Wednesday, June 8, 2016

मेरे ट्वीट आपके लिए हाज़िर हैं !


  1. दिल्ली में युवाओं के नशे के बारे में क्यों चिन्तित नहीं हैं ये केजरीवाल जैसे नकसली लोग !!??
  2. "बुद्धा इन ट्रेफिक जाम"नामक फिल्म के jnu में प्रदर्शन नहीं होने देते वक़्त ये "अभिव्यक्ति की आज़ादी"वाले सब कहाँ "सो"रहे थे ?
  3. क्याफिल्मों में गंदेडायलॉग,गाने औरकहानियों सेही समस्याएं बताई जासकती है?अच्छे शब्दों काप्रयोग ज्ञानीजन ही करसकते हैं !दाऊद के गुर्गे नहीं?
  4. अच्छी फिल्म इंडस्ट्रीज में बुरे लोग और बुरा पैसा भी व्यापक रूपमें बरसों से हैतो ऐसों की "निष्ठा"क्यों ना चैक करी जाए ?डरना तो आपको पड़ेगा !
  5. Sonia Gandhi Christian conversion yojana..............

  6. टीवी चैनलों पर"स्तरहीन"बहसों का दौर मन को भटकाने लगता है,बोर हो जातेहैं!पैनल में शामिल लोग,प्रवक्ता भी निचले स्तर के होते हैं !विषय भी....?
  7. 5TH Pillar Corruption Killer: पिछले दरवाजे से सियासी लूट का लोकतंत्र .....??????...
  8. स्विट्जरलैंड के निवासियों से भारतीयों को भी कुछ सीखना चाहिए !उन्होंने बेरोजगारी भत्ते में हज़ारों रूपये हर महीने लेना अस्वीकार कर दिया !!
  9. कोई भी विषय चाहे क्यों ना हो ?जनता और कार्यकर्ताओं को तो बस नेताओं का भाषण ही सुनना पड़ेगा !हे भगवान् !हमें बचाओ !!इस भाषण नामक बीमारी से !
  10. मोदी सरकार भी अगर दुसरे राजनीतिक दलों कीतरह अपने नेताओं को बचाने हेतु "जांचें"ही करवाएगी तोफिर उनमे-हममे अंतरही क्या?समय सीमा क्यों नहीं ?
  11. हे विष्णु जी !!आप हर युग में एक-दो पापियों का वद्ध करके भगवान् बने फिरते हो ?मैं आपको तब मानूं जब आप भारत को "नेताओं"से मुक्त करा पाओ !!








अंग्रेजी सभ्यता के समर्थकों पहले भारत की संस्कृति-सभ्यता को जानो फिर बोलो-लिखो !!भारत आपका भी है !"5th पिल्लर करप्शन किल्लर"वो ब्लॉग जिसे आप रोज़ाना पढ़ना,बाँटना और अपने अमूल्य कॉमेंट्स देना चाहेंगे !
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Monday, June 6, 2016

पिछले दरवाजे से सियासी लूट का लोकतंत्र .....????????

साभार श्री पूण्य प्रसुन्न वाजपेयी जी की कलम से !

रेल मंत्री सुरेश प्रभु हैं महाराष्ट्र के लेकिन इनका नया ठिकाना आंध्रप्रदेश का हो गया । शहरी विकास मंत्री वेकैंया नायडू हैं आंध्र प्रदेश के लेकिन अब ये राजस्थान के हो गये । वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण हैं तो आंध्रप्रेदश की लेकिन अब कर्नाटक की हो गई । संसदीय राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी हैं तो यूपी के लेकिन अब इनका नया पता झारखंड का है । यानी चारों मंत्री को नये राज्यो में किराये पर घर लेना होगा या घर खरीदना होगा । फिर उसी पते के मुताबिक सभी का वोटिंग कार्ड बनेगा । यानी जो सवाल कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर बीजेपी उठाती थी कि जिन्हें असम का अ नहीं पता वह असम से राज्यसभा में कैसे और क्यो । तो सवाल सिर्फ इतना नहीं कि मंत्री बने रहे तो घर का पता और ठिकाना ही मंत्री का बदल जाये । और वह उस राज्य में पहुंच जाये जहा के बारे में जानकारी गूगल से आगे ना हो । तो दूसरा सवाल यह भी है कि जब देश के किसी भी हिस्से में रहने वाला वाला किसी नये प्रांत में जनता से कोई सरोकार रखे बगैर भी वहां से राज्यसभा सदस्य बनकर मंत्री बन सकता है तो उसकी जबाबदेही होती क्या है । और बिना चुनाव लड़े या चुनाव हारने के बावजूद अगर  किसी सरकार में मंत्रियो में फेहरिस्त राज्यसभा के सदस्यों की ज्यादा हो तो फिर लोकसभा सदस्य मंत्री बनने लायक नहीं होते या राज्यसभा सदस्य ज्यादा लायक होते हैं यह सवाल भी उठ सकता है । क्योंकि मौजूदा वक्त में मोदी सरकार को ही परखे तो दर्जन भर कैबिनेट मिनिस्टर राज्यसभा सदस्य है । फेहरिस्त देखें । वित्त मंत्री अरुण जेटली , रक्षा मंत्री पर्रिकर, शहरी विकास मंत्री वेकैंया नायडू, वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री सुरेश प्रभु, मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी , ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेन्द्र सिंह, उर्जा मंत्री पियूष गोयल, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान अल्पसंख्यक मंत्री नजमा हेपतुल्ला , संचार मंत्री रविसंकर प्रसाद, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, संसदीय राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी सभी राज्यसभा सदस्य । और महत्वपूर्ण यह भी है कि अरुण जेटली और स्मृति ईरानी गुजरात का प्रतिनिधित्व करते हैं । तो उडीसा के धर्मेन्द्र प्रधान बिहार का प्रतिनिधित्व करते हैं। और नजमा हेपतुल्ला यूपी की हैं लेकिन वह मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानी हर पांच बरस में लोकसभा चुनाव के जरीये सत्ता बदलने का एलान चाहे हो ।

लेकिन सत्ता चलाने वाले ज्यादातर राज्यसभा सदस्य हैं, जिन्हें जनता पांच बरस के लिये नहीं बल्कि पार्टियां ही अपनी वोटिंग से छह बरस के लिये चुनती है। और पांच बरस बाद देश में सत्ता चाहे बदल जाये लेकिन राज्यसभा सदस्यों पर सत्ता बदलने की आंच नहीं आती । वजह भी यही है कि मौजूदा वक्त में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्यो की संख्या बीजेपी से ज्यादा है ।लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह खेल मोदी सरकार में ही पहली बार हुआ । याद कीजिये मनमोहन सरकार में डेढ दर्जन कैबिनैट मिनिस्टर रासज्यसभा सदस्य थे । तो सवाल तब भी सवाल अब भी । तो क्या बीजेपी का भी कांग्रेसीकरण हो चुका है इसलिये जनता के सामने यह सवाल है कि उसे कुछ बदलता नजर नहीं आता चाहे सवाल राबर्ट वाड्रा का है । चाहे सवाल यूपी की बिसात का हो या फिर सवाल महंगाई का हो ।

तो बात राबर्ट वाड्रा से शुरु करें । दामादश्री यानी राबर्ट वाड्रा। और राबर्ट पर लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने आरोप सीधे लगाये कि वह घोटालो का बादशाह है । देश का सौदागर है । किसानों का अपराधी है । और माना यही गया कि दिल्ली में सत्ता बदली नहीं कि राबर्ट वाड्रा जेल में ही नजर आयेगे । लेकिन मोदी सरकार के दो बरस पूरे होने के बाद भी राबर्ट वाड्रा खुल्लम खुल्ला घूम रहे हैं और आरोपों के फेहरिस्त में एक नया नाम राबर्ट वाड्रा से जुडा कि लंदन में कथित संपत्ति है । और संबंध हथियारों के विवादित सोदेबाज से है। तो सवाल यही है कि राबर्ट वाड्रा का फाइल खुलती क्यों नहीं और अगर जमीनो को लेकर हरियाणा और राजस्थान में खुलती हुई दिखती है तो फिर राबर्ट वाड्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अभी तक शुरु हुई क्यो नहीं है। तो क्या कानूनी कार्रवाई हुई तो फिर मुद्दा ही खत्म हो जायेगा । क्याोंकि 2012 में दिल्ली और आसपास की जमीनो की खरीद में राबर्ट वाड्रा का नाम आया। हरियाणा में तब के कांग्रेसी सीएम हुड्डा पर राबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के जमीन खरीद में लाभ पहुंचाने का आरोप लगा । राजस्थान में गहलोत सरकार पर वाड्रा के लिये जमीन हथियाने का आरोप लगे । और राबर्ट वाड्रा के तमाम कच्चे चिट्ठे के साथ 27 अप्रैल 2014 को रविशंकर प्रसाद, जेपी नड्डा और बीकानेर से सांसद अर्जुन राम मेघवाल ने 'दामादश्री' नाम की एक आठ मिनट की फ़िल्म दिखायी । फिल्म देखकर और नेताओं के वक्तव्य सुनकर दो बरस पहले ही लगा था कि अगर यह सत्ता में आ गये तो फिर राबर्ट वाड्रा का खेल खत्म । यानी तो दो बरस पहले बीजेपी ने कांग्रेस शासित राज्य सरकारों पर वाड्रा के 'महल को खड़ा करने में सहयोग' देने का आरोप लगाया था । लेकिन दो बरस बाद भी हुआ क्या । सत्ता पलट गई । नेता मंत्री बन गये । और राबर्ट वाड्रा के खिलाफ कोई कार्रावाई हुई नहीं । दूसरा सवाल यूपी की बिसात का । जब
कांग्रेस की सत्ता थी तब राहुल गांधी यूपी के दलित के साथ रोटी खाते हुये नजर आते थे । अब बीजेपी की सत्ता है तो अमित शाह दलित के घर पर साथ बैठकर रोटी खाते नजर आते थे । लेकिन जिस यूपी को राजनीतिक तौर पर अपनी अपनी प्रयोगशाला बनाकर काग्रेस और बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग शुरु की उसका एक सच यह भी है कि यूपी में दलितों उत्पीडन के मामलो में ना तो कमी आई ना ही उनकी जिन्दगी में कोई बदलाव आया । क्योंकि 2010 से 2015 के बीच का दलित उतपीडन के सबसे ज्यादा मामले यूपी में ही दर्ज हुये ।आर्थिक तौर पर सबसे पिछडे यूपी के ही दलित रहे । शिक्षा के क्षेत्र में यूपी के ही दलित बच्चो ने सबसे कम स्कूल देखे । तो क्या राजनीति इसी का नाम है । या वोट बैक में बदली जा चुके जातियो को लेकर सियासत इसी का नाम है । हो जो भी लेकिन सोशल इंजीनियरिंग तले यूपी को नापने की तैयारी हर किसी की ऐसी ही है । और अब बीजेपी भी कांग्रेस की तर्ज पर उसी रास्ते पर । मसलन पिछड़ी जाति के वोट बैंक में सेंध लगने के लिये ही केशव प्रसाद मोर्या यूपी बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया । ब्राह्मणों को साधने के लिये शिव प्रताप शुक्ला को राज्यसभा भेजा गया । उनके धुर विरोधी योगी आदित्यनाथ को मोदी कैबिनेट में लाने की तैयारी हो रही है । इसी बीचे 94 जिला अध्यक्ष और नगर अध्यक्षो में से 44 पर पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति । तो 29 ब्राह्मण, 10 ठाकुर, 9 वैश्य और 4 दलित समाज से है । चूकि बीजेपी समझ चुकी है कि यूपी में यादव,जाटव और मुस्लिम मिलाकर 35 प्रतिशत हैं, जिनके वोट उन्हें मिलेंगे नहीं तो बीजेपी की नजर बाकि 65 प्रतिशत पर है। और बीजेपी के सोशल इंजीनियर्स को लगता हैं पिछड़ी और अगड़ी जातियों का समन्वय के आधार पर यूपी में बीजेपी की बहार आ सकती है । तो बीजेपी की नजर निषाद वोट बैंक से लेकर राजभर समाज में सेंध लगाने की है । झटका मायावती को देना है तो बीजेपी ने बौद्ध भिक्षुक की ब्रहम् चेतना यात्रा की शुरआत भी कर दी, जो अक्टूबर तक चलेगी । लेकिन यूपी में बीजेपी का चेहरा होगा कौन यह सवाल बीजेपी के माथे पर शिकन पैदा करता है क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग वोट दिला सकते है लेकिन यूपी का चेहरा कैसे दुरस्त हो यह फार्मूला किसी के पास नहीं है । क्योंकि यूपी का सच खौफनाक है । 12 करोड़ लोग खेती पर टिके हुये । 6 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे है । 3 करोड़ दलितों को दो जून की रोटी मुहैया नही है । 20 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं । लेकिन सबकुछ सियासी खेल की छांव में इसलिये छुप जाता है क्योकि देश को लगता यही है कि यूपी को जीत लिया तो देश को जीत लिया और दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही निकलता है । इसलिये पहली बार जनता की जेब से कैसे सरकार अपना खजाना भर रही है यह भी हर कोई देख रहा है लेकिन आवाज कही नहीं निकलती । 1 जून से दो जून की रोटी को महंगा करने वाली कई सेवाओं पर आधा फीसदी कृषि कल्याण सेस लागू हो गया । इससे सर्विस टैक्स 14.5 फीसदी से बढ़कर 15 फीसदी हो गई । यानी सारी चीजें महंगी हो गई । लेकिन समझना यह भी होगा कि सरकार कृषि सेस के जरिए कृषि और किसानों की योजनाओं के लिए पांच हजार करोड़ रुपए जुटाना चाहती है । लेकिन-कृषि सेस से कमाई को कही ज्यादा होगी । ठीक वैसे ही जैसे स्वच्छ भारत सेस समेत तमाम तरह के सेस से सरकार को हर साल करीब 1 लाख 16 हजार करोड़ रुपए की कमाई हो रही है । सिर्फ पेट्रोल-डीजल पर सेस से बीते साल सरकार को 21,054 करोड़ रुपए मिले । और मोदी सरकार के राज में अप्रत्यक्ष कर के जरिए खजाना भरने का खेल इस तरह चल रहा है कि एक तरफ सर्विस टैक्स सालाना 25 फीसदी की दर से बढ़ रहा है । तो दूसरी तरफ सेस और सर्विस टैक्स के जरिए इनडायरेक्ट टैक्स का बोझ लोगों पर इस कदर बढ रहै है कि जनता ने पिछले बरस अप्रैल में 47417 करोड अप्रत्यक्ष टैक्स दिया तो इस बरस अप्रैल में 64 394 करोड । यानी देश की समूची राजनीति ही जब जनता की लूट में लगी हो तो फिर सत्ता किसी की हो फर्क किसे पडता है ।

Thursday, June 2, 2016

कैसे बदलेगी राहुल गांधी की कांग्रेस???

नेहरु खानदान की चौथी पीढ़ी अगर यह सोचकर कांग्रेस की कमान संभालने की तैयारी कर रही है कि वह देश की कमान भी संभाल लेगी या जनता राहुल गांधी के हाथ में देश की बागडोर सौप देगी तो इससे ज्यादा बड़ा कोई सपना मौजूदा वक्त में हो नहीं सकता है। क्योंकि कांग्रेसियों को नहीं पता है कि उसे सर्जरी करनी भी है तो कहां करनी है। वोट बैंक तो दूर खुद बिखरे कांग्रेसियों को ही कांग्रेस कैसे जोड़े इस सच से वह दूर है। फिर आजादी के दौर के बोझ को लिये कांग्रेस मौजूदा सबसे युवा देश को कैसे साधे इसके उपाय भी नहीं है । इसीलिये कांग्रेस को लेकर सारी बहस कमान संभालने पर जा ठहर रही है। यानी सोनिया और राहुल के बीच फंसी कांग्रेस। यानी अभी सोनिया गांधी के हाथ में कमान है तो गंठबंधन को लेकर कांग्रेस लचीली है। सहयोगी भी सोनिया को लेकर लचीले हैं। अगर राहुल गांधी के हाथ में कमान होगी तो राहुल का रुख सहयोगियों को लेकर और सहयोगियों का कांग्रेस को लेकर रुख बदल जायेगा। तो क्या कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी से बड़ा कोई सवाल नहीं है। और राहुल गांधी के सामने कांग्रेस के सुनहरे युग को लौटाने के लिये खुद के प्रयोग की खुली छूट पाने के अलावा कोई बड़ा सवाल नहीं है। या फिर पहली बार गांधी परिवार फेल होकर पास होने के उपाय खोज रहा है । यानी गांधी परिवार को लेकर कांग्रेस में इससे पहले कोई सवाल नेहरु इंदिरा या राजीव के दौर में जो नहीं उठा वह सोनिया के दौर में राहुल गांधी को लेकर उठ रहे हैं। तो यह कांग्रेस की नही गांधी परिवार के परीक्षा की घड़ी है । लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई कांग्रेस बदलने को तैयार है। राहुल गांधी भी कांग्रेस के संगठन में ऐसा कोई परिवर्तन करने को तैयार है जिससे में नये चेहरे,नयी सोच, नये विजन का समावेश हो। क्योंकि कांग्रेसी कद्दावर नामों को ही देखिये। चिदंबरम, एके एंटोनी ,कपिल सिब्बल ,जयराम रमेश,आनंद शर्मा, अंबिका सोनी , गुलाम नबीं आजाद , आस्कर फर्नाडिस, चिरंजीवी, रेणुका चौधरी, पीएल पूनिया, व्यालार रवि। यह सभी चेहरे मनमोहन सिंह के दौर में उनके कैबिनेट मंत्री रहे हैं। और सभी मौजूदा वक्त में राज्य सभा में हैं। तो फिर कांग्रेस में बदला क्या है या बदलेगा क्या। 


क्योंकि एक तरफ सत्ता में रहते हुये गांधी पारिवार बदलते हिन्दुस्तन की उस नब्ज को पकड़ नहीं पाया जहा जनता की नुमाइन्दगी करते हुये जनता के प्रति कोई जिम्मेदारी कांग्रेसी नेता-मंत्रियों की होनी चाहिये। तो दूसरी तरफ जनता के बीच गये बगैर गांधी परिवार के घर या किचन के चक्कर लगाकर कैसे मंत्री बनकर कद बढाया जाता है इस सिद्धांत को कांग्रेस ने पाल पोसकर बढा कर दिया । और असर उसी का हुआ कि पसीना बहाकर कांग्रेस के लिये गांव गांव में खडा हुआ वोट क्लेक्टर कांग्रेस से ही निराश हो गया । नेता के पीछे कार्यकर्ता गायब हुआ तो 10 जनपथ की चाकरी से ही नेता को कद मिलने लगा । गांधी परिवार के इर्द-गिर्द का काकस सबसे ताकतवर कांग्रेसी नेता हो गया । यानी जो सवाल बार बार हर कांग्रेसी को परेशान करता है कि आखिर गांधी परिवार का औरा खत्म क्यों हो गया। या देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का सूपड़ा प्रांत दर प्रांत साफ क्यों होते चले जा रहा है। वह उन सवालो के मर्म से दूर है कि आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक या किसानों के भीतर भी बदलाव आया लेकिन कांग्रेस नहीं बदली। कांग्रेस के पांरपरिक वोटर के सरोकार सूचना तकनालाजी से बदल गये। लेकिन कांग्रेस नहीं बदली। यानी नेहरु की चौथी पीढ़ी राहुल गांधी के तौर पर सामाजिक-आर्थिक आधारो पर नहीं बदली लेकिन देश के किसान मजदूर, दलित अल्पसंख्यकों की चौथी पीढी ना सिर्फ बदली बल्कि मुख्यधारा में आने की उसकी छटपटाहट कहीं तेज हो गई। लेकिन कांग्रेस के भीतर विरासत की सत्ता से आगे राजनीति निकल नहीं पायी। इसीलिये यह सवाल बड़ा है कि क्या वाकई कांग्रेस का ट्रांसफारमेशन सोनिया से राहुल के पास सत्ता जाने भर से हो जायेगा । या फिर यब ऐसा दांव है जिसे खेलना मजबूरी है। ना खेलना कमजोरी है। तो इंतजार कीजिये राहुल एरा की शुरुआत का। क्योंकि उसकी पहली परीक्षा तो यूपी में होगी। और माना तो यही जा रहा है कि यूपी चुनाव से पहले राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन जायेंगे और यूपी की बिसात पर मोदी और राहुल के शह-मात का खेल 2019 के चुनाव की लकीर तय कर देगा।

यानी जिस आरक्षण के सवाल ने यूपी की राजनीति में कांग्रेस और बीजेपी को हाशिये पर ढकेल दिया। मुलायम-मायावती के सामाजिक समीकरण को तोड पाने में असफल हो गये । 25 बरस बाद उसी यूपी की राजनीति बिसात पर बीजेपी-कांग्रेस को बताना है कि वह कैसे एक दूसरे से बडे राजनीतिक दल है और मोदी-राहुल को दिकानाहै कि वह कैसे मुलायम-मायावती से बडे क्षत्रप हैं। ध्यान दें तो यूपी में मोदी की बिसात बिछने लगी है। जिसमें पिछडी जाति के मौर्य प्रदेश अध्यक्ष तो ब्रहमण शिवप्रताप शुक्ला राज्यसभा और जाट मेता भूपेन्द्र सिंह को विधान परिषद में भेजा। अगली कड़ी में शिवप्रताप शुक्ला के धुर विरोधी योगी आदित्यनाथ को केन्द्र में मंत्री बनाने की तैयारी हो रही है तो राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के जरीये यूपी में टिकटो पर आखरी मुहर की कवायद । यानी बीजेपी सोशल इंजीनियरिंग के हर उस माप दंड को परख रही है जिसे एक वक्त गोविन्दाचार्य ने उठाया और जिसे कल्याण सिंह ने आजमाया। तो दूसरी तरफ राहुल गांधी कांग्रेस संगठन को ही मथने के लिये तैयार है। कांग्रेस महासचिव , सचिव , राज्य प्रमुख और विभाग प्रमुख को बदलने के लिये तैयार है । पंचमडी शिविर की तर्ज पर मंथन शिविर की तैयारी यूपी चुनाव से पहले यूपी में ही करने की तैयारी है । लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई राहुल गांधी अब वोटरो से सीधा सरोकार चाहते है । क्योकि कांग्रेसी कार्यकर्ता तो सडक पर निकलने को तैयार है लेकिन वह बिना आधार वाले या भ्रष्ट कांग्रेसियो के पीछे भीड के रुप में खडे होने को तैयार नहीं है । तो आखरी सवाल यही कि जिस दौर में हिन्दुस्तान सबसे युवा है उस दौर में राहुल ही कांग्रेस में एकमात्र युवा रहेंगे या कांग्रेस भी युवा होगी ।

"निराशा से आशा की ओर चल अब मन " ! पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक)

प्रिय पाठक मित्रो !                               सादर प्यार भरा नमस्कार !! ये 2020 का साल हमारे लिए बड़ा ही निराशाजनक और कष्टदायक साबित ह...