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Showing posts from December, 2014

"नव-वर्ष की बेला पर "बुरे" अगर बुराइयाँ नहीं त्यागें , तो आप सब "अच्छे लोगो" अच्छाइयाँ करना मत त्यागना "!- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक)

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प्रिय पाठक मित्रो !! सादर नमस्कार ! और नव-वर्ष की शुभ-मंगल-कामनाओं सहित अभिवादन स्वीकार करें !जैसे कि अच्छे लोग कहते हैं कि हर नव वर्ष पर प्रत्येक मनुष्य को अपने अंदर बसी हुई किसी बुराई को त्यागना चाहिए और कोई अच्छी बात को अपनाना चाहिए ! देखने में ये आया है कि कई मित्र नव-वर्ष पर कोई प्रण तो ले लेते हैं लेकिन कुछ समय बाद उसे भूल जाते हैं और ज़िंदगी वापिस उसी ढर्रे पर चलने लगती है !लेकिन हमें अपनी कोशिश जारी रखनी ही चाहिए !
                    इन्हीं बातों पर चलते हुए मैंने 31 दिसंबर 2010 को अपनी सभी बुराइयों-व्यसनों को एक साथ छोड़ दिया था !वो बुराइयां कौन-कौन सी थीं , ये मैं स्वहित में नहीं बताऊंगा , लेकिन इतना अवश्य बताऊंगा कि आज तक मैं उन सभी बुराइयों को अपने से दूर रखने में कामयाब रहा हूँ ! !अभी कल मैंने ये प्रण लिए हैं कि मैं राजनितिक दल और समाज-सेवी संस्थाओं में किसी पद पर नहीं रहूँगा !और एक समय भोजन करूँगा !
               देखते हैं ! ये सब करने में मैं कितना सफल रह पाउँगा ??शुगर-ब्लड-प्रेशर आदि से इस उम्र में ग्रस्त होना आम बात है , क्योंकि वैज्ञानिकों की तरक्की के कारण हमें खाद्य-…

"दिल वालों की दिल्ली का अब कौन बनेगा रानी या राजा "??-पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक)

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 आधुनिक भारत के महान क्रन्तिकारी श्रीमान अरविन्द केजरीवाल साहब और उनकी पूरी टीम को भला कौन नहीं जानता जी ! सब जानते हैं कि ये सब लोग इस दहाई के महानतम धरणाधारी श्रीमान अन्ना-हज़ारे के लोकपाल-बिल हेतु दिए गए धरने की संताने हैं !अन्ना जी तो धरना देकर , लोकपाल बिल मनमोहन सरकार से पास करवाकर कबके वापिस महाराष्ट्र को कूच कर गए ! लेकिन इस केज़रीवाल - टीम के पास शायद और कोई काम बचा नहीं , या फिर इन्हें नेतागीरी कुछ ज्यादा ही भा गयी है , इसीलिए शायद ये सब कसम खाए बैठे हैं कि दिल्ली के राजा अवश्य बनेंगे ! चाहे सारे चेनेल के एंकरों को मंत्री क्यों ना बनाना पड़े ! 
           मेरे प्रिय मित्र श्री मान पुण्य-प्रसुन्न वाजपेयी जी  इनकी चलों के शिकार हो चुके हैं ! जिसे सबने टीवी पर देखा था ! जी हाँ जी !!! ये केजरीवाल टीम यही सोचती रहती है कि किसे कैसे फँसाया जाये ?? कि हमारा उद्देश्य हमें मिल जाए ??नाटक और ड्रामे  ये सब माहिर हैं ! इसीलिए तो जिन्होंने इनके थप्पड़ मारे , वो इन्हीं के ही सदस्य हैं ! जिन्होंने स्याही फेंकी  इन्ही के ही हैं ! हमारे भोले-प्रिय मित्र प्रसुन्न जी इनके बारे में  और दिल्ली की राज…

'भारत रत्न' के एलान से राजधर्म का कर्ज उतर गया !

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"मेरा एक ही संदेश है कि राजधर्म का पालन करें। राजधर्म....। यह शब्द काफी सार्थक है। मै इसी का पालन कर रहा हूं। पालन करने का प्रयास कर रहा हूं। राजा के लिये शासक के लिये प्रजा प्रजा में भेद नहीं हो सकता। ना जन्म के आधार पर ना जाति के आधार पर ना संप्रदाय के आधार पर। [ हम भी वही कर रहे हैं साहेब] मुझे विश्वास है कि नरेन्द्र भाई भी यही करेंगे।"

राजधर्म शब्द भी सियासी कटघरा हो जायेगा, यह न तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने बोलते वक्त सोचा होगा ना ही गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये नरेन्द्र मोदी ने सोचा होगा कि २००२ से २०१२ तक राजधर्म के कटघरे में बार बार उन्हें आजमाने की कोशिश होगी।  बारस बरस पहले वाजपेयी के सिर्फ साठ सेकेंड के इस वक्तव्य ने नरेन्द्र मोदी के सामने राजधर्म का इम्तिहान बार बार रखा। और हर बार गुजरात चुनाव जीतने के बाद भी राजधर्म शब्द ने २०१२ तक मोदी का पीछा भी नहीं छोड़ा। और दस बरस तक यह ऐसा सवाल बना रहा जो बार बार वाजपेयी और मोदी के नाम का एकसाथ जिक्र होते ही हर जुबा पर बरबस आया ही। संयोग देखिये जैसे ही बुधवार की सुबह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत …

" हम किसी के प्रिय नहीं , तो क्या , इसलिए हम सबके विरोधी हैं "??-पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक)

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आज क्रिसमिस की छुट्टी थी,सर्दी भी अपने चरम स्तर पर थी,तो रजाई से उठने का मन ही नहीं कर रहा था ! सुबह से दो बार चाय पी चुके थे ! एक बार फिर चाय पीकर नहाने-धोने की सोचकर श्रीमती जी को अधिकार भरे लहजे में हम बोले , हे भागवान !! ज़रा एक कप चाय तो और देदो , कड़क सी ! रसोई से " कड़कती " हुई आवाज़ आई सारा दिन चाय ही पीते रहोगे क्या ?, या फिर कोई काम-धाम भी करोगे ?ये ठीक कराना है , उसे साफ़ करना है ,आता पिसवाने भी जाना है ?10 बजने को हैं !
           मैं बोला बस एक कप चाय मांग ली तो इतनी शिकायतें हमसे हो गयीं आपको ?? पडोसी को देखो !! वो कितना सुख भोग रहा है ! हमारे भाग्य में पत्नी- प्यार नहीं बल्कि झिड़कियां ही लिखीं हैं क्या ?पत्नी  बोलीं लाती हूँ ज्यादा डायलॉग मत मारो लेखक जी ! पत्नी द्वारा दी गयी मीठी-कड़क चाय का एक घूँट भरा ही था कि साहेबज़ादे आ गए बोले पापा जी 500 रूपये दीजिये आज पार्टी देनी है दोस्तों को ! मैं बोला , बेटा !! हम क्रिश्चियन तो नहीं बने हैं आज तक , तो फिर पार्टी किस बात की ? तुम्हारा जनम दिन भी नहीं है आज और शादी के लायक तुम अभी हुए नहीं ! अंदर से पत्नी जी फिर बोलीं , तुम…