Sunday, February 24, 2013

"टीका मस्तक की शोभा,या वैज्ञानिकता " ! !


तिलक-टीका: आज्ञा चक्र के भेद
योग ने उस चक्र को जगाने के बहुत-बहुत प्रयोग किये है। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मतरण पूर्वक अगर चौबीस घण्टेु उस चक्र पर बार-बार ध्यालन को ले जाता है तो बड़े परिणाम आते है। अगर तिलक लगा हुआ है तो बार-बार ध्यासन जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्था।न पृथक हो जाता है। वह बहुत सेंसिटिव स्थाघन है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे, आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, बहुत संवेदनशील जगह है। सम्भावत: शरीर में वि सर्वाधिक संवेदनशील जगह हे। उसकी संवेदनशीलता का स्पार्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पेर्श करने की विधि है—जैसे चंदन का तिलक लगाना।

सैकड़ों और हजारों प्रयोगों के बाद तय किया था कि चन्दखन का क्योंग प्रयोग करना है। एक तरह की रैजोनेंस हे चंदन में। और उस स्थागन की संवेदनशीलता में। चंदन का तिलक उस बिन्दु  की संवेदनशीलता को और गहन करता है। और घना कर जाता है। हर कोई तिलक नहीं करेगा। कुछ चीजों के तिलक तो उसकी संवेदनशीलता को मार देंगे, बुरी तरह मार देंगे आज स्त्रि यां टीका लगा रही है। बहुत से बाजारू टीके है वे उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है। उनका योग से कोई लेना देना नहीं है। वे बाजारू टीके नुकसान कर रहे है। वह नुकसान करेंगे।

सवाल यह है कि संवेदनशीलता को बढ़ाते है या घटाते है। अगर घटाते है संवेदनशीलता को तो नुकसान करेंगे, और बढ़ाते है तो फायदा करेंगे। और प्रत्ये क चीज के अलग-अलग परिणाम है, इस जगत में छोटे से फर्क पड़ता है। इसको ध्याफन में रखते हुए कुछ विशेष चीजें खोजी गयी थी। जिनका ही उपयोग किया जाए। यदि आज्ञा का चक्र संवेदनशील हो सके, सक्रिय हो सके तो आपके व्योक्तिजत्व  में एक गरिमा और इन्टीकग्रिटी आनी शुरू होगी। एक समग्रता पैदा होगी। आप एक जुट होने लगते है। कोई चीज आपके भीतर इकट्ठी हो जाती है। खण्डी-खण्डत नहीं अखण्डज हो जाती है।

इस संबंध में टीके के लिए भी पूछा है तो वह भी ख्याशल में ले लेन चाहिए। तिलक से थोड़ा हटकर टीके को प्रयोग शुरू हुआ। विशेषकर स्त्रि्यों के लिए शुरू हुआ। उसका कारण वही था, योग का अनुभव काम कर रहा था। असल में स्त्रि यों का आज्ञा चक्र बहुत कमजोर चक्र है—होगा ही। क्यों कि स्त्री  का सारा व्यक्तित्व निर्मित किया गया है समर्पण के लिए। उसके सारे व्य क्तिचत्व  की खूबी समर्पण की है। आज्ञा चक्र अगर उसका बहुत मजबूत हो तो समर्पण करना मुश्किकल हो जाएगा। स्त्री  के पास आज्ञा का चक्र बहुत कमजोर हे। असाधारण रूप से कमजोर है। इसलिए स्त्री  सदा ही किसी का सहारा माँगती रहेगी। चाहे वह किसी रूप में हो। अपने पर खड़े होने का पूरा साहस नहीं जुटा पायेगी। कोई सहारा किसी के कन्धेव पर हाथ, कोई आगे हो जाए कोई आज्ञा दे और वह मान ले इसमें उसे सुख मालूम पड़ेगा।

स्त्रीप के आज्ञा चक्र को सक्रिय बनाने के लिए अकेली कोशिश इस मुल्कऔ में हुई है, और कहीं भी नहीं हुई। और वह कोशिश इसलिए थी कि अगर स्त्रीो का आज्ञा चक्र सक्रिय नहीं होता तो परलोक में उसकी कोई गति नहीं होती। साधना में उसकी कोई गति नहीं होती। उसके आज्ञा चक्र को तो स्थि र रूप से मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन अगर यह आज्ञा चक्र साधारण रूप से मजबूत किया जाए तो उसके स्त्रैरण होने में कमी पड़ेगी। और उसमें पुरुषत्व के गुण आने शुरू हो जायेंगे। इसलिए इस टीके को अनिवार्य रूप से उसके पति से जोड़ने की चेष्टाी की गई। उसके जोड़ने का करण है।

इस टीके को सीधा नही रखा दिया गया उसके माथे पर, नहीं तो उसके स्त्री त्वर कम होगा। वह जितनी स्वटनिर्भर होने लगेगी उतनी ही उसकी कमनीयता, उसका कौमार्य नष्ट् हो जाएगा। वह दूसरे का सहारा खोजती है इसमें एक तरह की कोमलता हे। पर जब वह अपने सहारे खड़ी होगी तो एक तरह की कठोरता अनिवार्य हो जाएगी। तब बड़ी बारीकी से ख्याहल किया गया कि उसको सीधा टीका लगा दिया जाए,नुकसान पहुँचेगा उसके व्यरक्ति त्वि में,उसमे मां होने में बाधा पड़ेगी, उसके समर्पण में बाधा पड़ेगी। इसलिए उसकी आज्ञा को उसके पति से ही जोड़ने का समग्र प्रयास किया गया। इस तरह दोहरे फायदे होंगे। उसके स्त्रैजण होने में अन्त र नहीं पड़ेगा। बल्किा अपने पति के प्रति ज्याेदा अनुगत हो पायेगी। और फिर भी उसकी आज्ञा का चक्र सक्रिय हो सकेगा।

इसे ऐसा समझिए, आज्ञा का चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए, उसके विपरीत कभी नहीं जाता। चाहे गुरु से संबंधित कर दिया जाए तो गुरु के विपरीत कभी नही जाता। चाहे पति के संबंधित कर दिया जाए तो पति से विपरीत कभी नहीं जाता। आज्ञा चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए उसके विपरीत व्यक्तित्व नहीं जाता। अगर उस स्त्री  के माथे पर ठीक जगह पर टीका है तो वह सिर्फ पति तो अनुगत हो सकेगी। शेष सारे जगत के प्रति वह सबल हो जाएगी। यह करीब-करीब स्थिैति वैसी है अगर आप सम्मोसहन के संबंध में कुछ समझते है तो इसे जल्दी  समझ जायेंगे।

एक तरफ वह समर्पित होती है अपने पति के लिए। और दूसरी और शेष जगत के लिए मुक्ते हो जाती है। अब उसके स्त्रीब तत्वि के लिए कोई बाधा नहीं पड़ेगी। इसीलिए जैसे ही पति मर जाए टीका हटा दिया जाता है। वह इसलिए हटा दिया गया है। कि अब उसका किसी के प्रति भी अनुगत होने का कोई सवाल नहीं रहा।

लोगों को इस बात का कतई ख्यागल नहीं है, उनको तो ख्या ल है कि टीका पोंछ दिया,क्योंअकि विधवा हो गयी। पोंछने को प्रयोजन है। अब उसके अनुगत होने को कोई सवाल नहीं रहा। सच तो यह है कि अब उसको पुरूष की भांति ही जीना पड़ेगा। अब उसमें जितनी स्वरतंत्रता आ जाए, उतनी उसके जीवन के लिए हितकर होगी। जरा सा भी छिद्र बल्नीरेबिलिटी का जरा सा भी छेद जहां से वह अनुगत हो सके वह हट जाए।

टीके का प्रयोग एक बहुत ही गहरा प्रयोग है। लेकिन ठीक जगह पर हो, ठीक वस्तुा का हो। ठीक नियोजित ढंग से लगाया गया हो तो ही कार गार है अन्यीथा बेमानी है। सजावट हो शृंगार हो उसका कोई मूल्‍य नहीं है। उसका कोई अर्थ नहीं है। तब वह सिर्फ औपचारिक घटना है। इसलिए पहली बार जब टीका लगया जाए तो उसका पूरा अनुष्ठाअन हे। और पहली दफा गुरु तिलक दे तब उसके पूरा अनुष्ठा न से ही लगाया जाए। तो ही परिणामकारी होगा। अन्यदथा परिणामकारी नहीं होगा।

आज सारी चींजे हमें व्यर्थ मालूम पड़ने लगी है। उनका कारण है। आज तो व्यणर्थ है। क्योंठकि उनके पीछे को कोई भी वैज्ञानिक रूप नहीं रहा है। सिर्फ उसकी खोल रह गयी है। जिसको हम घसीट रहे है। जिसको हम खींच रहे है, बेमन जिसके पीछे मन का कोई लगाव नहीं रह गया है। आत्मास को कोई भाव नहीं रह गया है, और उसके पीछे की पूरी वैज्ञानिकता का कोई सूत्र भी मौजूद नहीं है। वह आज्ञा चक्र है, इस संबंध में दो तीन बातें और समझ लेनी चाहिए क्योंवकि यह काम आ सकती है। इसका उपयोग किया जा सकता है।

आज्ञा चक्र की जो रेखा है उस रेखा से ही जुड़ा हुआ हमारे मस्तिोष्क  का भाग है। इससे ही हमारा मस्ति ष्का शुरू होता है। लेकिन अभी भी हमारे मस्ति्ष्को का आधा हिस्सास बेकार पडा हुआ है। साधारण:। हमारा जो प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली व्यिक्तिो होता है। जिसको हम जीनियस कहें, उसके भी केवल आधा ही मस्तिाष्का काम करता है। आध काम नहीं करता। वैज्ञानिक बहुत परेशान है, फिजियोलाजिस्ट बहुत परेशान है कि यह आधी खोपड़ी का जो हिस्साक है, यह किसी भी काम में नहीं आता। अगर आपके इस आधे हिस्सेे को काटकर निकाल दिया जाए तो आपको पता भी नहीं चलेगा। कि कहीं कोई चीज कम हो गई है। क्यों कि उसका ता कभी उपयोग ही नहीं हुआ है, वहन होने के बारबार है।

लेकिन वैज्ञानिक जानते है प्रकृति कोई भी चीज व्यकर्थ निर्मित नहीं करती। भूल होती है, एकाध आदमी के साथ हो सकती है। यह ता हर आदमी के साथ आधा मस्तिउष्कम खाली पडा हुआ है। बिलकुल निष्क्रि य पडा हुआ है। उसके कहीं कोई चहल पहल भी नहीं है। योग का कहना है कि वह जो आधा मस्ति ष्क  है वह आज्ञा चक्र के चलने के बाद शुरू होता है। आधा मस्ति ष्कम आज्ञा चक्र ने नीचे के चक्रों से जुड़ा है और आधा मस्ति ष्के आज्ञा चक्र के ऊपर के चक्रों से जुड़ा हुआ है। नीचे के चक्र शुरू होत है तो आधा मस्तिाष्क  काम करता है और जब आज्ञा के ऊपर काम शुरू होता है तब आधा मस्तिैष्कै काम शुरू करता है।

इस संबंध में हमें ख्यामल भी नहीं आता कि जब कोई चीज सक्रिय न हो जाए हम सोच भी नहीं सकते। सोचने का भी कोई उपाय नहीं है। जब कोई चीज सक्रिय होती तब हमें पता चला है।

ओशो
हिंदी लेखन स्वामी आनंद प्रसाद
तिलक-टीका: आज्ञा चक्र के भेद
योग ने उस चक्र को जगाने के बहुत-बहुत प्रयोग किये है। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मतरण पूर्वक अगर चौबीस घण्टेु उस चक्र पर बार-बार ध्यालन को ले जाता है तो बड़े परिणाम आते है। अगर तिलक लगा हुआ है तो बार-बार ध्यासन जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्था।न पृथक हो जाता है। वह बहुत सेंसिटिव स्थाघन है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे, आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, बहुत संवेदनशील जगह है। सम्भावत: शरीर में वि सर्वाधिक संवेदनशील जगह हे। उसकी संवेदनशीलता का स्पार्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पेर्श करने की विधि है—जैसे चंदन का तिलक लगाना।

सैकड़ों और हजारों प्रयोगों के बाद तय किया था कि चन्दखन का क्योंग प्रयोग करना है। एक तरह की रैजोनेंस हे चंदन में। और उस स्थागन की संवेदनशीलता में। चंदन का तिलक उस बिन्दु की संवेदनशीलता को और गहन करता है। और घना कर जाता है। हर कोई तिलक नहीं करेगा। कुछ चीजों के तिलक तो उसकी संवेदनशीलता को मार देंगे, बुरी तरह मार देंगे आज स्त्रि यां टीका लगा रही है। बहुत से बाजारू टीके है वे उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है। उनका योग से कोई लेना देना नहीं है। वे बाजारू टीके नुकसान कर रहे है। वह नुकसान करेंगे।

सवाल यह है कि संवेदनशीलता को बढ़ाते है या घटाते है। अगर घटाते है संवेदनशीलता को तो नुकसान करेंगे, और बढ़ाते है तो फायदा करेंगे। और प्रत्ये क चीज के अलग-अलग परिणाम है, इस जगत में छोटे से फर्क पड़ता है। इसको ध्याफन में रखते हुए कुछ विशेष चीजें खोजी गयी थी। जिनका ही उपयोग किया जाए। यदि आज्ञा का चक्र संवेदनशील हो सके, सक्रिय हो सके तो आपके व्योक्तिजत्व में एक गरिमा और इन्टीकग्रिटी आनी शुरू होगी। एक समग्रता पैदा होगी। आप एक जुट होने लगते है। कोई चीज आपके भीतर इकट्ठी हो जाती है। खण्डी-खण्डत नहीं अखण्डज हो जाती है।

इस संबंध में टीके के लिए भी पूछा है तो वह भी ख्याशल में ले लेन चाहिए। तिलक से थोड़ा हटकर टीके को प्रयोग शुरू हुआ। विशेषकर स्त्रि्यों के लिए शुरू हुआ। उसका कारण वही था, योग का अनुभव काम कर रहा था। असल में स्त्रि यों का आज्ञा चक्र बहुत कमजोर चक्र है—होगा ही। क्यों कि स्त्री का सारा व्यक्तित्व निर्मित किया गया है समर्पण के लिए। उसके सारे व्य क्तिचत्व की खूबी समर्पण की है। आज्ञा चक्र अगर उसका बहुत मजबूत हो तो समर्पण करना मुश्किकल हो जाएगा। स्त्री के पास आज्ञा का चक्र बहुत कमजोर हे। असाधारण रूप से कमजोर है। इसलिए स्त्री सदा ही किसी का सहारा माँगती रहेगी। चाहे वह किसी रूप में हो। अपने पर खड़े होने का पूरा साहस नहीं जुटा पायेगी। कोई सहारा किसी के कन्धेव पर हाथ, कोई आगे हो जाए कोई आज्ञा दे और वह मान ले इसमें उसे सुख मालूम पड़ेगा।

स्त्रीप के आज्ञा चक्र को सक्रिय बनाने के लिए अकेली कोशिश इस मुल्कऔ में हुई है, और कहीं भी नहीं हुई। और वह कोशिश इसलिए थी कि अगर स्त्रीो का आज्ञा चक्र सक्रिय नहीं होता तो परलोक में उसकी कोई गति नहीं होती। साधना में उसकी कोई गति नहीं होती। उसके आज्ञा चक्र को तो स्थि र रूप से मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन अगर यह आज्ञा चक्र साधारण रूप से मजबूत किया जाए तो उसके स्त्रैरण होने में कमी पड़ेगी। और उसमें पुरुषत्व के गुण आने शुरू हो जायेंगे। इसलिए इस टीके को अनिवार्य रूप से उसके पति से जोड़ने की चेष्टाी की गई। उसके जोड़ने का करण है।

इस टीके को सीधा नही रखा दिया गया उसके माथे पर, नहीं तो उसके स्त्री त्वर कम होगा। वह जितनी स्वटनिर्भर होने लगेगी उतनी ही उसकी कमनीयता, उसका कौमार्य नष्ट् हो जाएगा। वह दूसरे का सहारा खोजती है इसमें एक तरह की कोमलता हे। पर जब वह अपने सहारे खड़ी होगी तो एक तरह की कठोरता अनिवार्य हो जाएगी। तब बड़ी बारीकी से ख्याहल किया गया कि उसको सीधा टीका लगा दिया जाए,नुकसान पहुँचेगा उसके व्यरक्ति त्वि में,उसमे मां होने में बाधा पड़ेगी, उसके समर्पण में बाधा पड़ेगी। इसलिए उसकी आज्ञा को उसके पति से ही जोड़ने का समग्र प्रयास किया गया। इस तरह दोहरे फायदे होंगे। उसके स्त्रैजण होने में अन्त र नहीं पड़ेगा। बल्किा अपने पति के प्रति ज्याेदा अनुगत हो पायेगी। और फिर भी उसकी आज्ञा का चक्र सक्रिय हो सकेगा।

इसे ऐसा समझिए, आज्ञा का चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए, उसके विपरीत कभी नहीं जाता। चाहे गुरु से संबंधित कर दिया जाए तो गुरु के विपरीत कभी नही जाता। चाहे पति के संबंधित कर दिया जाए तो पति से विपरीत कभी नहीं जाता। आज्ञा चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए उसके विपरीत व्यक्तित्व नहीं जाता। अगर उस स्त्री के माथे पर ठीक जगह पर टीका है तो वह सिर्फ पति तो अनुगत हो सकेगी। शेष सारे जगत के प्रति वह सबल हो जाएगी। यह करीब-करीब स्थिैति वैसी है अगर आप सम्मोसहन के संबंध में कुछ समझते है तो इसे जल्दी समझ जायेंगे।

एक तरफ वह समर्पित होती है अपने पति के लिए। और दूसरी और शेष जगत के लिए मुक्ते हो जाती है। अब उसके स्त्रीब तत्वि के लिए कोई बाधा नहीं पड़ेगी। इसीलिए जैसे ही पति मर जाए टीका हटा दिया जाता है। वह इसलिए हटा दिया गया है। कि अब उसका किसी के प्रति भी अनुगत होने का कोई सवाल नहीं रहा।

लोगों को इस बात का कतई ख्यागल नहीं है, उनको तो ख्या ल है कि टीका पोंछ दिया,क्योंअकि विधवा हो गयी। पोंछने को प्रयोजन है। अब उसके अनुगत होने को कोई सवाल नहीं रहा। सच तो यह है कि अब उसको पुरूष की भांति ही जीना पड़ेगा। अब उसमें जितनी स्वरतंत्रता आ जाए, उतनी उसके जीवन के लिए हितकर होगी। जरा सा भी छिद्र बल्नीरेबिलिटी का जरा सा भी छेद जहां से वह अनुगत हो सके वह हट जाए।

टीके का प्रयोग एक बहुत ही गहरा प्रयोग है। लेकिन ठीक जगह पर हो, ठीक वस्तुा का हो। ठीक नियोजित ढंग से लगाया गया हो तो ही कार गार है अन्यीथा बेमानी है। सजावट हो शृंगार हो उसका कोई मूल्‍य नहीं है। उसका कोई अर्थ नहीं है। तब वह सिर्फ औपचारिक घटना है। इसलिए पहली बार जब टीका लगया जाए तो उसका पूरा अनुष्ठाअन हे। और पहली दफा गुरु तिलक दे तब उसके पूरा अनुष्ठा न से ही लगाया जाए। तो ही परिणामकारी होगा। अन्यदथा परिणामकारी नहीं होगा।

आज सारी चींजे हमें व्यर्थ मालूम पड़ने लगी है। उनका कारण है। आज तो व्यणर्थ है। क्योंठकि उनके पीछे को कोई भी वैज्ञानिक रूप नहीं रहा है। सिर्फ उसकी खोल रह गयी है। जिसको हम घसीट रहे है। जिसको हम खींच रहे है, बेमन जिसके पीछे मन का कोई लगाव नहीं रह गया है। आत्मास को कोई भाव नहीं रह गया है, और उसके पीछे की पूरी वैज्ञानिकता का कोई सूत्र भी मौजूद नहीं है। वह आज्ञा चक्र है, इस संबंध में दो तीन बातें और समझ लेनी चाहिए क्योंवकि यह काम आ सकती है। इसका उपयोग किया जा सकता है।

आज्ञा चक्र की जो रेखा है उस रेखा से ही जुड़ा हुआ हमारे मस्तिोष्क का भाग है। इससे ही हमारा मस्ति ष्का शुरू होता है। लेकिन अभी भी हमारे मस्ति्ष्को का आधा हिस्सास बेकार पडा हुआ है। साधारण:। हमारा जो प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली व्यिक्तिो होता है। जिसको हम जीनियस कहें, उसके भी केवल आधा ही मस्तिाष्का काम करता है। आध काम नहीं करता। वैज्ञानिक बहुत परेशान है, फिजियोलाजिस्ट बहुत परेशान है कि यह आधी खोपड़ी का जो हिस्साक है, यह किसी भी काम में नहीं आता। अगर आपके इस आधे हिस्सेे को काटकर निकाल दिया जाए तो आपको पता भी नहीं चलेगा। कि कहीं कोई चीज कम हो गई है। क्यों कि उसका ता कभी उपयोग ही नहीं हुआ है, वहन होने के बारबार है।

लेकिन वैज्ञानिक जानते है प्रकृति कोई भी चीज व्यकर्थ निर्मित नहीं करती। भूल होती है, एकाध आदमी के साथ हो सकती है। यह ता हर आदमी के साथ आधा मस्तिउष्कम खाली पडा हुआ है। बिलकुल निष्क्रि य पडा हुआ है। उसके कहीं कोई चहल पहल भी नहीं है। योग का कहना है कि वह जो आधा मस्ति ष्क है वह आज्ञा चक्र के चलने के बाद शुरू होता है। आधा मस्ति ष्कम आज्ञा चक्र ने नीचे के चक्रों से जुड़ा है और आधा मस्ति ष्के आज्ञा चक्र के ऊपर के चक्रों से जुड़ा हुआ है। नीचे के चक्र शुरू होत है तो आधा मस्तिाष्क काम करता है और जब आज्ञा के ऊपर काम शुरू होता है तब आधा मस्तिैष्कै काम शुरू करता है।

इस संबंध में हमें ख्यामल भी नहीं आता कि जब कोई चीज सक्रिय न हो जाए हम सोच भी नहीं सकते। सोचने का भी कोई उपाय नहीं है। जब कोई चीज सक्रिय होती तब हमें पता चला है।

ओशो

हिंदी लेखन स्वामी आनंद प्रसाद
                     

क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
प्रिय मित्रो, ! कृपया आप मेरा ये ब्लाग " 5th pillar corrouption killer " रोजाना पढ़ें , इसे अपने अपने मित्रों संग बाँटें , इसे ज्वाइन करें तथा इसपर अपने अनमोल कोमेन्ट भी लिख्खें !! ताकि हमें होसला मिलता रहे ! इसका लिंक है ये :-www.pitamberduttsharma.blogspot.com.

आपका अपना.....पीताम्बर दत्त शर्मा, हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार , आर.सी.पी.रोड , सूरतगढ़ । फोन नंबर - 01509-222768,मोबाईल: 9414657511

Friday, February 22, 2013

भाई मतिदास की धर्मनिष्ठा..............!!!!!!!



औरंगजेब ने पूछाः "मतिदास कौन है?"....तो भाई मतिदास ने आगे बढ़कर कहाः "मैं हूँ मतिदास। यदि गुरुजी आज्ञा दें तो मैं यहाँ बैठे-बैठे दिल्ली और लाहौर का सभी हाल बता सकता हूँ। तेरे किले की ईंट-से-ईंट बजा सकता हूँ।"

औरंगजेब गुर्राया और उसने भाई मतिदास को धर्म-परिवर्तन करने के लिए विवश करने के उद्देश्य से अनेक प्रकार की यातनाएँ देने की धमकी दी। खौलते हुए गरम तेल के कड़ाहे दिखाकर उनके मन में भय उत्पन्न करने का प्रयत्न किया, परंतु धर्मवीर पुरुष अपने प्राणों की चिन्ता नहीं किया करते। धर्म के लिए वे अपना जीवन उत्सर्ग कर देना श्रेष्ठ समझते हैं।

जब औरंगजेब की सभी धमकियाँ बेकार गयीं, सभी प्रयत्न असफल रहे, तो वह चिढ़ गया। उसने काजी को बुलाकर पूछाः

"बताओ इसे क्या सजा दी जाये?"

काजी ने कुरान की आयतों का हवाला देकर हुक्म सुनाया कि 'इस काफिर को इस्लाम ग्रहण न करने के आरोप में आरे से लकड़ी की तरह चीर दिया जाये।'

औरंगजेब ने सिपाहियों को काजी के आदेश का पालन करने का हुक्म जारी कर दिया। दिल्ली के चाँदनी चौक में भाई मतिदास को दो खंभों के बीच रस्सों से कसकर बाँध दिया गया और सिपाहियों ने ऊपर से आरे के द्वारा उन्हें चीरना प्रारंभ किया। किंतु उन्होंने 'सी' तक नहीं की। औरंगजेब ने पाँच मिनट बाद फिर कहाः "अभी भी समय है। यदि तुम इस्लाम कबूल कर लो, तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा और धन-दौलत से मालामाल कर दिया जायेगा।" वीर मतिदास ने निर्भय होकर कहाः "मैं जीते जी अपना धर्म नहीं छोड़ूँगा।"

ऐसे थे धर्मवीर मतिदास ! जिन्हे अपना बलिदान देकर धर्म की रक्षा की !!
________________________________________________-
और इसे ज्यादा शर्म की बात क्या होगी ! मुगलो के शासन खत्म होने के बाद आज ही दिल्ली मे गुरुओ के हत्यारे औरंगजेब की नाम की सड़क है !! Aurangzeb road Google पर सर्च करे !

आज आजाद भारत मे भी मुगलो और अंग्रेज़ो की हजारो निशानिया हमने रखी हुई हैं !! जो हमारे शहीदों का गुरुओ का अपमान करती हैं !

और लानत हैं ! इस देश के नकली सिख प्रधानमंत्री पर जो न अपनी कौम के लिए कुछ कर सका न देश के लिए !

आज भी 1984 के दंगो के आरोपी सारे आम बाहर घूम रहे हैं !!
जनता एक एक वक़्त की रोटी को तरस रही है !


                                                                                    क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
प्रिय मित्रो, ! कृपया आप मेरा ये ब्लाग " 5th pillar corrouption killer " रोजाना पढ़ें , इसे अपने अपने मित्रों संग बाँटें , इसे ज्वाइन करें तथा इसपर अपने अनमोल कोमेन्ट भी लिख्खें !! ताकि हमें होसला मिलता रहे ! इसका लिंक है ये :-www.pitamberduttsharma.blogspot.com.

आपका अपना.....पीताम्बर दत्त शर्मा, हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार , आर.सी.पी.रोड , सूरतगढ़ । फोन नंबर - 01509-222768,मोबाईल: 9414657511

Thursday, February 21, 2013

                            " प्रेस - नोट  "                       दिनांक ...........
            " 5TH PILLAR CORRUPTION KILLER " टीम                             की तरफ से चलाये जा रहे " योग्य एवं लोकप्रिय - विधायक चुनने हेतु " सर्वे व मतदाता जागरूकता अभियान " , विधानसभा क्षेत्र सूरतगढ़ , चुनाव वर्ष 2013 , बड़ी सफलता से चल रहा है ! सूरतगढ़ की जनता इसकी प्रशंसा तो कर ही रही है साथ में बढचढ कर इस अभियान में हिस्सा भी ले रही है !! युवा लड़के और लडकियां इंटरनेट पर इस " सोशल मिडिया ब्लॉग प्रेस और इसके लेखक व संयोजक पीताम्बर दत्त शर्मा से फ्रेंडशिप करके जुड़ रहे हैं !! इस ब्लॉग के अब तक 19000 पाठक हैं ! इसके लेख शर्मा जी के पेज,गूगल +, ग्रुप और फेस-बुक पर भी पढने को मिलते हैं ! इसे विश्व के किसी भी हिस्से से देखा और पढ़ा जा सकता है, इंटरनेट के माध्यम से ! इसका लिंक ये है :- www.pitamberduttsharma.blogspot.com. 
                             इस  अभियान की टीम खेजड़ी मंदिर और बाबा रामदेव के मेले में भी गयी और दूर-दूर से पधारे लोगों को इस अभियान की जानकारी दी और पतरक बांटे !! श्री पी.के.मिश्रा, श्री अरविन्द कौल, श्री विष्णु शर्मा एडवोकेट, डा.हरप्रीत सिंह, परसराम भाटिया और पीताम्बर दत्त शर्मा ने अपनी सेवाएँ दी !!  कल महाराजा अग्रसेन I.T.I. कालेज में इस अभियान के पत्रक बांटे जायेंगे और युवाओं को " जागुरुक किया जायेगा !!


Monday, February 18, 2013

धर्म: एक वाहियात पोस्ट लाईफ इंश्योरेंस पालिसी.....शमशाद इलाही अंसारी







आधुनिक युग में इंसानी जीवन की अवधि ८० बरस से ऊपर है, मुसलमानों की औसत आयु कुछ कम होगी, चलिए किसी मान्य आंकड़े की अनुपस्थिती में अंदाजा ही लगा लेते हैं. कम से कम औसत आयु ६० बरस मान लीजिये. एक अच्छा मुसलमान बन कर अगर दस साल की उम्र से वह पांच वक्त की नमाज पढ़ने लगे तो पचास साल में कोई ३६,५०० घंटे (२ घंटे प्रतिदिन) वह इबादत में लगा देता है. इसमें कुरान की तिलावत और रमजान के दिनों में की जाने वाली विशिष्ट इबादत को जोड़ दे तब कम से कम यह आंकडा ५०,००० घंटो से कम नहीं हो सकता. डेढ़ अरब मुसलमानो में कम से कम आधे (७५ करोड़ ) तो नमाज पढ़ते ही है जिसके परिणामस्वरूप कम से कम १०२ अरब घंटे हर रोज़ मुसलमान एक अनुत्पादक कर्मकांड में व्यर्थ करता है. ७५ करोड़ लोगो में यदि १० प्रतिशत लोगो को प्रोफेशनल मान लिया जाए और उनकी प्रति घंटा उत्पादकता दर मात्र दस डालर भी मान ले तब इस समय की कीमत हर रोज़ करीब डेढ़ अरब डालर बैठती है.
हवाई जहाज निर्माण मौजूदा दुनिया की इंजीनियरिग का सबसे अनूठा और सर्वश्रेष्ठ उत्पाद है जिसे बनाने में करीब दस लाख घंटे लगते है, जाहिर है इसके निर्माण में सैकड़ो लोग रात दिन काम करते हैं तब जा कर एक हवाई जहाज़ बनता है जिसमे श्रम, तकनीक और दिमाग का विलक्षण मिश्रण होता है. इसे सर्वज्ञानी हिन्दू अथवा मुस्लमान क्यों नही बना पाए? इस प्रश्न की  पड़ताल कौन करेगा ? सिर्फ हवाई जहाज़ ही क्यों अपनी कमरे में अपने शरीर पर पहनी और रोज़मर्रा प्रयोग में की जाने वाली कितनी ऐसी चीजे हैं जो इन लोगो ने बनाई हो ? रेडियो, फोन, मोबाईल ,लेपटाप, वातानोकूलित यंत्र, कंप्यूटर, इंजेक्शन, इलाज की आधुनिक मशीने, दवाइयां, खुर्द बीन,चश्मा, टार्च, कपडे, जूते, कागज़ ,कलम कुछ तो हो जिसके निर्माण में- जिसकी इजाद में इन महापंडितों की  कोई भूमिका हो? इन तथाकथित सर्वज्ञानियों को अगर कुत्ते के  काटने से इंसान के मरने का खतरा था तो उसकी वैक्सीन १४०० पहले कुत्ते का बायकाट करते वक्त सूझ जानी चाहिए थी. सूअर के गोश्त को हराम घोषित करना एक आसान काम था बनिस्पत इसके की उसके टेप वार्म को जला डालने वाली हीट का निर्माण करते. शराब को हराम करने वाले सर्व ज्ञानियों  को यह मालूम  नहीं कि उसमे प्रयुक्त अल्कोहोल असंख्य दवाईयों में एक महत्वपूर्ण इकाई है.
  
डेढ़ अरब डालर का ‘समय’ हर रोज़ बेकार करने वाला समाज भला अपने पैरो पर कैसे खडा रह सकता है? जिस समाज को अपने समय और उसकी आर्थिक उत्पादकता का इतना भी इल्म नहीं; वह भविष्य में किसी प्रगति पथ पर अग्रसर होगा, इसकी कल्पना करना भी उचित नहीं. जिन समाजो में वक्त के लिए कोई स्थान न हो उनका गरीब रहना एक ऐतिहासिक शर्त है. समय को साधे बिना पूंजी और  संपदा का न सर्जन संभव है, न उसका  अर्जन. जिन समाजो ने समय को साधा उन्ही समाजो ने प्रगति की और आज वही समाज पूरी दुनिया पर काबिज़ हैं. दुनिया की कोई भी महान खोज, मानव जाति के इतिहास में आज तक किसी मदरसे अथवा धार्मिक इदारे ने नहीं की, क्यों? क्या यह समझाना अभी भी कोई टेहडी खीर है? आखिर धार्मिक कर्म काण्ड में उलझे मनस और समाज को अपनी वर्तमान दिशा-दशा का अहसास कब होगा? जाहिर है निहित स्वार्थ समाज में किसी प्रगतिशील विचार को जन्म लेने की न तो कोई स्थिती बनने देते है और न उसकी कोई गुंजाईश छोड़ते है.
सभी धर्मो ने वतर्मान दशा को यथास्थिति में स्वीकार करने का ही दर्शन दिया है, चतुर धर्माधिकारी को यह मालूम था कि ऐसा करके वह सत्ता के साथ अंतर्विरोध में नहीं जाएगा, लिहाजा वर्तमान को बुरा और गैर मुक्कमिल बना और उसे ऐसा समझा कर एक अलौकिक जगत का निर्माण कर लिया गया. अगर दुनिया अपूर्ण और दोयम दर्जे की  है तब अल्लाह का बनाया हुआ एक दूसरा जगत पूर्ण है. लेकिन उस असाधारण सर्वोच्च जगत को  प्राप्त करने के लिए तुम्हे पूजा पाठ, कर्म काण्ड करने होगे. कभी कब्र का डर तो कभी दोज़ख के अजीबो गरीब डराने वालो किस्सों के जरिये जनता को भरमाया गया. डर सभी धर्मो का वह प्रमुख औजार है जिसके जरिये वह इंसान की वर्तमान  जगत को बदलने वाली ऊर्जा का तिरोहण कर देती है. धर्म की अफीम के नशे में डूबा समाज राजा, सरकार, सत्ता और प्रशासन को पलटने के अपने ऐतिहासिक कार्यक्रम को छोड़ कर अपने परलौकिक जगत के सुखद सपनों में जीने के झंझट में पड जाता है. धर्माधिकारी ने समाज की जुझारू शक्तियों का अराजनीतिकरण करके न केवल समाज के बड़े हिस्से को क्रान्ति करने से रोका बल्कि उसे प्रतिक्रांतिकारी बना दिया. धर्म के नशे में डूबा ज़हन समाज को बदलने वाली हर तहरीक और हर शख्स के मुक़ाबिल खुद ब खुद एक दीवार बन जाता है. ऐसा होना स्वाभाविक है धर्माधिकारी/मुल्लाह को यह इल्म है कि अगर इंसान ने अपनी किस्मत खुद बनाने का हुनर सीख लिया तब उसका सबसे पहला संगठित हमला उनकी धार्मिक सत्ता पर ही होगा.
मौजूदा वैज्ञानिक युग में क्या धार्मिक प्रस्थापनाओ को सच की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए ? जाहिर है आज धर्मो की वकालत करने वाले खासकर इस्लाम की तरह-तरह की किस्मों को प्रोमोट करने वाले देश अथवा समूह  भूखे-नंगे नहीं है. उनके पास विश्वविद्यालय है और दुनिया का  हर जदीद वैज्ञानिक उपकरण भी  मौजूद है, फिर क्या कारण  है कि आज तक उनके धर्म द्वारा रचा गया स्वर्ग अथवा नरक का कोई जियोफिजिकल लोकेशन आज तक मुहैय्या नहीं कराया गया? आज तक किसी कब्र में कैमरा लगा कर मुलकिन नकीर के सवाल जवाब की कोई वीडियो क्यों नहीं बनी? बड़े बड़े अपराधी मरे लेकिन कब्र में तथाकथित अज़ाब का कोई दृश्य (जिसे सिर्फ मुल्लाह पिछले १४०० सालो से बांच रहा है) कि कब्र के दोनों पाट आपस में मिल कर मुर्दे को भींच देते है, पसलियाँ एक हो जाती है आदि आदि  अभी तक साक्षात क्यों नहीं दिखाया गया? क्या यह असंभव है ? इस्लामियत पढ़ने वाले छात्र इन बकवासो को कब तक सुनेंगे? बनिए की दूकान पर १० रूपए की साबुन लेने से पहले सौ सवाल करने वाला दिमाग मुर्दों पर ज़ुल्म करने वाले अल्लाह की दरिन्दगी पर सवाल क्यों नहीं उठाता? क्या कोई मुल्लाह प्रमाण मुहैय्या कराएगा कि पिछले १४०० सालो में किन-किन लोगो को जन्नत मिली और किसे दोज़ख ? जन्नत के जीवन की कोई वीडियो दिखा दो ताकि कुछ तर्क वादियों को तसल्ली हो जाए. ऐसे प्रमाणों से यकीन कीजिये धर्म के झंडाबरदारों को ही फ़ायदा होगा. जाहिर है धर्म ने सवाल करने की हदे तय की हैवह उस हद को लांघने की इजाजत नही देता जहां धर्म और धर्माधिकारी की  सत्ता को सीधी चुनौती मिलनी शुरू हो जाए. यदि विज्ञान की दृष्टी और उसकी उपलब्ध तकनीको के माध्यम से धर्म पुस्तकों की बातों  को जांचना शुरू कर दिया जाए तब संभवत: धर्म के तमाम अतार्किक और गल्प शास्त्रों पर टिके सिद्धांत खुद ब खुद गिर जायेगे.
वैज्ञानिक चिंतन और तकनीक के बिना आधुनिक मानव समाज ने उन्नति नहीं की, उसके बिना विकास संभव नहीं. कहना न होगा जिन समाजो पर अभी धर्म का काला साया मौजूद है वह भले ही पैसे के बूते वैज्ञानिक उत्पादों को खरीद कर उपयोग कर रहा हो परन्तु उसके मनस  जगत में किसी वैज्ञानिक चिंतन की भोर नहीं हुई. वह भले ही इलाज कराने आधुनिक  अस्पताल में जाए या अमेरिका में स्वास्थ्य लाभ करे, चिंतन के स्तर पर वह अभी १४०० पहले वाले  ऊँट या गधे पर ही बैठा है. जिन उपकरणों के विकास में उसकी कोई भूमिका नहीं वह बस उनका प्रयोग पैसे देकर कर लेता है. आने वाले समय में बदलती पीढी और बदलते वातावरण में निश्चय ही लोग सवाल करना शुरू करेंगे कि यदि तुम सबसे बेहतर थे, हो या होने वाले हो तब इस तमाम वैज्ञानिक युग का निर्माण दूसरो ने क्यों किया? डेढ़ अरब डालर के समय को हर रोज़ बर्बाद करने वाला समाज एक दिन जरुर जागेगा क्योंकि जागना इंसानी फितरत है, जिस दिन जागेगा उस दिन वह सब से हिसाब ले लेगा, उसी दिन वह दुनिया का बदलने की जुस्तजू में लग जाएगा, मुझे लगता है यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, बहुत देर के लिए मुल्लाह की सलामती संभव नही, भले ही उसके पास दर्जनों ‘पोस्ट लाईफ इन्शुरेन्स’ पालिसी हो.     

                                    प्रिय मित्रो, ! कृपया आप मेरा ये ब्लाग " 5th pillar corrouption killer " रोजाना पढ़ें , इसे अपने अपने मित्रों संग बाँटें , इसे ज्वाइन करें तथा इसपर अपने अनमोल कोमेन्ट भी लिख्खें !! ताकि हमें होसला मिलता रहे ! इसका लिंक है ये :-www.pitamberduttsharma.blogspot.com.

आपका अपना.....पीताम्बर दत्त शर्मा, हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार , आर.सी.पी.रोड , सूरतगढ़ । फोन नंबर - 01509-222768,मोबाईल: 9414657511

‎" 5TH PILLAR CORROUPTION KILLER " टीम के तत्वाधान में योग्य एवं लोकप्रिय विधायक चुनने हेतु "सर्वे व मतदाता जागुरुकता अभियान " ‎...!!


चुनाव में किस छवि वाले को वोट -पत्रक जारी किया






विधान सभा चुनाव में किस छवि वाले को वोट दिया जाना चाहिए

फिफ्थ पिल्लर क्रप्शन किलर ने लोगों की राय जानने को पत्रक जारी किया

खास खबर- करणीदानसिंह राजपूत

सूरतगढ़, 17 फरवरी 2013.फिफ्थ पिल्लर क्रप्शन किलर ब्लॉग के एक लेखक पीताम्बर दत्त शर्मा ने चुनाव के बाद निर्वाचित जन प्रतिनिधियों द्वारा आम लोगों की पीड़ा को नहीं समझने और संपर्क नहीं रखने की परेशानी को समझते हुए लोगों को जगाने का एक अभियान शुरू किया है।
इसके लिए बारह फरवरी को एपेक्स सामुदायिक भवन में पत्रकार वार्ता की गई और एक टीम बनाई गई है।
इस टीम में संयोजक पीताम्बरदत्त शर्मा, संरक्षक डा.दलीप सिहाग और एडवोकेट भागीरथ कड़वासरा हैं।
इनके अलावा टीम में वित्त प्रभार परसराम भाटिया व डा.हरप्रीतसिंह,लेखन प्रभार पी.के.मिश्रा व तुलसीराम शर्मा,मंच प्रभार के.के.खासपुरिया प्रचार प्रसार प्रभार राजेन्द्र पटावरी,विजय स्वामी और प्रेस प्रवक्ता प्रभार एडवोकेट विष्णु शर्मा के पास हैं।
 17 फरवरी को सुभाष चौक पर लोगों की राय के लिए एक पत्रक का विमोचन किया गया है जिसमें कुछ सवाल है कि लोग किस प्रकार के विधायक को चुनने की आशा रखते हैं। इस टीम का मकसद यही है कि अच्छी छवि वाले को चुना जाए ताकि बाद में जनता परेशान ना हो। सुभाष चौक पर एक सभा के रूप में कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें पत्रक विमोचन से पहले इस अभियान के बारे में पी.के.मिश्रा,के.के.खासपुरिया और एडवोकेट विष्णु शर्मा ने जानकारी दी। 
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क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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Posted by PD SHARMA, 09414657511 (EX. . VICE PRESIDENT OF B. J. P. CHUNAV VISHLESHAN and SANKHYKI PRKOSHTH (RAJASTHAN )SOCIAL WORKER,Distt. Organiser of PUNJABI WELFARE SOCIETY,Suratgarh (RAJ.)

Thursday, February 14, 2013

   
" 5TH PILLAR CORROUPTION KILLER "
         टीम के तत्वाधान में
  योग्य एवं लोकप्रिय विधायक चुनने हेतु

   "सर्वे व मतदाता जागुरुकता अभियान "
                                                दीजिये 6 प्रश्नों के उत्तर में अपनी महत्वपूर्ण"राय",और

     जीतिए आकर्षक 165 ईनाम !!
लक्की-ड्रा खुलने की तिथि 30,अप्रैल 2013
लक्की-ड्रा खुलने का स्थान हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार !!                          एन्ट्री फीस मात्र - 5/-रूपये !!

 शुभारम्भ - दिनांक17,फ़रवरी 2013.रविवार
 स्थान - सुभाष चौक, सूरतगढ़ !!
 समय - प्रातः 11:15 पर
 आप सब सादर आमंत्रित हैं !!

Wednesday, February 13, 2013

" मेरा रंग दे बासन्ती चोला.....माये "....!!!

कामदेव का पूजन होता था वसन्तोत्सव के दिन

आज हम वसन्त ऋतु में वसन्त पंचमी और होली त्यौहार मनाते हैं किन्तु प्राचीन काल में वसन्तोत्सव मनाया जाता था। वसन्तोत्सव, जिसे कि मदनोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, मनाने की परम्परा हमारे देश में अत्यन्त प्राचीनकाल से ही रही है। संस्कृत के प्रायः समस्त काव्यों, नाटकों, कथाओं में कहीं न कहीं पर वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव या मदनोत्सव का वर्णन अवश्य ही आता है। वसन्त को ऋतुराज माना गया है क्योंकि यह मानव की मादकता एवं कोमल भावनाओं को उद्दीप्त करता है। वसन्त पंचमी से लेकर रंग पंचमी तक का समय वसन्त की मादकता, होली की मस्ती और फाग का संगीत से सभी के मन को मचलाते रहता है। टेसू और सेमल के रक्तवर्ण पुष्प, जिन्हें कि वसन्त के श्रृंगार की उपमा दी गई है, सभी के मन को मादकता से परिपूर्ण कर देते हैं। शायद यही कारण है वसन्तोत्सव मनाने की।

वसन्तोत्सव का दिन कामदेव की पूजा की जाती थी। महाकवि “भवभूति” के ‘मालती-माधव’ संस्कृत नाटक के अनुसार एक विशेष मदनोद्यान का निर्माण करके वहाँ पर मदनोत्सव मनाया जाता था।

“मदनोद्यान- जो विशेष रूप से इस उत्सव के लिए ही बनाया जाता था – इसका मुख्य केन्द्र हुआ करता था। उसमें कामदेव का मन्दिर हुआ करता था। इसी उद्यान में नगर के स्त्री-पुरुष एकत्र होकर भगवान कन्दर्प की पूजा करते थे। यहाँ पर लोग अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार फूल चुनते, माला बनाते, अबीर-कुंकुम से क्रीडा करते और गीत-नृत्य आदि से मनोविनोद किया करते थे। इस मंदिर में प्रतिष्ठित परिवारों की कन्याएँ भी पूजनार्थ आया करती थीं और मदनोत्सव की पूजा करके मनोवांछित वर की प्रार्थना करती थीं।” (लिंक)

उल्लेखनीय है कि कामदेव प्राणीमात्र की कोमल भावनाओं के देवता हैं और उन्हें मदन, मन्मथ, प्रद्युम्न, मीनकेतन, कन्दर्प, दर्पक, अनंग, काम, पञ्चशर, स्मर, शंबरारि, मनसिज (मनोज), कुसुमेषु, अनन्यज, पुष्पधन्वा, रतिपति, मकरध्वज तथा विश्वकेतु के नाम से भी जाना जाता है।

साभार- Gauri Rai जी !!

                                    हमारी सांस्कृतिक परम्परा में कौमुदी महोत्सव यानि "बसंत-पंचमी" एक अत्यंत लोकप्रिय उत्सव था लेकिन समय और काल-गति में विश्व के दूसरे देश हम से आगे बढे और उनके उत्सव भी हम से अधिक स्वीकार्य हो गए ! मेरे लिए प्रेम जैसी ईश्वरीय अनुभूति को एक दिन में बाँधने का विचार ही बेहद अप्रासंगिक हैं लेकिन फिर भी जो दोस्त आज के दिन को अपने लिए अहम् समझते हैं उन सब को, कुंवारों की ये "आखा-तीज" ,"प्रेम चतुर्दशी" की बधाई ...!
                                          आज इन so called धर्मरक्षक पहरेदारों / चौकीदारों / ठेकेदारों का दिन है । जिस तरह सालाना परेड के दिन कोई भी पुलिसवाला वर्दी को धोकर, कलफ़ चढ़ा कर, कड़क प्रेस करता है; उसी तरह हमारी 'संस्कृति' की रक्षा के नाम पर आज ये पहरेदार कुर्तें की आस्तीन चढ़ाए आर्चीस की गैलेरी से लेकर पार्कों और रेस्टरॉ में धमकाते / उठक-बैठक कराते नजर आएंगे .!!! गोकि भारत का समाज और संस्कृति एक संत वेलेन्टाइन से खौफ खाया हो और प्रणय-निवेदन से संस्कृति की चूलें हिल जाएगी .!!!



. . . ये कैसी अप'संस्कृति है ? जहाँ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का वर्णन चार पुरुषार्थों के रूप में किया जाता हो ! जहाँ राधा-कृष्ण के महामिलन का दिन बसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता हो ! जहाँ मदनोत्सव, कौमुदी महोत्सव और रास की शानदार परम्परा रही हो ! वहाँ, इटली के एक विवाह कराने वाले संत की याद का दिन हमारे धर्म-रक्षकों को भारतीय संस्कृति का विरोधी लगता है ? क्या सोच है, इस लठैत-संस्कृति की .!!! 

. . . भारत की आदि संस्कृति विविधतापूर्ण सोच-समझ, आस्था-विश्वास के होते हुए भी बैसिकली सामासिक चरित्र की संस्कृति है, जो परस्पर समन्वय और सम्मिश्रण में भरोसा करती है । हमारी सभ्यता कभी किसी अन्य धर्म या संस्कृति को अतिक्रमित या डिक्टेट करने वाली नहीं रही है । तो फिर, इतने बड़े सांस्कृतिक समाज का प्रतिनिधित्व करने का ठेका कोई एक संगठन कैसे ले सकता है ! हमारी सामुहिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का एकमैव प्रवक्ता बनने का दावा भी कोई नहीं कर सकता ! और हम ऐसे किसी भी संगठन या आवाज को अपना समर्थन भी नहीं दे सकते ।

. . . हम भास, कालिदास, भृतहरी के खुले विचारों को पढ़े लोग है । हम खजुराहो के मंदिर बनाने और संजोने वाले लोग है । हम उस देवता के पूजक लोग है, जो नहाती गोपियों के वस्त्र चुराकर अटखैलियां करता हैं । हमारे वात्सायनरचित कामसूत्र को पांचवा वेद माना जाता है । और हम डरेंगे - प्रेम के इजहार से ..!!! कहा कैफ़ी आज़मी ने कि, "यारो ! सितम अब न सहो, खोलो ज़बाँ चुप न रहो .." वेलेन्टाइन-डे और बंसतोत्सव की शुभकामनाएँ ।।

                            क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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Sunday, February 10, 2013

" लोकप्रिय व योग्य विधायक चुनने हेतु सर्वे " विधानसभा - क्षेत्र, सूरतगढ़ !! [ चुनाव वर्ष-2013 ]

          " सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र " के मतदाता भाइयो,बहनों और युवा साथियों,!!
                हम प्रदेश विधानसभा में जनहित की योजनायें बनाने, क़ानून बनाने और प्रशासन को सुचारू रूप से चलवाने हेतु प्रत्येक 5 वर्ष बाद अपना विधायक चुनकर भेजते हैं ! लेकिन भूतकाल के अनुभवों से हमें यह आभास हुआ है कि एकबार वोट देने के बाद भी हम सारा कुछ उन नेताओं पर छोड़ देते हैं जिससे वे अपनी मनमानी करते हैं !! चुनाव के समय में वो हमें बड़ी चालाकी से अपने " जाल " में फंसा लेते हैं ! शराब या पैसे का लालच देकर,धर्म-जाति के नाम पर बाँट कर और पार्टी इलाके या भाषा में बांधकर वो अपना हित साध लेते हैं ! कुल आबादी के 30% लोग किसी न किसी " झांसे " में आ ही जाते हैं !! जिसका कारण है " अज्ञानता " !! तो इसी अज्ञानता को दूर करने हेतु हमने ये निर्णय लिया है कि आमजन को अपना वोट किसी इमानदार,अनुभवी,मेहनती और देश - भक्त नेता को ही देकर अबकी बार चुना जाए !! इस हेतु आप सबकी राय जानना जरूरी है ! इस " सर्वे " के द्वारा !!
                       तो कृपया आप सबसे निवेदन है  कि आप इस सर्वे में सक्रियता से भाग लेवें और दूसरों को भी प्रेरित करें !! ताकि हमें भविष्य में पछताना ना पड़े !! अतः आप अपना " वोट " सोच-समझ कर डालें !! 
                  इस सर्वे हेतु " फिफ्थ पिलर करप्शन किल्लर " इंटरनेट सोशल मिडिया ब्लॉग प्रेस ने 11 सदस्यीय प्रबंधन-समिति का गठन किया है ,जो चुनावों तक चलने वाले विभिन्न कार्यक्रमों का सञ्चालन करेगी !!                                           1.डा. दलीप स्याग [ संरक्षक ]
2.भागीरथ बिश्नोई एडवोकेट [ संरक्षक ]
3.पीताम्बर दत्त शर्मा [ संयोजक ]
4.तुलसी राम शर्मा [ लेखन-प्रभार ]
5.पी.के.मिश्रा [ लेखन-प्रभार ]       6.के.के.खासपुरिया [ मंच-प्रभार ]
7.विष्णु शर्मा एडवोकेट [ प्रेस-प्रवक्ता ]                  8.डा.हरप्रीत सिंह [ वित्त-प्रभार ]
9.राजिंदर पटावरी [ व्यवस्था-प्रभार ]                 10. विजय स्वामी [ व्यवस्था-प्रभार ]
11.परस राम भाटिया [ प्रशासन-अनुज्ञा-प्रभार ]

                    इस     सन्दर्भ हेतु एक प्रेस-कांफ्रेंस का आयोजन दिनांक 12,फ़रवरी 2013, मंगलवार को प्रातः12-00 बजे एपेक्स कम्युनिटी हाल सूरतगढ़ में किया गया है !!
            दिनांक17,फ़रवरी2013 रविवार को प्रातः12-00बजे सुभाष चौक सूरतगढ़ पर इस " सर्वे - पत्र " का विमोचन और शुभारम्भ नगर के " बुद्धिजीवियों " द्वारा किया जायेगा !! अतः आप सबसे अनुरोध है कि इस सामाजिक जागुरूकता के कार्यक्रम में अवश्य सम्मलित होवें !!
                               

क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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आपका अपना.....पीताम्बर दत्त शर्मा, हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार , आर.सी.पी.रोड , सूरतगढ़ । फोन नंबर - 01509-222768,मोबाईल: 9414657511

Saturday, February 9, 2013

" खत्म हुआ - अफज़ल-गुरु का " फ़साना "...???

" खत्म हुआ - अफज़ल-गुरु का " फ़साना "...???
 अफजल गुरू को फांसी पर लटकाया 
नई दिल्ली। लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर पर हमले के गुनहगार अफजल गुरू को आज सुबह फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी अफजल गुरू को मुंबई हमले के गुनहगार अजमल आमिर कसाब की तरह ही फांसी दी गई। गृह सचिव आरके सिंह ने बताया कि अफजल को सुबह 8 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। अफजल को फांसी दिए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में अलर्ट जारी कर दिया गया है। 

अफजल को फांसी पर लटकाए जाने की सिफारिश 23 जनवरी को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेजी गई थी। 26 जनवरी को राष्ट्रपति ने अपनी सहमति दे दी। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमला किया गया था। इसमें 9 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे। इनमें पांच पुलिस कर्मी शामिल थे। 

अफजल गुरू को इस मामले में दोषी करार दिया गया। 18 दिसंबर 2002 को दिल्ली की एक कोर्ट ने अफजल को फांसी की सजा सुनाई। 29 अक्टूबर 2003 को दिल्ली हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट से भी अफजल को कोई राहत नहीं मिली। 4 अगस्त 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने भी फांसी की सजा को बरकरार रखा। 

अफजल को 20 अक्टूबर 2006 को ही फांसी होने वाली थी लेकिन उसकी पत्नी ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल कर दी। इसके बाद फांसी दिए जाने पर रोक लग गई। इस बीच कुछ राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि अफजल गुरू का सही ट्रायल नहीं हुआ है। इसलिए उसकी सजा को कम किया जाए लेकिन मुंबई हमले के दोषी कसाब को फांसी दिए जाने के बाद अफजल को फांसी पर लटकाने की मांग तेज होने लगी। 

भाजपा ने उसे जल्द से जल्द फांसी पर लटकाने की मांग की। अगस्त 2011 में गृह मंत्रालय ने उसकी दया याचिका की सिफारिश भेजी। 10 दिसंबर 2012 को गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि 22 दिसंबर को संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने के बाद वह अफजल की फाइल की समीक्षा करेंगे।
                                             यदी आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, तो अफजल गुरू ने अपनी अंतिम इच्छा में "कुरान" क्यों मांगा ??
यदी आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, तो अफजल गुरू को फाँसी के बाद इस्लामिक रीति रिवाज से क्यों दफनाया गया ??
यदि मुस्लिम आतंकवादियों का विरोध करते हैं तो श्रीनगर में कर्फ्यु क्यों लगाना पड़ा ।
अब कहाँ गये शिंदे, दिग्विजय और मणिशंकर ??
और केजरीवाल ! इस बात का खुलासा कौन करेगा ??
                                                                      
संसद पर हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को शनिवार सुबह फांसी पर लटका दिया गया। अफजल गुरु की फांसी की खबर आने के बाद से ही तमाम तरह के सवाल ट्वटिर और फेसबुक पर उठाए जा रहे हैं। 
 
खबर आने के बाद से ही अफजल गुरु ट्विटर पर ट्रेंड्स में टॉप पर है। पढ़िए कुछ चुनिंदा टिप्पणियां..
 
 
Rajdeep Sardesai ‏
कसाब को शीत सत्र से पहले लटकाया गया था और अफजल गुरु को बजट सत्र से पहले। क्या यह संगोग मात्र है?
 
 
Ramesh Srivats 
अफजल गुरु को लटकाया गया। उसका करियर संसद में शुरू हुआ और तिहाड़ में खत्म हो गया। यह तो जाना पहचाना रास्ता है।
 
Kanchan Gupta ‏
अफजल गुरु को 8 साल पहले ही लटका दिया जाना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस राजनीतिक कारणों से इसे टालती रही। और अब राजनीतिक कारणों से ही सरकार ने उसे फांसी पर टांग दिया। 
 
Hamid Mir 
'अफजल गुरु के बारे में अरुंधति रॉय की कुछ अंतिम लाइनें पढ़ी, मुझे लगता है कि वह बेगुनाह था। तिहाड़ जेल में दिए गए अपने अंतिम साक्षात्कार में अफजल गुरु ने कहा था कि कश्मीरी शांत नहीं बैठेंगे, और यही हुआ। भारत में मेरे कुछ मित्रों के मुताबिक कांग्रेस की सरकार पाकिस्तान के साथ तनाव और बढ़ाएगी ताकि आगामी चुनावों में फायदा उठाया जा सके।'
 
भारत सरकार अफजल गुरु की फांसी से डरी हुई है। उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल में ही दफना दिया गया है। गुरु हीरो बन गया है। जियो न्यूज के ताजा सर्वे के मुताबिक 58 प्रतिशत पाकिस्तानी मानते हैं कि भारत के साथ रिश्ते अब नहीं सुधर सकते जबकि 29 प्रतिशत मानते हैं कि तनाव कम हो सकता है।
 
 
Akil Bakhshi 
अफजल गुरु को लटका दिया गया। साबित हो गया कि भारत की संसद पर हमला करके बचा नहीं जा सकता। राष्ट्रपति को बधाई।
 
Agnivo
लड़कियों के म्यूजिक बैंड का मामला सिर्फ इसलिए ही उठाया गया था ताकि अफजल गुरु से ध्यान हटाकर उसे चुपके से लटकाया जा सके।
 
Sathya Anand 
अफजल गुरु से सहानुभूति रखने वाले लोगों को पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए। आतंकवादी राष्ट्र का दुश्मन होता है, शहीद नहीं।
 
Malini Parthasarathy
अफजल गुरु मामले की न्यायिक प्रक्रिया पर उठे सवालों और कश्मीर के संवेदनशील हालातों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि सरकार को इसकी बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
 
Abhijit Majumder ‏
कम से कम चुनाव हार के डर ने कांग्रेस को यह तो बता कि संसद पर हमला करने वालों को फांसी पर लटकाना जरूरी है।
 
Kiran Kumar S ‏
जब अफजल गुरु ने संसद पर हमला करवाया था तब हमारे देश के 7 जवानों ने सांसदों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। क्या किसी भी राजनेता ने शहीदों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की है।
 
Amrit Hallan ‏
सरकार ने गुपचुप तरीके से अफजल गुरु को लटका दिया और कुछ लोग इसे ऐतिहासिक दिन बता रहे हैं। यह हमारे समाज के बारे में बहुत कुछ कहता है।
                                                                     
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Thursday, February 7, 2013

"करिश्मा किसका चलेगा 2013 - 14 के चुनावों में " ....????

 प्यारे  वोटर  मित्रो  , वासंती   नमस्कार स्वीकारें !!
                         2013-14 में देश के          वोटरों के भाग जागने वाले हैं । कोई दल " समाजवाद " का झुनझुना बजाएगा तो कोई रामराज्य का सपना दिखायेगा, कोई सेकुलरी के गीत गायेगा तो कोई विकास और आरक्षण के खयाली पुलाव पकाकर खिलायेगा हम वोटरों को !! हमें " चने के झाड़ " पर चढ़ा दिया जायेगा और हम इसे अपना " सन्मान " समझ ख़ुशी-ख़ुशी किसी " चालबाज़ " के कहने में आकर अपना " कीमती-वोट " उस दगाबाज़ को दे आयेंगे !! इतिहास तो यही बताता है !!
                     इन  चुनावों  में  करिश्मा  मोदी  - राहुल  - नितीश  - वसुंधरा  - बादल   - मुलायम - ममता  - येदी - रेड्डी- जगन-जयललिता या इन जैसे किसी और नेता का चलेगा या " सोशल-मिडिया " की उपज अन्ना-केजरीवाल-रामदेव या रविशंकर आदि का चलेगा ...???? क्या आज का युवा जागुरुक होगा या पुरानी पीढ़ी की तरह किसी झांसे में आ जायेगा !!
                                      मज़ा तो तब आये जब इसबार 90% पोलिंग हो जाए और बिना किसी लालच के वोट डल जाएँ.....लेकिन राजनितिक दल इमानदार,मेहनती और राजनीती के ज्ञानी यानी पढ़े-लिखे आदमी को ही अपना प्रत्याशी बनाये !! तब कंही जाकर हमारा सपना पूरा हो !! कोई करिश्मा ही
  ऐसा  कर  पायेगा   .....!! तभी  तो  मैंने  लिखा  है  कि  ........ "करिश्मा किसका चलेगा 2013 - 14 के चुनावों में " ....????
                                 

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Wednesday, February 6, 2013

" दुनिया...पागल है, या फिर मैं ...दीवाना " .....!!!!??

       " दुनिया को पागल समझने वाले" मेरे सभी मित्रों को पीताम्बर दत्त शर्मा का हार्दिक नमस्कार !! दुनिया को पागल समझने वाले ही सच्चाई पर चलने वाले होते हैं और लोग उन्हें " दीवाना " कहकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं ! जीवन भर ऐसा ही चलता है !! लेकिन जब वो सच्चा आदमी स्वर्ग-सिधार जाता है तो अगली पीढियां उसे " ईसामसीह,बुल्लेशाह,फरीद,कबीर,नानक और मीरां देवी आदि-आदि के नाम से याद करती है !!!! 
                      स्वार्थ के वशीभूत होकर इन्सान " सच " को भी झूठ साबित कर देता है ! क्योंकि उस के साथ सभी तरह के बदमाश मिले हुए होते हैं ! ऐसे लोग " सत्ता " के भी करीब होते हैं ! अल्लाह जाने क्या होगा आगे...., के मौला जाने क्या होगा आगे......!!! इब्तिदाए इश्क है, रोता है क्या...! आगे आगे देखिये , होता है क्या......???????//////////
 " दुनिया...पागल है, या फिर मैं ...दीवाना " .....!!!!??
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Sunday, February 3, 2013

जेहाद और जिन्दगी को पिरोती विश्वरुप.......!!!!!



सिल्वर स्क्रिन पर कथक करते कमल हासन.... और सिल्वर स्क्रिन पर ही बारुद में समाया आंतक । यही दो दृश्य विश्वरुपम के प्रोमो में सामने आये और फिल्म देखकर कोई भी कह सकता है कि सिर्फ यह दो दृश्य भर नहीं है विश्वरुपम । विश्वरुपम 9-11 के बाद अलकायदा की जमीन पर रेंगती ऐसी फिल्म है जो अफगानिस्तान के भीतर जेहाद के जरीये जिन्दगी जीने की कहानी कहती है । तो दूसरी तरफ अफगानिस्तान में नाटो सैनिक के युद्द से लेकर अलकायदा के खिलाफ चलाया जा रहा भारत का मिशन है जिसकी अगुवाई और कोई नहीं विश्वरुप यानी कमल हासन ही कह रहे है ।

मिठ्टी और रेत के बडे बडे टिहो से पटे पडे खूबसूरत अपगानिस्तान में नाटो सैनिको और अलकायदा के बीच बारुद की जंग कितनी खतरनाक है अगर यह हिसंक दृश्यो के जरीये दिखाया गया है तो यह कमल हासन का ही कमाल है कि अफगानिस्तान की बस्तियो में वह तराजू में तौल कर बेचे जा रहे कारतूस और हथियारो के जखीरे के बीच आंखो पर पट्टी डाल बच्चो की नन्ही अंगुलियो के सहारे हथियारो काककहरा पढते-पढाते हुये आंतक के स्कूल की एक नयी सोच महज चंद सीन में दिखा देते है।

दरअसल 9-11 के बाद बनी कई लोकप्रिय फिल्मो की कतारो में विश्वरुपम एकदम नयी लकीर खिंचती है । यह ना तो सिलव्सटर स्टेलोन की फर्स्ट ब्लड जैसे अमेरिकी सोच को देखती है । जो बंधक बनाये गये अमेरिकियो की रिहाई का मिशन है । साथ ही यह फिल्म ना ही काबुल एक्सप्रेस, खुदा के लिये और माई नेम इज खान की तरह सिर्फ इस्लाम या मुस्लिम मन के भीतर की जद्दोजहद को समेटती है । बल्कि विस्वरुपम ओसामा के मारे जाने पर ओबामा के भाषण को दिखाकर अमेरिकी जश्न पर भी चोट करती है । और अफगानी महिला के संवाद के जरीये अंग्रेज , रुस , अमेरिका और अब अलकायदा से घायल होते अफगानिस्तान की उस त्रासदी को भी उभारते है जिसमें युद्द तो हर कोई कर रहा है लेकिन हर युद्द में घायल आम आफगानी हो रहा है । और उसे यह समझ नहीं आ रहा है कि रुसी सैनिको के बाद नाटो सैनिक और अलकायदा के लडाको में अंतर क्या है । बावजूद इसके युवा पीढी के हाथो में बंधूक और फिदायिन बनकर जिन्दगी को अंजाम तक पहुंचाने की खूशबू कैसे हर रग में दौडती है । इसका एहसास भी विश्वरुप कराती है और मारे जाने के बाद परिजनो के आंख से बहते आंसू पर यह कटाक्ष भी करती है कि जेहाद में सिर्फ खून बहता है आंसू नहीं ।

जेहाद कैसे खुदा या धर्म की छांव में खुद को परिभाषित करता है और अपने समूचे आंतक को खुदा के लिये जेहाद का नाम देता है इसे बेहद बारिकी से विस्वरुपम ने पकडा है और संभवत यही वह दृश्य है जिनसे तमिलनाडु में हंगामा मचा है । कुरान को पढने या नमाज के उठे हाथ ही अगर बंधूक उठाते है तो उसके पिछे जिन्दगी की जद्दोजहद को भी विश्वरुपम उभारती है । जाहिर है इन दृश्यो के कांट-छांट का मतलब है जिन्दगी और जेहाद के बीच जुडते तारो से आंख मूंद लेना । और फिल्म विशवस्वरुप के लेखक डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और कलाकार के तौर पर कमल हासन कही आंख नहीं मूंदते । और तो और फिल्म महज एक मिशन को सफल दिखाती है । जेहाद और अलकायदा मौजूद है और फिल्म आखिर में यह कहकर खत्म होती है कि अगली बार अमेरिका में नहीं भारत में मिलेंगे । लेकिन फिल्म का वह क्षण अद्भूत है जब ओसामा बिन लादेन को 30 सेकेंड के लिये यह कहकर दिखाया जाता है मानो फरिश्ते को देख लिया। sabhaar :- sh. punyprsun vajpeyi ji 
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Friday, February 1, 2013

व्यंग्य - - : उपाध्यक्ष महोदय .......!!!??? वीरेन्द्र जैन

   

     जब कोई व्यक्ति किसी संस्था के लिए ''उगलत निगलत पीर घनेरी'' वाली दशा को प्राप्त हो जाता है तो उसे उस संस्था का उपाध्यक्ष बना दिया जाता है।
          उपाध्यक्ष पदाधिकारियों में ईश्वर की तरह होता है जो होते हुये भी नहीं होता है और नहीं होते हुये भी होता है। यह टीम का बारहवां खिलाड़ी होता है जो पैड-गार्ड बांधे बल्ले पर ठुड्डी टिकाये किसी के घायल होने की प्रतीक्षा में टायलट तक नहीं जाता और मैच समाप्त होने पर फोटोग्रुप के लिये बुला लिया जाता है।

          वह कार्यकारिणी का 'खामखांहोता है। किसी भी कार्यक्रम के अवसर पर वह ठीक समय पर पहुंच जाता है तथा अध्यक्ष महोदय के स्वास्थ की पूछताछ इस तरह करता है जैसे वह उनका बहुत हितैषी हो। वह संस्था के लॉन में बाहर टहलता रहता है और अध्यक्ष के आनेऔर खास तौर पर न आने की आहट लेता रहता है। अगर इस बात की पुष्टि हो जाती है कि अध्यक्ष महोदय नहीं आ रहे हैं तो वह इस बात की जानकारी अपने तक ही बनाये रखता है तथा बहुत विनम्रता और गम्भीरता से बिल्कुल पीछे की ओर बैठ जाता हैजैसे उसे कुछ पता ही न हो। जब सचिव आदि अध्यक्ष महोदय के न आने की सूचना देते हैं जिसका कारण आम तौर पर अपरिहार्य होता है और सामान्यतय: बहुवचन में होता हैतो वह ऐसा प्रकट करता है जैसे उसके लिये यह सूचना सभी सर्वेक्षणों के विपरीत चुनाव परिणाम आने की सूचना हो। वह माथे पर चिंता की लकीरें उभारता है और अध्यक्ष महोदय के न आने के पीछे वाले कारणों के प्रति जिज्ञासा उछालता है। फिर कोई गम्भीर बात न होने की घोषणा पर संतोष करके गहरी सांस लेता है। अब वह अध्यक्ष है और संस्था का भार उसके कंधों पर है।

          सामान्यतय: उपाध्यक्ष अध्यक्ष से संख्या में कई गुना अधिक होते हैं। कई संस्थाओं में अध्यक्ष तो एक ही होता है पर उपाध्यक्ष एक दर्जन तक होते हें क्योंकि काम करने वालों की तुलना में काम न करने वालों की संख्या हमेशा ही अधिक रहती है। उपाध्यक्षों के दो ही भविष्य होते हैंएक तो वे अध्यक्ष के मर जानेपागल हो जाने या निकाल दिये जाने की स्थिति में अध्यक्ष बना दियें जाते हैं या फिर झींक कर अंतत: दूसरी संस्था में चले जाते हैं जहां पहली संस्था में व्याप्त बनेक अनियमितताओं के बारे में रामायण के अखंड पाठ की तरह लगातार बताते रहते हैं। उपाध्यक्षों का सपना संस्था का अध्यक्ष बनने का होता है और संस्था इस प्रयास में रहती है कि इस व्यक्ति को कैसे निकाल दिया जाये कि वह संस्था की ज्यादा फजीहत न कर सके।

          मंच पर उपाध्यक्षों के लिये कोई कुर्सी नहीं होती है। वहां अध्यक्ष बैठता है ,सचिव बैठता है,विशिष्ट अतिथि बैठता है, और कभी कभी तो अशिष्ट अतिथि तक बैठ जाता है, पर उपाध्यक्ष नहीं बैठता है - केवल उसकी दृष्टि वहां स्थिर होकर बैठी रहती है। कभी कभी मुख्य अतिथि से उसका परिचय कराने के लिये मंच से घोषणा की जाती है कि अब हमारी संस्था के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुख्य अतिथि को माल्यार्पण करेंगे। बेचारा मरे कदमों से मंच पर चढता है और माला डाल कर उतर आता है। फोटोग्राफर उसका फोटो नहीं खींचता इसलिये वह मुंह पर मुस्कान चिपकाने की भी जरूरत नहीं समझता।

          उपाध्यक्ष किसी संस्था का वैसा ही हिस्सा होता है जैसे कि शरीर में फांस चुभ जायेआंख में तिनका पड़ जाये या दांतों के बीच कोई रेशा फंस जाये। सूखने डाले गये कपड़े पर की गयी चिड़िया की बीट की भांति उसके सूख कर झड़ जाने की प्रतीक्षा में पूरी संस्था सदैव रहती है क्योंकि गीले में छुटाने पर वह दाग दे सकता है।

          उपाध्यक्ष के दस्तखत न चैक पर होते हैं न वार्षिक रिपोर्ट पर! न उसे संस्था के संस्थापक सदस्य पूछते हैं न चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। न उसे अंत में धन्यवाद ज्ञापन को कहा जाता है और ना ही प्रारम्भ में विषय प्रवर्तन को। न उसका नाम निमंत्रण पत्रों में होता है और न प्रैस रिपोंर्टों में। गलती से यदि कभी अखबार की रिपोर्टों में चला भी जाता है तो समझदार अखबार वाले समाचार बनाते समय उसे काट देते हैं। अगले दिन सुबह वह अखबार देखता है और उसे पलट कर मन ही मन सोचता है कि लोकतंत्र के तीन ही स्तंभ होते हैं।
     वैसे मैं आत्महत्या का पक्षधर नहीं हूं और इस साहस को हमेशा कायरता पूर्ण कृत्य बताकर तथाकथित बहादुर बना घूमता हूं पर फिर भी मेरा यह विश्वास है कि किसी संस्था का उपाघ्यक्ष बनने की तुलना में आत्महत्या कर लेना लाख गुना अच्छा है।
                                  वीरेन्द्र जैन
                   2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
                   अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
                                  फोन9425श्74श्29

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सचमुच भारत का समाज एक अजीब समाज है। ********* ज्यादा दिन नहीं हुए, कोई तीन-साढ़े तीन साल पहले जब उस समय के शासक लूट के अनेक नए आयाम गढ़ ...