगलक रोड थाने में दर्ज कराई गई है। इस प्राथमिकी (एफआईआर-68, दिनांक- 30 जनवरी, 1948, समय - सायंकाल 5:45 बजे ) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहीं कोई जिक्र नहीं है। लेकिन, गांधीजी की हत्या के बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषणों में गांधी हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दोष देना शुरू कर दिया। इस बात से जाहिर होता है कि पंडित नेहरू आरएसएस के संबंध में पूर्वाग्रह से ग्रसित थे और उन्हें तत्कालीन वामपंथी विचारकों/नेताओं द्वारा लगातर संघ के प्रति भड़काया जा रहा था। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के भड़काऊ भाषणों से देशभर में कांग्रेस के लोग संघ से संबंध रखने वाले लोगों को प्रताडि़त करने लगे थे। संघ कार्यालयों पर पथराव हुआ, तोडफ़ोड़ हुई और कई जगह आगजनी भी की गई। लेकिन, संघ के अनुशासित स्वयंसेवकों ने कोई प्रतिकार नहीं किया। कांग्रेस की हिंसा का शांति से सामना कर उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि संघ अंहिसक संगठन है। बहरहाल, गांधी हत्या में आरएसएस की भूमिका की पड़ताल करने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की निगरानी में देशभर में अनेक गिरफ्तारियां, छापेमारी और गवाहियां हुईं। इनसे धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि गांधी हत्या का संघ से कोई वास्ता नहीं है। संघ पर जघन्य आरोप साबित नहीं होते देख पंडित जवाहरलाल नेहरू कुछ विचलित हुए और उन्होंने जाँच पर असंतोष जाहिर करते हुए सरदार पटेल को पत्र लिखा। उन्होंने अपने पत्र में आरोप लगाया कि दिल्ली की पुलिस और अधिकारियों की संघ के प्रति सहानुभूति है। इस कारण संघ के लोग पकड़े नहीं जा रहे। उसके कई प्रमुख नेता खुले घूम रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि देशभर से जानकारियां मिली हैं और मिल रही हैं कि गांधीजी की हत्या संघ के व्यापक षड्यंत्र के कारण हुई है, परंतु उन सूचनाओं की ठीक प्रकार से जांच नहीं हो रही। जबकि यह पक्की बात है कि षड्यंत्र संघ ने ही रचा था। आदि-आदि। सरदार पटेल ने इस पत्र का क्या जवाब दिया वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि कुछ लोग सरदार पटेल को भी गलत अर्थों में उद्धृत करते हैं। संघ विरोधी सरदार पटेल की तत्कालीन प्रतिक्रियाओं को तो लिखते हैं, जिनमें उन्होंने भी यह माना कि गांधी हत्या में संघ की भूमिका हो सकती है। लेकिन, जाँच के बाद सरदार पटेल की क्या धारणा बनी, यह नहीं बताते। खैर, पंडित नेहरू की जिज्ञासा को शांत करने के लिए सरदार पटेल पत्र (27 फरवरी, 1948) में लिखते हैं कि गांधी जी की हत्या के सम्बन्ध में चल रही कार्यवाही से मैं पूरी तरह अवगत रहता हूं। सभी अभियुक्त पकड़े गए हैं तथा उन्होंने अपनी गतिविधियों के सम्बन्ध में लम्बे-लम्बे बयान दिए हैं। उनके बयानों से स्पष्ट है कि यह षड्यंत्र दिल्ली में नहीं रचा गया। वहां का कोई भी व्यक्ति षड्यंत्र में शामिल नहीं है। षड्यंत्र के केन्द्र बम्बई, पूना, अहमदनगर तथा ग्वालियर रहे हैं। यह बात भी असंदिग्ध रूप से उभर कर सामने आयी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इससे कतई सम्बद्ध नहीं है। यह षड्यंत्र हिन्दू सभा के एक कट्टरपंथी समूह ने रचा था। यह भी स्पष्ट हो गया है कि मात्र 10 लोगों द्वारा रचा गया यह षड्यंत्र था और उन्होंने ही इसे पूरा किया। इनमें से दो को छोड़ सब पकड़े जा चुके हैं। इस पत्र व्यवहार से भी स्पष्ट है कि कांग्रेस का एक धड़ा लगातार पंडित नेहरू को संघ के विरोध में गलत सूचनाएं उपलब्ध करा रहा था। लेकिन, वास्तविकता धीरे-धीरे स्पष्ट होती जा रही थी। 
  महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित संवेदनशील मामले को सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति आत्मा चरण की विशेष अदालत को सौंपा गया। प्रकरण की सुनवाई के लिए 4 मई, 1948 को विशेष न्यायालय का गठन हुआ। 27 मई से मामले की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई लालकिले के सभागृह में शुरू हुई। यह खुली अदालत थी। सभागृह खचाखच भरा रहता था। 24 जून से 6 नवंबर तक गवाहियां चलीं। 01 से 30 दिसंबर तक बहस हुई और 10 जनवरी 49 को फैसला सुना दिया गया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने 149 गवाहों के बयान 326 पृष्ठों में दर्ज हुए। आठों अभियुक्तों ने लम्बे-लम्बे बयान दिए, जो 323 पृष्ठों में दर्ज हुए। 632 दस्तावेजी सबूत और 72 वस्तुगत साक्ष्य पेश किए गए। इन सबकी जांच की गयी। न्यायाधीश महोदय ने अपना निर्णय 110 पृष्ठों में लिखा। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। शेष पाँच को आजन्म कारावास की सजा हुई। इस मामले में कांग्रेस और वामपंथियों ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी विनायक दामोदर सावरकर को भी फंसाने का प्रयास किया था। लेकिन, उनका यह षड्यंत्र भी असफल रहा। न्यायालय से सावरकर को निर्दोष बरी किया गया। इसी फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि महात्मा गांधी की हत्या से संघ का कोई लेना-देना नहीं है। स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन, नहीं। न्यायालय के निर्णय से कांग्रेस और वामपंथी नेता संतुष्ट नहीं हुए। संघ विरोधी लगातार न्यायालय के प्रति असम्मान प्रदर्शित करते हुए गांधी हत्या के लिए संघ को बदनाम करते रहे। बाद में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दबाव या भरोसे में लेकर इस मामले को फिर से उखाड़ा गया। वर्ष 1965-66 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गांधी हत्या का सच सामने लाने के लिए न्यायमूर्ति जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में कपूर आयोग का गठन किया।दरअसल, इस आयोग के गठन का उद्देश्य गांधी हत्या का सच सामने लाना नहीं था, अपितु संघ विरोधी एक बार फिर आरएसएस को फंसाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन, इस बार भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। कपूर आयोग ने तकरीबन चार साल में 101 साक्ष्यों के बयान दर्ज किए तथा 407 दस्तावेजी सबूतों की छानबीन कर 1969 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग अपनी रिपोर्ट में असंदिग्ध घोषणा करता है कि महात्मा गांधी की जघन्य हत्या के लिए संघ को किसी प्रकार जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।(रिपोर्ट खंड 2 पृष्ठ 76)  
  न्यायालय और आयोग के स्पष्ट निर्णयों के बाद भी आज तक संघ विरोधी गांधी हत्या के मामले में संघ को बदनाम करने से बाज नहीं आते। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि संघ विरोधियों का भारतीय न्याय व्यवस्था, संविधान और इतिहास के प्रति क्या दृष्टिकोण है? जब यह मामला शीर्ष न्यायालय में पहुंच गया है तब न्यायालय को यह भी ध्यान देना चाहिए कि गांधी हत्या के लिए बार-बार संघ को जिम्मेदार बताने से न केवल एक संगठन पर कीचड़ उछाली जाती है, वरन भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति भी अविश्वास का वातावरण बनाया जाता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद भी संघ को गांधी हत्या के लिए आज तक जिम्मेदार बताना, न्यायपालिका के प्रति असम्मान प्रकट करता है। न्यायालय को इस संबंध में भी संज्ञान लेना चाहिए। बहरहाल, हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि गांधी हत्या में संघ को बार-बार इसलिए घसीटा जाता है ताकि सत्ताधीश और वामपंथी विचारक अपने निहित स्वार्थ पूरे कर सकें। संघ विरोधियों ने अब तक गांधी हत्या प्रकरण को राजनीतिक दुधारू गाय समझ रखा था। लेकिन, उन्हें यह समझना चाहिए कि अब प्रोपेगंडा राजनीति का दौर बीत चुका है।  
 जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
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Thursday, July 21, 2016

"समझ"!! मेरी "सरकार" की ? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. +9414657511

आजाद होने के बाद भारत के नेताओं से चाहे कितनी भी गलतियां क्यों ना हुई हों ,लेकिन सभी भारतवासी उनको ना केवल अपना सच्चा नेता मानते थे, बल्कि उनके कहेनुसार चलते भी थे !वो दिन आज भी याद आता है तो मन अभिभूत हो जाता है ,जब नेहरू जी की एक अपील पर भारत की जनता ने अपने घर से सारे गहने तक निकाल कर उनके सामने देश हित हेतु समर्पित कर दिए थे !
                     इसी तरह माननीय लाल बहादुर शास्त्री जी के आह्वान पर सभी देश वासियों ने "व्रत"रखना शुरू कर दिया था,क्योंकि देश में अनाज भारी कमी थी !ऐसा इसलिए होता था क्योंकि तब के नेता सभी देशवासियों की चिंता एक समान करते थे !फिर जैसे-जैसे नेताओं के मन काले होते गए और पत्रकार "भाई"लोग "ख़बरें गढ़ने और रोकने"लगे,स्वार्थ और लालच सर चढ़ कर बोलने लगा ,तो अच्छे नेताओं की "माला"बिखरने लगी ,तो तब बनी "कोंग्रेस आई",जो आज पता नहीं कोंग्रेस "S " है या कोंग्रेस r है या फिर कोंग्रेस प्रियंका ?
             बात सरकार की समझ की करनी है तो सबसे पहले हम ये जानलें कि भारत में एक समय में लगभग 30 तरह की सोच रखने वाली सरकारें काम करती हैं !लेकिन इनकी सोच बिलकुल एक जैसी हो गयी है !इसीलिए मैंने कोंग्रेस के शासन का ज़रा ज्यादा ज़िक्र कर दिया !अभी कल ही हमारे मोदी जी ने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को आदेश दिया कि वो पूरे भारत में फ़ैल जाएँ और सरकार द्वारा चलायी जा रहीं विभिन्न "कल्याणकारी"के बारे में बताएं !सभी सरकारें अमीर व्यवसाइयों को तो बिना गारण्टी के अरबों रूपये का उधार देती है फिर उस पर करोड़ों की सब्सिडी देती हैं !इसीलिए वही धन्ना-सेठ लोग राज्य सभा का सदस्य भी बनते हैं ,पार्टियों को चन्द भी देते हैं और तुर्रा ये की अपनी पसन्द के मंत्री भी बनवा लेते हैं जी !
                              दूसरी तरफ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों और अन्य आरक्षित वर्गों हेतु समय-समय पर सभी सरकारें योजनाएं लाते ही रहते हैं !जिनका लाभ उठाकर आज ये सभी आरक्षित लोग "फूले"पड़े हैं !अब बात करते हैं उस वर्ग की जो इन आमिर-गरीब दो पाटन के बीच बुरी तरह से पिस रहा है !जिसे किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा ! सरकारी नोकरी नहीं मिल पाती !इस मध्यम वर्ग, जो "स्वर्ण"माना जाता है के साथ कोई अत्याचार हो जाए तो "जांच-आयोग"बिठाकर मामला ठंडा कर दिया जाता है !  "मनरेगा"में मजदूरी भी नहीं कर पाता !जगह-जगह पढ़े-लिखे बेरोजगार घूम रहे हैं !किसी "विचारधारा"की कोई सरकार आज तलक इन "बीच"वाले लोगों के हितों का ध्यान नहीं रख पायी !
                    इसलिए हे मोदी जी !आप मनरेगा में कुछ फेर बदल करवाइये ! इसे शहरों में भी लागू करवाएं और इसमें जो भी मजदूरी करना चाहे वो आसानी से हर सुबह उस कार्यालय में पहुँच जाए जहां काम मिलता हो !हर विभाग के दस लाख  सभी कार्य मनरेगा के मजदूरों से ही करवाएं चाहे उनके ऊपर कोई विभागीय अफसर सुपरवाईज़र हो !मजदूरी भी बढ़ाकर 500/- रोज़ाना कर दी जाए तो देश से 70 %बेरोजगारी दूर हो जायेगी ! योजनाएं सीमित लोगों के हित साधती हैं इसलिए योजनाओं के प्रचार से कोई भी चुनाव नहीं जीत सकता ! 
        सचेत कर रहा हूँ आपको ! मान्यवर !अफसरों और चापलूस नेताओं  में ना आएं !"मध्यम-वर्ग"के उत्थान हेतु कार्य करें !उन्होंने ही आपको जिताया है !बाकी तो सब , मुलायम,मायावती,ममता,जयललिता,आदि नेताओं के भक्त हैं जी !  
                       जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
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Thursday, July 14, 2016

"माई नेम इज़ शीला......!!शीला की......"!!- पीतांबर दत्त शर्मा लेखक-विश्लेषक) मो.न. +9414657511

लो जी पाठक मित्रो !कांग्रेस को आनेवाले उत्तर-प्रदेश के विधान-सभा चुनावों हेतु श्रीमती शीला दीक्षित इस लिए पसंद आईं हैं क्योंकि उनमे प्रदेश के सभी नेताओं से ज्यादा प्रशासनिक समझ है !वो up और दिल्ली में सबसे प्रभावशाली नेत्री हैं !राहुल और प्रियंका सहित कोई भी नेता उनके जितना राजनीती  पारंगत नहीं है !पाठक मित्रो !कांग्रेस को आज फिर से "ब्राह्मण"याद आये हैं क्यों भला??क्या उत्तर-प्रदेश के ब्राह्मण अपना फायदा उठा पाएंगे !मुझे तो लगता है कि कांग्रेस उत्तर-प्रदेश की जनता को शीला जी का ब्राह्मण चेहरा दिखाकर बहलाएंगे और अन्य लोगों को टिकटें बांटेंगे !मैं आज ही ब्राह्मणों को सचेत करना चाहता हूँ !क्योंकि सभी राजनितिक दलों को तो बीएस वो ही प्यारा केंडिडेट लगता है जो कमाई करके "हाई-कमांड"के सामने अर्पित कर दे , और फिर हाई-कमांड उस में से एक छोटा सा हिस्सा उसे भी दे दे !कांग्रेस ने इस देश पर सबसे ज्यादा  है तो उसने ही भारतवासियों को भरष्ट बनाया है !तो क्या शीला जी वहाँ सोनिया जी के सपनों को पूरा कर पाएंगी ?क्या जनता उनके इतिहास को भूल जायेगी !
                             लेकिन हम कहते हैं कि वो तो दिल्ली के विधानसभा चुनावों में इतनी बुरी तरह से नकारी जा चुकी हैं कि उन्हें  के मारे रजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए था !लेकिन वाह री राजनीति !! जितना मर्ज़ी घोटालों में नाम आये , जितने मर्ज़ी आरोप लगें लेकिन नेता की मोटी चमड़ी पर कोई  दिखाई पड़ता !ऐसा लगता है जैसे सभी राजनीतिक दल अपनी विचारधाराओं की पोटली बनाकर किसी गहरे कुएं में फेंक आये हैं !आजकल तो सब जातिवादऔर धर्म की ही राजनीती करते दिखाई पड़ते हैं !
                   बहन मायावती जी की तो पार्टी ही बिखरती नज़र आ रही है !और समाजवादी पार्टी के मुख्य्मंत्री जी आज बता रहे हैं कि वो तो "लर्निंग-मुख्य्मंत्री"थे ! अगली बार वो "सुपर-cm" बनकर जनता को निहाल करेंगे !जनता को क्या समझ रख्खा है आपने "यादव-बन्धुओ"!!? जहां तलक बात मुस्लिम वोटरों की है ,तो इस विषय पर मेरा मानना है कि उनको सभी सेकुलर पार्टियों ने मुर्ख ही बनाया है !और ये इसलिए हुआ क्योंकि उनके धार्मिक और राजनीतिक नेता अनपढ़ ही नहीं लालची और बेवकूफ भी थे और हैं जिन्होंने अपने स्वार्थपूर्ति को ही आगे रख्खा !
                            कांग्रेस में भी अब ये स्प्ष्ट हो चुका है कि यहाँ भी अब गुटबाजी अपने चरम पर है ! एक गुट सोनिया जी का जिसमें बूढ़े और अनुभवी लोग हैं ! अनुभव किस-किस विषय में है ये अंदर की बात है !दूसरा गुट राहुल गांधी जी का है जिस में तथाकथित नौजवान लोग है जो बड़ों से ज्यादा अपने आपको "अनुभवी"मानते हैं !तीसरा गुट प्रियंका गांधी का है ,जो सिर्फ "आपातकाल"में ही बाहर निकाला जाता है !बाकी सभी कॉंग्रेसी नेताओं को बस "सलाम"बजाना आता है जी !और अफसरों और जजों से अपने पक्ष में फैसले करवाना !इसीलिए तो उत्तराखण्ड में दोबारा सत्ता सम्भालते वक़्त हरीश रावत ने जज साहिब को धन्यवाद दिया और अरुणांचल प्रदेश की दोबार सत्ता सम्भालते  वक़्त राहुल ने धन्यवाद जज साहिब को दिया !इसीलिए कांग्रेस कभी मरती नहीं है वो " अमर" !देखते हैं कि "ऊँट किस करवट बैठता है "??
                   जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
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Tuesday, July 12, 2016

जन्नत कैसे लाल हो गई ?



लाल चौक पर जब 1975 में शेख अब्दुल्ला ने जीत की रैली की तो लगा ऐसा कि समूची घाटी ही लाल चौक पर उमड पड़ी है। और 1989 में जब रुबिया सईद के अपहरण के बाद आतंकवाद ने लाल चौक पर खुली दस्तक दी तो लगा घाटी के हर वाशिंदे के हाथ में बंदूक है। और अब यानी 2016 में उसी लाल चौक पर आतंक के नाम पर खौफ पैदा करने वाला ऐसा सन्नाटा है कि किसी को 1989 की वापसी दिखायी दे रही है तो किसी को शेख सरीखे राजनेता का इंतजार है। वैसे घाटी का असल सच यही है कि कि लाल चौक की हर हरकत के पीछे दिल्ली की बिसात रही । और इसकी शुरुआत आजादी के तुरंत बाद ही शुरु हो गई । नेहरु का इशारा हुआ और 17 मार्च 1948 को कश्मीर के पीएम बने शेख अब्दुल्ला को अगस्त 1953 में ना सिर्फ सत्ता से बेदखल कर दिया गया बल्कि बिना आरोप जेल में डाल दिया  गया। और आजाद भारत में पहली बार कश्मीर घाटी में यह सवाल बड़ा होने लगा कि कश्मीर कठपुतली है और तार दिल्ली ही थामे हुये है। क्योंकि बीस बरस  बाद कश्मीर का नायाब प्रयोग इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला के साथ 1974 में समझौता किया तो झटके में जो शेख अब्दुल्ला 1953 में दिल्ली के लिये खलनायक थे, वह शेख अब्दुल्ला 1975 में नायक बन गये। और पह  बार लाल चौक पर कश्मीरियों के महासमुद्र को उतरते हुये दुनिया ने देखा। और हर किसी ने माना अब कश्मीर को लेकर सारे सवाल खत्म हुये। और सही मायने में 1982 तक शेख अब्दुल्ला के जिन्दा रहते कश्मीर में बंदूक उठाने की जहमत किसी ने नहीं की। लेकिन 1989 की तस्वीर ने ना सिर्फ दिल्ली। बल्कि समूची दुनिया का ध्यान कश्मीर की तरफ ले गई। क्योंकि अफगानिस्तान से रुसी फौजें लौट चुकी थीं। तालिबान सिर उठा रहा था। पाकिस्तान में हलचल तेज थी। और दिल्ली के इशारे पर कश्मीर के चुनाव ने लोकतंत्र पर बंदूक इस तरह भारी कर दी। कि देश के गृहमंत्री की बेटी का अपहरण जेकेएलएफ ने किया ।

और पहली बार घाटी के सामने दिल्ली लाचार दिखी। तो लाल चौक पर लहराते बंदूक और आजादी के लगते नारो ने घाटी की तासिर ही बदल दी । और पहली बार जन्नत का रंग लाल दिखायी देने लगा। एक के बाद एक कर दर्जनों आतंकी संगठनों के दफ्तर खुलने लगे। रोजगार ही आतंक और आतंक ही जिन्दगी में कैसे कब बदलता चला गया इसकी थाह कोई ले ही नहीं पाया। आतंकी संगठनों की फेरहिस्त इतनी बढ़ी कि सरकार को कहना पड़ा कि आतंक के स्कूल हर समाधान पर भारी है । फेरहिस्त वाकई लंबी थी। हिजबुल मुजाहिदिन , लश्कर-ए-तोएबा , हरकत उल मुजाहिदिन , जैश-ए-मोहम्मद,जमात-उल मुजाजहिदिन ,हरकत - उल -जेहाद-अल-इस्लामी , अल-उमर-मुजाहिद्दिन , दुखतरान-ए-मिल्लत , लश्कर-ए-उमर , लश्कर -ए जब्बार , तहरीक उल मुजाहिद्दिन , जेकेएलएफ , मुत्तेहाद जेहाद काउंसिल के साथ दर्जन भर आंतकी संगठन । असर इसी का हुआ पहली बार गृह मंत्रालय ने माना कि घाटी में 30 हजार से ज्यादा आतंकवादी है । सेना ने मोर्चा संभाला तो घाटी ग्रेव यार्ड में बदली। 1990 से 1999 तक 20 हजार से लोग मारे गये । इनमें पांच हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी थे। और इसके बाद घाटी में अमन चैन का दावा करने वाले हर प्रदानमंत्री के दौर को भी देख लें तो आंकडे डराते है
। क्योकि 1999 से 2016 यानी वाजपेयी से मोदी तक के दौर में 22504 लोग मारे गये । वाजपेयी के दौर में सबसे ज्यादा 15627 मौतें हुई. तो मनमोहन सिंह के दस बरस की सत्ता के दौर में 6498 लोगो की मौत हुई । तो मोदी के दो बरस के दौर में 419 लोगो की मौत हुई । यानी 22 हजार से मौत या कहें हत्या में नागरिक भी और सुरक्षा कर्मियो की लंबी फेरहसित भी और आतंकवादी भी । सेकिन इस सिलसिले् को रोके कौन और रुके कैसे यह सवाल दिल्ली के सामने इस दौर में बडा होता चला गया । तो कश्मीर की सियासत बिना दिल्ली के चल नही सकती इसका एहसास बाखूबी हर राजनीतिक दल को हुआ । कभी नेशनल कान्फ्रेंस तो कभी पीडीपी । बिना काग्रेस या बिना बीजेपी के दोनो सत्ता में कभी आ नहीं पाये । और कश्मीरी सियासत ने दिल्ली को ही ढाल बनाकर सत्ता भी भोगी और जिम्मेदारियो से मुंह भी चुराया । इसीलिये जो सवाल नेशनल कॉन्फ्रेंस की सत्ता के वक्त पीडीपी उठाती रही। वही सवाल अब पीडीपी की सत्ता के वक्त नेशनल कान्फ्रेंस उठा रही है । दोनो दौर में कश्मीरी राजनीति ने खुद को कैसे लाचार बताया या कहे बनाया। इसका अंदाजा इससे भी मिल सकता है कि फिलहाल घाटी में सडक पर सिर्फ सेना है । सीआरपीएफ है। पुलिस है । सीएम अपने मंत्रियों के साथ कमरे में गुफ्तगू कर दिल्ली की तरफ देख रही है । उमर अब्दुल्ला ट्वीट कर राजनीतिक समाधान खोजना चाह रहे है। और तमाम विधायक अपने घरों में कैद हैं। जो यह कह कर खुद को कश्मीरी युवकों के साथ खड़े कर रहे है कि बुरहान को जिन्दा पकड़ना चाहिये था । एनकाउंटर नहीं करना चाहिये था । तो क्या वाकई हालात 1989 वाले हो चले है । लेकिन घाटी में मरने वालो की फेहरिस्त देखें तो सड़क पर गुस्सा निकालते मारे गये 15 लड़कों का जन्म ही 1990 के बाद हुआ है। शब्बीर अहमद मीर [तंगपूरा बटमालू ] , अरफान अहमद मलिक [नेवा ], गुलजार अहमद पंडित [मोहनपोरा शॉपिया ], फयाज अहमद वाजा [ लिट्टर ], साकिब मंजूर मीर [खुंदरु अचाबल], खुर्शिद अहमद [हरवात, कुलवाम ] , सफीर अहमद बट [चरारीगाम ] ,अदिल बशीर [ दोरु ] , अब्दुल हमीद मौची [अरवानी ], दानिश अय्यूब शाह [ अचबल ], जहॉगीर अहमद गनी [ हासनपुरा, बिजबेहरा ] , अजाद हुसैन [ शॉपिया ] , एजाज अहमद ठॉकुर [ सिलिगाम, अनंतनाग ] , मो. अशऱफ डार [हलपोरा, कोकरनाग ] , शौकत अहमद मीर [ हासनपौरा, बिजबेहरा ] , हसीब अहमद गनई [डाईगाम, पुलवामा ] तो सभी का जन्म 1990 के बाद हुआ । हर की उम्र 18 से 26 के बीच और ये सभी बीते 72 घंटों में आंतकवादी बुरहान के मारे जाने के बाद सुरक्षाकर्मियो का विरोध करते हुये सडक पर निकले और मारे गये । तो क्या वाकई कश्मीर घाटी के हालात एक बार 1989 की याद दिलाने लगे है ।

या फिर आंतक को जिस तरह अब के युवा आजादी के सवालो से जोडते हुये रोमान्टिीसाइज कर रहे है वह 1989 के आतंक से कही आगे के हालात है। क्योंकि आजादी के नारे तले जो विफलता बार बार दिल्ली की रही और जो सियासत घाटी में खेली जाती रही। असर उसी का है कि घाटी के अंदरुनी हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि हर छोटी सी चिंगारी उसमें भयानक आग की आशंका पैदा कर रही है । और ये चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि नारे लगाने या पत्थर चलाने वाली पीढ़ी आधुनिक तकनालाजी के दौर की पीढी है । पढी लिखी पीढी है । विकास और चकाचौंध को समझने वाली पीढी है । और उसके सरोकार लोकतंत्र की मांग कर रहे है । जाहिर है ऐसे में याद महात्मा गांधी को भी कर लेना चाहिये । क्योंकि बंटवारे के ऐलान के साथ जिस वक्त देश में सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरु हो गया था-कश्मीर घाटी में शांति थी। या कहें लोगों में ऐसा मेलजोल था कि महात्मा गांधी भी दंग रह गए। 1 अगस्त 1947 को कश्मीर पहुंचे बापू ने उस वक्त अपनी प्रार्थना सभा में कहा भी- -"जब पूरा देश सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा है, मुझे सिर्फ कश्मीर में उम्मीद की किरण नजर आती है" या विभाजन के बाद सजिस तरह देश सांप्रदायिक हि्सा में जल रहा था उस वक्त जिस कश्मीर की शांति में गांधी को एकता की उम्मीद दिखी और जिस कश्मीर की संस्कृति में उन्हें हिन्दू मुसलमान सब एक लगे-वो घाटी आजादी के 68 साल बाद एक ऐसे मोड़ पर है,जहां गांधी की सोच बेमानी लग रही है या कहें कि सरकारों ने जिस तरह घाटी को राजनीति की बिसात पर मोहरा बना दिया-उसमें मात गांधी के विचारों की हो गई। क्योंकि-आज का सच यही है कि कश्मीर जल रहा है। आज का सच यही है कि घाटी में एक आतंकवादी के पक्ष में हुजूम उमड़ रहा है। और आज का सच यही है कि घाटी में आजादी के नारे भी लग रहे हैं और लोग सेना के सामने आकर भिड़ने से नहीं घबरा रहे। और सबके जेहन में एक ही सवाल है कि कश्मीर का होगा क्या। वैसे यही सवाल महात्मा गांधी से भी पूछा गया था कि आजादी के बाद कश्मीर का क्या होगा। तो गांधी ने जवाब दिया था "-कश्मीर का जो भी होगा-वो आपके मुताबिक होगा। " इतना ही नहीं, 27 अक्टूबर 1947 को महात्मा गांधी ने एक सभा में कहा-, " मैं आदरपूर्वक कहना चाहता हूं कि कश्मीर को राज्य में लोकप्रिय शासन लाना है। ऐसा ही हैदराबाद और जूनागढ़ के मामले में भी है। कश्मीर के वास्तविक शासक कश्मीर के लोग होने चाहिए। " यानी गांधी ने कश्मीर के लोगों की इच्छा को सर्वोपरि माना लेकिन सरकारों ने लोगों को ही हाशिए पर डाल दिया। नतीजा इसी का है कि घाटी के भीतर एक झटपटाहट है, और बुरहान उस आक्रोश को निकालने की तात्कालिक वजह।
 जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
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Saturday, July 9, 2016

"हृदय - परिवर्तन""दुर्योधन और ओवेसी"का,क्यों-कैसे और किसके लिए ? - पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. - +9414657511

 मित्रो ! सोनी टीवी चैनल पर आजकल  सीरियल चल रहा है , जिसका नाम है "सूर्यपुत्र कर्ण"!जिसमे कर्ण की मृत्यु का प्रसंग चल रहा है !उसमे दुर्योधन कर्ण की मृत्यू पर द्रवित होकर "श्मशान वैराग्य"से ग्रसित होकर सभी पांडवों,वैद्यों और द्रोपदी से गुहार लगाता है कि आप सब मेरा चाहे जो हश्र कर दो ! चाहे मेरा सारा राज्य ले लो ! मुझे माफ़ कर दो !लेकिन मेरे मित्र और तुम्हारे बड़े भाई को मृत्यु के मुंह से बचालो !उसकी इस वेदना को सच्चा समझकर पांडव समझौता करने को राज़ी भी हो जाते हैं !लेकिन भगवान कृष्ण पांडवों को याद दिलाते हैं कि इसका ये पारिवारिक प्रेम उस दिन कहाँ था जब अभिमन्यु को ये सब मिलकर मार रहे थे !इसलिए इस पर विश्वास ना करो और "धर्म-युद्ध" को जारी रख्खो पांडवो !
                     ठीक उसी तरह "असदुद्दीन ओवेसी" साहिब को आज आतंकवाद बुरा दिखाई पड़ रहा है !isis "कुत्ता"नज़र आ रहा है !बेसहारा लड़कियां और अशिक्षा नज़र आ रही है !मरने के बजाये मुस्लिम नोजवानो को "जीने की राह"बताई जा रही है !किसी "पँहुचे"हुए "फ़क़ीर"की तरह अमन की बातें कर रहे हैं !भोले-भले लोग हो सकता है उनके इन झूठे "जुमलों"में भक जाएँ !लेकिन मैं अपने लेखन से आप सबको चेताना चाहता हूँ कि ऐसे हज़ारों झूठे देश भक्तों से होशियार रहना होगा हम सब भारत वासियों को !! गली, मोहल्लों,कस्बों और छोटे शहरों के अनपढ़ गँवार मोलवियों और मौलानाओं ने तो अनजाने में कभी उग्रवाद या आतंकवादियों का समर्थन ऐसे लोगों के बहकावे में आकर कर दिया होगा !वो लोग इतने दोषी नहीं हैं जबकि नुक्सान उनकी वजह से भी बहुत हुआ है हिंदुस्तान को ! लेकिन असली भारत के दुश्मन ये पढ़े-लिखे"ज़ाकिर नाईक"जैसे मुस्लिम धर्म गुरु, महेश भट्ट जैसे फिल्मकार , रविश कुमार जैसे पत्रकार और द्विग्विज्य सिंह जैसे नेता हैं जो समझते हुए उग्रवाद को समर्थन करते हैं और बड़ी चालाकी से उनको बहके हुए नौजवान और पीड़ित समुदाय बताते हैं ! 
                          अब ये जानने की कोशिश करते हैं की ओवेसी ने ये "मधुर"बयान दिया तो क्यों दिया ?मुझे तो इसके पीछे एक ही कारण नज़र आ रहा है मित्रो ! वो ये है कि काश्मीर में रोज़ाना कोई ना कोई आतंकवादी मारा जा रहा है ! मोदी सरकार की आतंकवादियों से लड़ने की विशेष रणनीति से कुछ ऐसा "बड़ा झटका "ओवेसी को लगा है जिससे ये श्मशान वैराग्य उतपन्न हुआ है ! लेकिन जनता ओवेसी जैसे लोगों के झांसे में नहीं आएगी !मोदी  काम करने के तरीके को देखते हुए उन्हें अपना समर्थन देती रहेगी !झूठे सेकुलर नेताओं,राजनितिक दलों और बिकाऊ पत्रकारों के झांसे में भारत की जनता कभी नहीं आएगी !
         जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
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Tuesday, July 5, 2016

"ना धर्म बुरा , न कर्म बुरा ,ना गंगा बुरी ना जल बुरा "... !!! - पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक)-+9414657511

 मदीना की पाक मस्जिद के बाहर विस्फोट होने के बावजूद मुस्लिम धर्म से संबंधित लोग ये तय नहीं कर पा रहे कि निंदा करें तो किसकी करें ?तथाकथित धर्म-निरपेक्ष लोगों के कर्जदार पत्रकार लोग तो बेशर्म होकर आज भी सिर्फ भटके हुए नौजवान ही कहे जा रहे हैं !आतंकवाद हमारे गिरेबान तक पहुँच चुका है !रोज़ाना हत्याएं हो रही हैं !फिर भी सभी तरह की सरकारें उग्र्रवादियों  सीधा मुकाबला करने से घबरा रही हैं !क्या वास्तव में हम में हौसले की कमी है ?या युद्ध में काम आने वाले संसाधनों और पैसे की कमी है ?किस चीज़ का डर हमें सता रहा है ?
                       मोदी जी ने अपना मंत्रीमंडल बड़ा कर लिया !कोई ख़ास बात नहीं ये हक़ है उनका !लेकिन  पांच मंत्री हटा दिए गए ! ये नहीं बताया कि क्यों हटाए ? 15 अगस्त आने वाला है ! मोदी जी भारत की जनता को कैसे बता पाएंगे कि देश में राशन और सब्ज़ियों के दाम कम क्यों नहीं करवा पाये ?बेरोजगारी क्यों कम नहीं करवा पाए ?काला धन विदेशों से आम भारतीय के कहते में ना तो जमा होना था और ना ही होगा , क्योंकि वो तो केवल जनता को आम भाषा में समझने  कहा गया था !लेकिन ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि अभी तलक वो सरकार के खाते में क्यों नहीं पहुंचा ?
                        अगर मनरेगा की मजदूरी 400 /-रूपये रोज़ाना करके इसे शहरों में भी लागू कर दिया जाए !सभी विभागों को कह दिया जाए कि दस लाख तक के काम मनरेगा मजदूरों से ही करवाए जाएँ साल में 300 दिन तो क्या देश से बेरोजगारी भाग नहीं जायेगी ?अगर हर फसल के काम से कम और ज्यादा सेज्यादा भाव तय कर दिए जाएँ तो क्या महंगाई काम नहीं हो जायेगी ?इसी तरह दवाइयों को भी सस्ते दामों में जनता को उपलब्ध करवाया जा  सकता है !बिजली - पानी के बिलों में लगाए जा रहे टेक्सों को क्या हत्या नहीं जा सकता ?
                 जब आम आदमी के दिमाग में ऐसी कारगर योजनाएं आ सकती हैं जिनसे दिनों में ही नतीजे सामने आ सकते हैं तो हमारे नेताओं के दिमाग में ये सब क्यों नहीं आता है जी ??क्या सभी दलों के नेता "समस्याओं"को ज़िंदा रखे रहना चाहते हैं ?इसी लिए तो मैंने शीर्षक में रोटी-कपड़ा और मकान फिल्म के इस गीत को लिखा है कि ....
"  "ना धर्म बुरा , न कर्म बुरा ,ना गंगा बुरी ना जल बुरा "... !बुरे सिर्फ हमारे नेता हैं जो ना तो राम मंदिर बनाना चाहते हैं और ना ही किसी समस्या को पूरी तरह हल करना चाहते हैं !भगवान ही भला करे तो करे !
             जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
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"कुछ नहीं ,है भाता ,जब रोग ये लग जाता".....!!! - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतंत्र टिप्पणीकार) मो.न.+ 9414657511

वैसे तो मित्रो,! सभी रोग बुरे होते हैं !लेकिन कुछ रोग तो हमारा पीछा छोड़ देते हैं और कुछ आदमी की मौत तलक साथ देते हैं !पुराने जमाने में ऐसे ...