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Showing posts from 2016

"चूहे - चुहियाँ "- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. +9414657511

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माननीय मुलायम सिंह जी का "मान"अभिमान बनकर सामने एकबार फिर से आ गया है !चचा शिवपाल और अमर सिंह जी हमेशां की तरह दोषी ठहराए जा रहे हैं !तो रामगोपाल यादव जी भतीजे के साथ जाँघों पर हाथ मारकर "दंगल" को तैयार खड़े हैं ! आजमखान जी अपनी डूबती लुटिया को बचाने हेतु अतीक अहमद के इशारे पर "सेकुलर ताकतों "को मजबूत करने वास्ते  अखिलेश को एक बार फिर मुलायम जी के चरण पकड़वाकर माफ़ी मंगवाने हेतु ले गए हैं !
                         देखते हैं "ऊँट किस करवट बैठता"है जी !लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि "समाजवादी"बड़ी ही "चतुराई"से काम ले रहे हैं !जनता और बाकी की राजनितिक पार्टियां शायद "गच्चा" खा जाएँ !"अंदर की बात"ये है कि ये सब एक नाटक का हिस्सा है जो शोर शराब जनता को पत्रकारों के ज़रिये दिखाया जा रहा है !असल में इनका मानना है कि जितनी सीटें समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर मिल जाएँ वो भलीं, और बाकी की कमीं अखिलेश और कोंग्रेस से समझौता-गठबंधन करके मिलजाएं वो और ज्यादा बेहतर होगा ! यानिकि "चित भी मेरी और पट भी मेरी", दोनो…

"यादें - 2016 की ,कुछ अच्छी ,तो कुछ कड़वीं "!? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. - +9414657511

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मित्रो !! सादर प्यार भरा नमस्कार स्वीकार करें !ये जो जीवन है , चलने का ही नाम है !कोई कहता है , "ज़िन्दगी सिग्रेट का धुंआ ", तो कोई कहता है कि ,"ज़िन्दगी हर कदम , इक नयी जंग है "! किसी ने तो जिंदगी को एक नाटक का ही नाम दे दिया !सबने अपने जीवन के अनुभव के अनुसार इसको अपनी उपमाएं दी हैं !इसलिए सभी सच लगती हैं !
                            तो मित्रो ! चलते चलते  वर्ष 2016 भी समाप्त होने जा रहा है और अंग्रेजों द्वारा प्रचलित 2017 आने वाला है !आप सबको इस आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभ-कामनाएं ! सुखभरी घटनाएं रोज़ आपके जीवन में आती रहें !प्रकृति माता आपके ऊपर मेहरबान रहे !आइये कुछ चित्रों द्वारा वर्ष 2016 की यादों को आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ !जिसमे सामजिक,राजनितिक,प्राकृतिक और विश्व की मुख्य घटनाएं चित्रों द्धारा आपको दिखने का प्रयास करता हूँ ! 















"5th पिल्लर करप्शन किल्लर" "लेखक-विश्लेषक पीताम्बर दत्त शर्मा " वो ब्लॉग जिसे आप रोजाना पढना,शेयर करना और कोमेंट करना चाहेंगे ! link -www.pitamberduttsharma.blogspot.com मोबाईल न. + 9414657511

" क्या पत्रकारिता, केवल चाटुकारिता,दलाली,और "घटिया नेताओं के स्तरहीन कार्यों" पर मिले "तंज"पर "अनर्गल प्रलाप" का ही नाम है " ??

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मुझे इतने दिनों तलक कोई विषय ही नहीं मिल पा रहा था ,अपने विचार आप तक पहुंचाने हेतु !लेकिन परसों जैसे ही "महान पार्टी कोंग्रेस के महान नेता राहुल गांधी"ने गुजरात में जाकर अपना स्पेशल लिखवाया हुआ भाषण एक विशेष अंदाज़ में हमें सुनाकर हमें अनुग्रहित किया , पूछिए मत !हम धन्य हो गए कि चलो , भाई कुछ सीखना चालु तो कर रहा है !चाहे केजरी-प्रशांत के पुराने आरोप,जिन्हें न्यायालय खारिज कर चुका था , को ही पढ़ा गया !हम और हमारे जैसे बिकाऊ,चाटुकार,दलाल टाइप के पत्रकार प्रसन्न हुए और "वारे-वारे-जा"रहे थे !लेकिन कल मोदी जी ने जो उनके भाषण की बखिये उधेड़ीं,और उनको-हम जैसों को नँगा किया ,हमारा सभी प्रकार का "कालापन" बाहर आ गया !
                     तो कल ही "रविश कुमार"ने सारा प्राइम-टाइम अभय दूबे और नीरिजा जी के साथ मिलकर राहुल को बड़ा नेता बताने और भ्रष्ट नेताओं को बचाने में बर्बाद कर दिया ! जनता पर उनके घूम-फिराकर चमचागिरी करने की चाल को अच्छी तरह से समझ लिया !लेकिन सवाल ये उठता है कि ये पत्रकार ऐसा सब करने को क्यों मजबूर हो जाते हैं ,जो पत्रकारिता के मूल नियम-क़ानून…

करप्शन की गंगोत्री राजनीति से निकलती है, अब तो मान लीजिए........!!!! - पुण्य प्रसून बाजपेयी

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हफ्ते भर पहले ही चुनाव आयोग ने देश में रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों की सूचीजारी की। जिसमें 7 राष्ट्रीय राजनीतिक दल और 58 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जिक्र है। लेकिन महत्वपूर्ण वो सूची है, जो राजनीतिक तौर पर जिस्टर्ड तो हो चुकी है और राजनीतिक दल के तौर पर रजिस्टर्ड कराने के बाद इस सूची में हर राजनीतिक दल को वह सारे लाभ मिलते है जो टैक्स में छूट से लेकर। देसी और विदेशी चंदे को ले सकते हैं। बीस हजार से कम चंदा लेने पर किसी को बताना भी नहीं होता कि चंदा देने वाला कौन है। और इस फेहरिस्त में अब जब ये खबर आई कि चुनाव आयोग 200 राजनीतिक दलों को अपनी सूची से बाहर कर रहा है। सीबीडीटी को पत्र लिख रहा है। क्योंकि ये पार्टियां मनीलान्ड्रिंग में लगी रहीं। तो समझना ये भी होगा कि चुनाव आयोग की इस फेहरिस्त में सिर्फ दो सौ या चार सौ राजनीतिक दल रजिस्टर्ड नहीं है जिन्होंने चुनाव नही लड़ा और सिर्फ कागज पर मौजूद है। बल्कि ऐसे राजनीतिक दलों की फेहरिस्त 13 दिसंबर यानी पिछले हफ्ते तक 1786 राजनीतिक दलों की थी। और इन राजनीतिक दलो की फेहरिस्त में इक्का दुक्का या महज दो सौ राजनीतिक दल नहीं है जो टैक्स रिटर्न तक फाइल नह…

Disabled man spreading message of 'Beti bachao Beti padhao'

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प्रिय मित्रो !! मेरी होनहार बेटी सुकृति शर्मा ,जो आजकल "पत्रिका-राजस्थान"के नए शुरू होने जा रहे टीवी चेनेल में प्रोड्यूसर एवम एंकर के पद पर जयपुर में कार्यरत है , ने ये बड़ा ही शानदार प्रोग्राम बनाया है ! इसे आप भी देखिये और अपने मित्रों को भी दिखाइए ! अपना आशिर्वाद स्वरूप कॉमेंट भी लिखिए ! सधन्यवाद !- आपका अपना , पीताम्बर दत्त शर्मा !!

"5th पिल्लर करप्शन किल्लर" "लेखक-विश्लेषक पीताम्बर दत्त शर्मा " वो ब्लॉग जिसे आप रोजाना पढना,शेयर करना और कोमेंट करना चाहेंगे ! link -www.pitamberduttsharma.blogspot.com मोबाईल न. + 9414657511




हर आंख में एक सपना है...!!!

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पानी, बिजली, खाना, शिक्षा, इलाज,घर, रोजगार बात इससे आगे तो देश में कभी बढी ही नहीं । नेहरु से लेकर मोदी के दौर में यीह सवाल देश में रेगते रहे। अंतर सिर्फ इतना आया की आजादी के वक्त 30 करोड में 27 करोड लोगो के सामने यही सवाल मुहं बाये खडे थे और 2016 में सवा सौ करोड के देश में 80 करोड नागरिको के सामने यही सवाल है । तो ये सवाल आपके जहन में उठ सकता है जब हालात जस के तस है तो किसी को तो इसे बदलना ही होगा । लेकिन इस बदलने की सोच से पहले ये भी समझ लें वाकई जिस न्यूनत की लडाई 1947 में लडी जा रही थी और 2016 में उसी आवाज को नये सीरे से उठाया जा रहा है उसके भीतर का सच है कया । सच यही है कि 80 लाख करोड से ज्यादा का मुनाफा आज की तारिख में उसी पानी, बिजली,खाना, शिक्षा, इलाज घर और रोजगार दिलाने के नाम पर प्राईवेट कंपनियो के टर्न ओवर का हिस्सा बन जाता है । यानी जो सवाल संसद से सडक तक हर किसी को परेशान किये हुये है कि क्या वाकई देश बदल रहा है या देश बदल जायेगा । उसके भीतर का मजमून यही कहता है कि 150 अरब से ज्यादा बोतलबंद पानी का बाजार है । 3 हजार अरब से ज्यादा का खनन-बिजली उत्पादन का बाजार है । 500 अर…

"मोदी जी से ,पूछे हर दिहाड़ी करनेवाला ,मेरा धन क्यों काला "?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक-विचारक) मो.न.- +9414657511.

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परम् भक्त सूरदास जी के अनुसार , यशोमति मैया से एक बार कान्हा ने पूछा था कि हे मैया मैं काला क्यों हूँ ,तो मैया ने बड़े प्यार से उन्हें समझाया था !ठीक उसी तरह आज हर भारत वासी हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री जी के नोटबन्दी कार्यक्रम का समर्थन करते हुए ,बड़ी विनम्रता से ये भी पूछना चाह रहा है कि मेरा मेहनत से कमाया हुआ धन "काला" कैसे हो गया ? कौन जिम्मेदार है इस के लिए?क्या मैं अकेला जिम्मेदार हूँ ? अगर हाँ तो मुझे आर्थिक और शारीरिक दण्ड अवश्य दिया जाए !लेकिन अगर इस सबके पीछे कंही हमारे पूर्व भृष्ट शासकों और  निक्कमी व्यवस्था  भी जिम्मेदार है तो हर उस व्यक्ति को माफ़ी मिलनी ही चाहिए जो चाहे-अनचाहे इस भ्रष्ट - व्यवस्था का हिस्सा बन गया ! उसे इतनी सज़ा ही बहुत है जितनी उसे लाइनों में लगकर खड़े होने से,और अस्पतालों में धक्के खाकर मिल चुकी है !
                         उसकी गलती केवल ये है कि वो अपनी मेहनत से कमाए हुए धन को भारत के क़ानून अनुसार आयकर विभाग को बता नहीं पाया या बैंकों में     समयानुसार जमा नहीं करवा पाया  !लेकिन आपके आदेशानुसार मोदी जी आज हर मेहनतकश ने अपनी सारी पूँजी बैंकों मे…

काश ! मोदी जी के समाजवाद का सपना सच हो जाए...??

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देश के शहर दर शहर घूम लीजिये। बाजारों में चकाचौंध है। दुनिया भर के ब्रांडेड उत्पाद से भरी दुकान\मॉल हैं। देखते देखते बीते 20 बरस में भारत का बाजार इतना ब़डा हो गया कि दुनिया के बाजार में भारत के बाजार की चकाचौंध की धूम तले हिन्दुस्तान का वह अंधेरा ही छुप गया जो बाजार में बदलते भारत से कई गुना ज्यादा बड़ा था। लेकिन सच यही है हिन्दुस्तान के अंधेरे की तस्वीर कभी संसद को डरा नहीं सकी। नेताओं के ऐश में खलल डाल नहीं सकी। अंधेरे में समाया हिन्दुस्तान अपनी मौत लगातार मरता रहा। और इनकम और कैलोरी की लकीर पर खड़ा होकर गरीबी की रेखा को पार करने के लिये ही छटपटाता रहा। तो हिन्दुस्तान की इस दो तस्वीरों को पाटने के लिये ही क्या नोटबंदी का जुआ प्रदानमंत्री मोदी ने चला है। या फिर उस राजनीति को साधने के लिये यह जुआ खेला, जिसमें वोटबैक जाति-धर्म की लकीर को छोड़ दें। यानी एक तरफ 45 करोड उपभोक्ता। जो दुनिया के किसी भी विकसित देश से कहीं ज्यादा। दूसरी तरफ 80 करोड भूख से बिलबिलाते नागरिक। जो दुनिया के कई देशो को खुद में समा लें। तो पहली बार खरीदारों या कन्ज्यूमर के हाथ बंध गये हैं। चकाचौंध बाजार की रईसी थम…

भ्रष्ट सिस्टम और ब्लैक मनी पर टिकी राजनीति से सफाई कैसे होगी ?

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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार के दिन राज्यसभा मेंप्रधानमंत्री मोदी को नोटबंदी पर चेतावनी दी। और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कभी गंभीर हुये कभी मुस्कुराये। और भोजनावकाश के बाद विधान पर टिके राज्यसभा का ही डिब्बा गोल हो गया क्योंकि सदन में पीएम नहीं पहुंचे। तो ऐसे में पूर्व पीएम ने भी नहीं सोचा कि सदन में आलथी पालथी मारकर तबतक बैठ जाये जब तक संकट में आये देश के निकलने का रास्ता पीएम मोदी आकर ना बताये। एक ने कहा। दूसरे ने सुना। और संसद ठप हो गई । तो 62 करोड़ नागरिक जो गांव में रहते है और करीब 29 करोड नागरिक जो शहरों की मलिन बस्स्तियों और झोपडपट्टियों में रहते हैं, उनकी जिन्दगी से तो जीने के अधिकार शब्द तक को छीना जा रहा है उस पर कब कहां किसी पीएम ने बात की। और 90 करोड़ नागरिकों से ज्यादा के इस हिन्दुस्तान का सच तो यही है कि न्यूनतम की जिन्दगी भी करप्शन और नाजायज पैसे पर टिकी है। गांव में हैडपंप लगाना हो। घर खरीदना हो । रजिस्ट्री करानी हो। सरकार की ही कल्याणकारी योजनाओं का पैसा ही बाबुओं से निकलवाना हो। बैंकों के जरीये सरकार के पैसे को बांटना हो। यानी जहां तक जिसकी सोच …

"प्रधानमंत्री जी हाज़िर हों "$$$$$ !!- लेखक-विश्लेषक-विचारक(पीताम्बर दत्त शर्मा)मो.न. +9414657511

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भारतीय संसद की सभी रीतियों व परम्पराओं को तोड़ते हुए विपक्षी नेता शिकारी कुत्तों की तरह कल से संसद को चलने नहीं दे रहे !बारी-बारी से वे राज्यसभा और लोक सभा अध्यक्ष एवम अध्यक्षा की आज्ञा के बिना खड़े होकर अपने आदेश सदन की "चेयर"को सुनाने लग पड़ते हैं !एक चुप होता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है और दूसरा चुप होता है तो तीसरा अपनी "काँव -काँव"शुरू कर देता है !बहाना तो ये है कि भारत की जनता परेशान है लेकिन कॉमरेडों और कोंग्रेसियों की यूनियनें सहकारी बैंकों में हड़ताल भी करवा रहीं हैं क्यों ?केवल एक ही रट लगाए बैठे हैं की दोनों सदन तब चलने देंगे अगर प्रधानमंत्री जी दोनों सदनों में दोनों जगह पूरी बहस में हाज़िर रहें !
                       कोई इन मूर्खों से पूछे कि एक प्रधानमंत्री एक ही समय में दोनों सदनों की बहस कैसे सुन सकता है ?सभी प्रकार के आश्वासन राज्यसभा के नेता और उपाध्यक्ष द्वारा दिए जा चुके हैं !फिर भी ये विपक्षी बहस नहीं चलने दे रहे हैं !इनकी एक और "चालाकी"  भी सामने आ रही है , वो ये कि विपक्षी लीडर तो अपना भाषण दे चुके लेकिन सत्तापक्ष के भाषण के समय व्यवधान ड…

पंडारा बॉक्स तो मोदी ने खोल ही दिया है....!!

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प्रधानमंत्री मोदी चौतरफा घिरे हैं और यही उनकी सफलता है। क्योंकि जिस नेता को केन्द्र को रखकर समूची राजनीति सिमट गई है। वह नेता जनता की नजर में भारतीय राजनीति की खलनायकी में खलनायक होकर भी नायक ही दिखायी देगा। क्योंकि राजनीतिक सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में जनतंत्र है नहीं और राजनीतिक लोकतंत्र अपने गीत गाने के लिये वक्त-दर वक्त नायक खोज कर खुद को पाक साफ दिखाने से चूका नहीं है। तो सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर मुलायम या मायावती, संसद में सभी की जुबां पर मोदी हैं तो सड़क पर ममता और केजरीवाल के निशाने पर भी मोदी हैं। तो मोदी का कद झटके में सियासी पायदान पर सबसे उपर है। और जो दबाव धंधे वालों से लेकर गांव-खेत में दिखायी दे रहा है, उसकी बदहाली के लिये वही राजनीति जिम्मेदार है, जिसे मोदी डिगाना चाहते हैं। तो क्या पहली बार सत्ता ही जनवादी सोच लिये भ्रष्ट पारंपरिक राजनीति को ही अंगूठा दिखा रही है। यानी इतिहास के पन्नों को पलटें तो जेपी चाहे संपूर्ण क्रांति का नारा देकर चूक गये। अन्ना हजारे चाहे जनलोकपाल की गीत गाकर चूक गये। लेकिन मोदी कालाधन का राग गाते हुये चूकेंगे नहीं…

संसद से नहीं बैंक से निकलेगा लोकतंत्र का नया रागsaabhaar

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जब संसद सड़क के सामने छोटी लगने लगे तो फिर नेताओं का रास्ता जाता किधर है। सड़क के हालात बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में देश के करीब 55 करोड़ लोगों ने वोट डाले लेकिन आज की तारीख में शहर दर शहर गांव दर गांव 55 करोड़ से ज्यादा लोग सड़क पर उस नोट को पाने के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं जिसका मूल्य ना तो अनाज से ज्यादा है और ना ही दुनिया के बाजार में डॉलर या पौंड के सामने कहीं टिकता है। फिर भी पहले वोट और अब नोट के लिये अगर सड़क पर ही जनता को जद्दोजहद करनी है तो क्या वोट की तर्ज पर नोट की कीमत भी अब प्रोडक्ट नहीं सरकार तय करेगी। क्योंकि मोदी सरकार को 31 फिसदी वोट मिले। यानी खिलाफ के 69 फिसदी वोट का कोई मूल्य संसदीय राजनीति में कोई मायने रखता ही नहीं है। ठीक इसी तरह 84 फीसदी मूल्य के नोट के खत्म होने के बाद 16 फिसदी मूल्य की रकम महत्वपूर्ण हो गई। यानी रोजाना चार हजार रकम के खर्च करने का समाजवाद सड़क पर आ गया। तो क्या समाजवाद के इस चेहरे के लिये देश तैयार हो चुका है या फिर जिस संसद की पीठ पर सवार होकर लोकतंत्र का राग देश में गाया जा रहा है, पहली बार संसदीय लोकतंत्र को ही सडक का जनतंत्र ठे…