Tuesday, December 29, 2015

"खुले-साँड"बने घूमते , भारतीय लोकतंत्र के चारो स्तम्भ !!?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511.

"न्यायपालिका,कार्यपालिका,विधायिका और पत्रकारिता"हमारे लोकतंत्र के मुख्य स्तम्भ रहे हैं ! वैसे तो लोकतंत्र भी हमारा नहीं है और इसके खम्भे भी "उधर के सिन्दूर " की तरह हैं जिनको हमने दुसरे देशों की देखा-देखि अपनाया है ! इतना ही नहीं हमारी आधुनिकता और हमारे मौजूदा सिद्धांत भी किसी दुसरे देशों की ही देन हैं !राष्ट्रपिता भी हमारे नहीं हैं राष्ट्र भाषा ,राष्ट्र-वर्दी भी हमारी नहीं है !केवल फोटो चिपकाये हुए हैं हम भारतवासी अपने लोकतंत्र के माथे पर !
                 क्यों ये आवश्यक था और क्यों ये भार धोना हमारे लिए आज भी आवश्यक है ! आज मीडिया समाचार दिखा रहा है कि बिहार में जंगल-राज फिर से अपने पैर पसर रहा है तो क्या मीडिया इस सबके लिए दोषी नहीं है उन विशेष राजनितिक दलों के साथ-साथ जिनको उसके सहयोग से वहाँ सत्ता प्राप्त हुई थी ! कितने पत्रकार नतीजे आने वाले  दिन विभिन्न चैनलों में मज़े ले-लेकर विश्लेषण कर रहे थे !इसी तरह से कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका भी ना जाने कितनी बार अपनी संवेधानिक सीमाएं लांघ चुकी हैं !
                             अब इन हालातों में कौन रोक पायेगा इनको ?? रुक तो केजरीवाल ही नहीं रहा किसी से ?? दिल्ली की जनता ने ना जाने किस महूर्त में उसे अपना नेता चुन लिया , अब वो हर किसी की बात में टांग अडाना अपना धर्म मानता है ! गालिया भी धड़ल्ले से निकाल रहा है और ये भी कहता है की हम लड़ना नहीं चाहते !अजीब तमाशा है ये ??!!अगर राजनितिक दलों के छुटपुट विरोधी प्रदर्शनों को छोड़ दें तो दिल्ली की आम जनता ने कोई विरोध भी नहीं किया है !तो क्या ये मान लिया जाए कि "आप"पार्टी के नेता-प्रवक्ता"जो बोलते है या करते हैं वही दिल्ली की जनता भी चाहती है ??वोटों के डर से हमारे नेता क़ानून  चाहते , आरक्षण भी नहीं ख़त्म करना चाहते ,पोलिस भी इसी मजबूरी से दोषियों को नहीं पकड़ती ,बड़े आरोपियों को अगर छुड़वाना हो तो c.b.i.से जांच करवा दी जाती है !
                       आज सभी सरकारें चाहे वो देश की हो या प्रदेश की , वो सिर्फ अमीरों के बारे में ही सोचती है , गरीब के बारे में आज कोई भी नहीं सोचना चाहता ! गरीब को तरह तरह के बस "कार्ड"ही दिए जा रहे हैं या फिर योजनाओं के नाम सुनाये जा रहे हैं ! जितना आम आदमी अपनी साड़ी ज़िंदगी में कमा नहीं पाटा उतना तो एक साल में सरकारें एक आमिर आदमी को माफ़ कर देती हैं !यहां मैं ये भी साफ़ कर दूँ कि जो एक साल में पांच लाख भी नहीं कमा पाता , वो आम आदमी  है ! राज बब्बर वाला 15 /-रूपये की थाली खाने वाला नहीं !
 लोकतंत्र के सभी "स्तम्भों" को अपनी जुम्मेवारी समझनी होगी और बिना किसी डर और पूर्वाग्रह के जो भी बदलाव आवश्यक हैं वो सख्ती से लागू करने होंगे अन्यथा -------- "प्रलय"दूर नहीं !! सोचो!! समझो!! और करो यारो !!
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पीताम्बर दत्त शर्मा,
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Friday, December 25, 2015

हम हन्दुस्तानी "पल में तोला पल में माशा"हो जाते हैं !! - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511 .

वाह जी वाह !! हमारा भी जवाब नहीं जी ! इतिहास गवाह है हमारा , हम " हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानीयों "का क्योंकि वो भी तो पुराने हन्दुस्तानी ही हैं ! अल्लामा-इक़बाल भी तो लिखकर गए हैं कि " सारे जहां से अच्छा , हिन्दुस्तान हमारा " , क्या हुआ वो अगर बाद में पाकिस्तान चले गए तो उन्होंने कुछ और भी लिख दिया ?? कवि लोग तो भावुक होते ही हैं !?"फितरत" तो नहीं बदलती हमारी ! अब मुझे ही देखलो ! मैं भी उर्दू के शब्दों को वैसे ही प्रयोग करता हूँ जैसे हिंदी या किसी अन्य भाषा के !उसी तरह से ये भी हमारी फितरत का ही एक अहम हिस्सा है की हम पल में किसी को इतना प्यार करने लग जाते हैं कि , फिर हमें उससे प्यारा कोई और नज़र ही नहीं आता , जबकि कुछ ही समय पहले हम उसे मारने हेतु अपना 56 इंच का सीना दिखा रहे होते हैं !
                       हमें आशावान होना ही सिखाया गया है !! क्योंकि हर कष्ट सिर्फ "आशा" नामक "दवाई " से ही सही हो सकता है !किसी गोली तलवार या बम्ब से नहीं !और तर्क तो हम हर किसी हालात के अनुरूप गढ़ने में माहिर तो हैं ही ! इसीलिए हमें हर उस कदम का स्वागत ही करना चाहिए जिससे हमारा भविष्य उज्जवल हो और हमारी आनेवाली पीढ़ियां सुखी रह सकें !हिंदुस्तान में चाहे सोनिया जीते या केजरीवाल ,उधर पाकिस्ताम में नवाज़ जीतें या इमरानखां ! प्रजा दोनों देशों की खुश रहनी चाहिए बस ! और मैं ये दावे के साथ कह सकता हूँ की मोदी जी के काम से दोनों देशों की जनता ना सिर्फ खुश है बल्कि पाकिस्तानी जनता तो अब भारतीय सेकुलरों द्वारा बनायीं-दिखाई गयी मोदी जी की और भाजपा की छवि की असलियत समझने लगे हैं !
                         मोदी जी ने भारत के अंदरुनी दुश्मनों की गन्दी चालों को असफल कर दिया है जिसके लिए उनको बधाई !! छिपाकर कार्यक्रम बनाना आतंकवादियों स भी बचाव कर गया और दोनों देशों के अंदरुनी दुश्मनों से भी ! जय हिन्द !!जय भारत !
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Tuesday, December 22, 2015

" जनता के मुद्दे अब संसद से गुम होने लगे हैं "- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) - मो. न. - 9414657511

जन हित हेतु देश के टुकड़े हुए,संविधान बना,नेता बने,संसद-विधानसभाएं-जिला परिषदें और नगर-पालिकाएं बनी ! इतना ही नहीं बल्कि धर्म बने , संत बने , समाज सेवी बने और संस्थाएं बनीं !जनता की सुविधा हेतु ही प्रशासन और उसके नियम बने , न्याय-पालिका बनी ,वकील -जज बने ! इन सबसे ऊपर पत्रकार-टीवी चेनेल और उनके एंकर बने ! लेकिन ....  महात्मा गांधी वाले " हे-राम " !! जनता आज इतना सब कुछ होने के बावजूद भी "खुश" नहीं है !!क्यों भला .....??????
                              क्यों आज उसे कोई नेता नहीं पसंद ?क्यों उसे आज कोई धर्म और उसके संत नहीं पसंद ? क्यों उसे आज देश की व्यवस्था पर विश्वास नहीं ? क्यों आज उसे हर कोई धोखेबाज़ नज़र आता है ? आइये ! हम नज़र डालते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है !! मैं यहां अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ - 
          1. आम आदमी जितना सारी उम्र में कमाता नहीं है ,उससे ज्यादा तो इस देश में एक अमीर आदमी को बैंक लोन की सब्सिडी मिल जाती है क्यों?
          2. आम आदमी के 35 कीमती साल बेहूदा शिक्षा - व्यवस्था की भेंट चढ़ जाते हैं , जबकि कोई हाथ का कारीगर 20 साल का होते-होते 500/-रूपये रोज़ कमाने लगता है क्यों ?
          3. आम आदमी को झूठे - भ्रष्टाचारी और आडमबरी लोग जीवन में आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं !ऐसे क्यों लगता है जैसे उसे सच पे चलने की गलत शिक्षा माता-पिता और गुरुओं से मिली हो ???
          4. आम आदमी की चिंता व्यवस्था से जुड़ा कोई शख्स नहीं करना चाहता सब किसी ना किसी अमीर के "प्यादे"नज़र आते हैं क्यों ?
                         जब तलक ऐसे प्रश्नों के उत्तर ढूंढ कर जनता को विशवास में नहीं लिया जाता , तब तलक किसी " खूनी क्रान्ति "के आसार बनते नज़र आते ही रहेंगे ! नाम चाहे उसका कोई भी हो सकता है ! ये तो वो समय ही निर्णय करेगा कि कौन उसकी चपेट में आएगा ! कोई क्रिकेट वाला या कोई नेता-पत्रकार ! खुदा खैर करे !!!कांग्रेस-भाजपा सहित सभी दलों में भारी फेरबदल की आवश्यकता है !जनता और लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ को भी अपने कर्तव्यों के बारे में बड़े विचार कर बदलाव लाने होंगे ! अन्यथा "गृह-युद्ध" निश्चित है ! खबर-दार -- होशियार !!! भारत के वासियो !
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Thursday, December 17, 2015

नंगी होती हमारी राजनीति - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511

  आदम युग में नंगापन मनुष्य को बुरा नहीं लगता था क्योंकि सब नंगे ही होते थे ! लेकिन जब से समझदारों ने वस्त्र ग्रहण करने शुरू किये , तब से अगर कोई बिना किसी विशेष-कारण से नंगा होता है तो मानव-समाज को बुरा लगता है ! आज वस्त्रों के इलावा कई तरह के "ओढ़ने" हमें ओढ़ने पड़ते हैं ! जैसे लाज-शर्म की ओढ़नी,अपने मान-सन्मान की ओढ़नी और "ज्ञान" की ओढ़नी ओढ़ कर हमें चलना पड़ता है जी ! तभी तो हमारे प्रिय सलमानखान की एक फिल्म में एक गीत भी रख्खा था कि "ओढ़नी ओढ़ के नाचूँ आज "!!
                         लेकिन आज हम यहां चर्चा करना चाहते हैं राजनीतिज्ञों की ओढ़नी की , जो उन्होंने पिछले तीन दशकों से ओढ़ रख्खी है !!"  बेशर्मी "की ओढ़नी !जैसे-जैसे ये ओढ़नी मैली होती जा रही है वैसे वैसे हमारे नेता उसे बढ़िया बताकर हंस रहे हैं !हालांकि लोगों को उनकी पुरानी-फटी ओढ़नी से उनका नंगापन नज़र आ रहा है , जनता उन्हें इशारा भी कर रही है ,लेकिन हमारे नेतागण हैं कि अपने नंगेपन को वो नया फैशन बता रहे हैं !जो चंद नेता अपनी ओढ़नी को फटने से जैसे-तैसे बचाये हुए हैं ,उनकी ओढ़नी को भी ये बदमाश नेता तार-तार करने पर तुले हुए हैं ! 
                          अब तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे हमारे माता-पिता और शिक्षकों ने हमें जैसे गलत शिक्षा पढ़ा दी हो !मक्कार-भ्रष्ट और झूठे लोग इतनी खूबी से शरीफ,दयावान और देश-भक्त होने की अदाकारी करते हैं कि ईमानदारों , गुणीजनों और सभ्य लोगों को अपने दांतों तले उंगलियां दबानी पड़ती हैं भाई !!"आप"पार्टी के सभी नेताओं ने तो कांग्रेस-भाजपा के नेताओं को इस मामले में कोसों पीछे छोड़ दिया है जी !बाकी राजनितिक दलों के नेता तो फेल हीरो-हीरोइनों जैसे लगते हैं !
                      हर पांच साल बाद भारत की जनता बड़ा सोच-समझकर अपना निर्णय चुनावों में देती है लेकिन दो वर्ष बाद ही उसे एहसास होने लगता है की उसने बहुत बुरा निर्णय किया था ! और जो दल जीत जाता है उसके नेता अपनेआपको "महान" समझने लग जाते हैं और सोचते हैं जनता उनको अगले 20 .  वर्षों तलक चुनती ही रहेगी !सत्ता के नशे में वो अपने कार्यकर्ताओं को भी भूल जाते हैं ! उनकी गिनती भी आम लोगों में करने लग जाते हैं ना जाने कब अक्ल आएगी इनको !
              भगवान इनको सद्बुद्धि दे !!धर्म की जय हो !! अधर्म का नाश हो !! प्राणियों में सद्भावना हो !! विश्व का कल्याण हो !! हर-हर-हर महादेव !! जय हिन्द !!अंत में आप सबसे एक प्रश्न - "क्या हम सैन्य-शासन के बिना नहीं सुधर सकते ??????????" उत्तर अवश्य देवें !" आकर्षक - समाचार ,लुभावने समाचार " आप भी पढ़िए और मित्रों को भी पढ़ाइये .....!!!

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Friday, December 11, 2015

जेएनयू, संसद, सत्ता और सपने !!?????

"जहर मिलता रहा, जहर पीते रहे/रोज मरते रहे , मर कर जीते रहे /जख्म जब कोई जहनो दिल को मिला /जिन्दगी की तरफ एक दरीचा खुला / जिन्दगी हमें रोज आजमाती रही /हमे भी उसे रोज आजमाते रहे...."याद तो नहीं यह गजल है किसकी । लेकिन अस्सी के दशक में जेएनयू के गंगा ढाबे पर जब भी देश के किसी मुद्दे पर चर्चा होती तो एक साथी धीरे धीरे इन्ही लाइनों को गुनगुनाने लगता और तमाम मुद्दो पर गर्मा गरम बहस धीरे धीरे खुद ही इन्हीं लाइनों में गुम हो जाती। और तमाम साथी यह मान कर चलते कि आने वाले वक्त में अंधेरा छंटेगा जरुर। क्योंकि बहस का सिरा  तब मंडल-कमंडल की सियासत से शुरु होता और पूंछ पकडते पकडते हाथ में संसदीय चुनावी राजनीति का अंधेरा होता ।

लेकिन यह एहसास ना तब था ना अब है कि लोकतंत्र की दुहाई देकर जिस तरह चुनावी राजनीति को ही सर्वोपरि बनाया जा रहा है और राजनीतिक सत्ता के हाथों में अकूत ताकत समा रही है उसमें तमाम संवैधानिक संस्थाओं की भी कोई भूमिका बच पायेगी । यह लकीर है महीन, लेकिन इतनी धारदार है कि इसने संसदीय राजनीति की बिसात पर सांसदों और राजनेताओं को ही प्यादा बना दिया है । संसद की साख पर ही सवालिया निशान उठने लगा है । संसद की भीतर बहस की उपयोगिता या मुद्दे से जुड़े लोगों के बीच संसद की बहस को लेकर नाउम्मीदी किस हद तक है यह सब संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान बार बार उठ रहा है । शुरुआत कही से भी कर सकते है । मसलन संसद में सूखे की बहस के दौरान ही नेशनल हैराल्ड का मुद्दा आ गया । और झटके में नेशनल हैराल्ड के जरीये संसद ठप कर न्यायपालिका को घमकाने का आरोप कांग्रेस पर संसदीय मंत्री वेंकैया नायडू ने लगा दिया । तो बात न्यायपालिका के जरीये संविधान को ताक पर रखने के मद्देनजर भी हो सकती है और सूखे का सवाल किसान मजदूर से जुडा है इस पर भी हो सकती है । लेकिन जब चर्चा होती है तो संसद के भीतर 15 फिसदी सांसद तक नहीं होते । और इस दौर में हर वह मुद्दा हाशिये पर है जिसके आसरे 19 महीने पहले देश ने एतिहासिक जनादेश दिया । 

तो आज शुरुआत कालेधन से करते है । क्योकि मनमोहन सिंह की दस बरस की सत्ता के 34 लाख करोड़ रुपये अगर कालेधन के तौर पर विदेशो में चले गये । यानी हर दिन 931 करोड रुपये 2004 से 2013 तक कालेधन की रकम विदेशी बैकों में जाती रही तो यह सच कितना छोटा है कि दिल्ली में संजय प्रताप सिंह नाम का एक नौकरशाह जब दो लाख बीस हजार की घूस लेते हुये पकड़ में आता है तो उसकी संपत्ति खंगालने पर पता चलता है कि सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति उसने भ्रष्टाचार के जरीये बना ली । और फिर पता चलता है कि दिल्ली एनसीआर में करीब सवा लाख करोड़ से ज्यादा कालाधन उन फ्लैटो में लगा है जो बनकर खड़े हैं । लेकिन उनमें कोई रहता नहीं क्योंकि देश के अलग अलग राज्यों के सैकडों नौकरशाहों ने दिल्ली और एनसीआर में अपना कालाधन लगा रखा है जो विदेशों में जमा नहीं करा पाये । या फिर विदेशो में जमा कालेधन के अलावे यह रकम है । यह रकम काले धन की है । 34 लाख करोड़ । सिर्फ मनमोहन सिंह की दस बरस की सत्ता के दौर में देश से 34 लाख करोड़ रुपये कालेधन के तौर पर देश से बाहर चले गये । तो 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त जो सवाल नरेन्द्र मोदी कालेधन का बार बार उठा रहे थे वह गलत कतई नहीं था । यानी एक तरफ अमेरिकी थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रेटी की रिपोर्बताती है कि जीडीपी का करीब 25 फिसदी होता है 34 लाख करोड जो 10 बरस में देश के बाहर गया। और इन्हीं सवालों को उठाते हुये नरेन्द्र मोदी पीएम बन गये तो मौजूदा सच है क्या। क्योंकि सरकार बनते ही बनाई गई एसआईटी ने क्या तीर मारा-अभी तक देश की जनता को पता नहीं है । काले धन पर नया कानून पास किया गया लेकिन उसका असर है कितना कोई नहीं जानता ।

आलम ये कि कानून के तहत तीन महीने में सिर्फ 4,147 करोड़ रुपए का खुलासा हुआ और स्कीम फ्लॉप रही । सरकार ने एचएसबीसी बैंक में खाता धारक 627 भारतीयों के नाम सुप्रीम कोर्ट को सौंपे जरुर लेकिन न जनता को नाम मालूम पड़े और न किसी के खिलाफ ऐसी कानूनी कार्रवाई हुई कि वो मिसाल बने । और काले धन को लेकर सरकारी कोशिशों की खुद बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सवाल उठाए और इनफोसिस के पूर्व एचआर हैड टीवी मोहनदास ने तो सरकार के कालाधन पकड़ने के तरीकों को मजाक करार दे दिया।। तो सवाल यही है कि काला धन को लेकर दावे और वादों के बीच  मोदी सरकार  कहां खड़ी है। क्योकि अमेरिकी थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रेटी की रिपोर्ट की माने तो दुनिया में मौजूदा वक्त में भी कालेधन को लेकर कोई कमी आई नहीं है । यानी मौजूदा वक्त में कितना काला धन कौन बना रहा है इसकी जानकारी हो सकता है पांच या दस बरस बाद आये । अब अगला सवाल किसानो का । जिन्हे समर्थन मूल्य कितना मिलता है यह बहस का हिस्सा नहीं है बल्कि नई बहस इस बात को लेकर है कि पहली बार देश में खुदकुशी करते किसानों की तादाद बढ़ क्यो गई । एक ही मौसम में कही सूखा तो कही बाढ क्या आ रही है। और इन सबके बीच कृषि उत्पादों से जुडी कंपनियों के टर्नओवर बढ़ क्यो रहे है । मसलन महाराष्ट्र के मराठवाडा और विदर्भ ने तो खुदकुशी के सारे रिकार्ड उसी दौर में टूटे जब दिल्ली और महाराष्ट्र में बीजेपी की ही सरकार है। जो किसानो को लेकर राजनीतिक तौर पर कहीं ज्यादा संवेदनशील रही । तो क्या राजनीतिक सक्रियता सत्ता दिला देती है लेकिन सत्ता के पास कोई वैकल्पिक आर्थिक नीति नहीं है जिससे देश को पटरी पर लाया जा सके । क्योंकि इकनामी देश के बाहर के हालातो से ही अगर संभलता दिखे तो  कोई क्या कहेगा । जैसे  जून 2008 में कच्चे तेल की किमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 145 डालर प्रति बैरल थी । तो अभी यह 40.62 डालर प्रति बैरल है। लेकिन जब अभी के मुकाबले  सौ डालर ज्यादा थी तब दिल्ली में पेट्रोल की किमत प्रति लीटर 50 रुपये 62 पैसे की थी। और आज जब तब के मुकाबले सौ डॉलर कम है तो प्रति लीटर पेट्रोल 60 रुपये 48 पैसे है । तो सवाल यह नहीं है कि इक्नामी मनमोहन सिंह के दौर में डांवाडोल क्यों थी ।और अभी इक्नामी संभली हुई क्यो है । सवाल है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उथल पुथल होगी तब इकनॉमी कैसे संभलेगी। इसीलिये अब आखरी सवाल पर लौटना होगा कि आखिर क्यो संसद चल नहीं रही और क्यों संवैधानिक संस्थाओ को ही नहीं बल्कि न्यायपालिका तक निशाने पर क्यों है । और सबपर भारी राजनीति ही क्यो है ।  याद किजिये जब सवाल जजों की नियुक्ति > को लेकर कोलेजियम का उटा तो कैबिनेट मंत्री अरुण जेटली न्यायापालिका को लेकर यह कहने से नहीं चुके कि गैर चुने हुये लोगो की निरंकुशता कैसे बर्दाश्त की जा सकती है । यानी सारी ताकत संसद में होती है और चुने हुये प्रतिनिधियों का महत्व सबसे ज्यादा होता है । तो अगला सवाल यही है कि अगर संसद ही सबसे ताकतवर है या सत्ता को यह लगता है कि तमाम संवैधानिक संस्थानो में भी संसद की चलनी चाहिये । तो अगला सवाल यही होगा कि क्या काग्रेस ने इसी मर्म को पकड लिया है कि मुद्दा चाहे कोर्ट का हो या कानून के दायरे में भ्रष्टाचार का हो । लेकिन आखिर में राजनीतिक सत्ता ही जब सबकुछ तय करती है तो फिर हर मुद्दे को राजनीति से ही जोडा जाये । क्योकि बिहार चुनाव तक में प्रदानमंत्री मोदी की पहचान चुनावी जीत के साथ बीजेपी ने जोडी तो चुनावी हार के साथ प्रधानमंत्री मोदी की पहचान काग्रेस जोडना चाहती है ।क्योकि अगला चुनाव असम, बंगाल, तमिलनाडु और केरल में है । जाहिर है बीजेपी के लिये असम ही एक आस है । और लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा और साल भर बाद  पहली बार असम ही वह राज्य होगा जहा काग्रेस और बीजेपी आमने सामने होगी। तो सवाल दावों और वादों का नहीं बल्कि ठोस काम का है, और सच यही है कि संसद की बहस कोई उम्मीद जगाती नहीं और हंगामा सियासत को गर्म करता है । ऐसे में मंहगाई हो या कालाधन. रोजगार हो या न्यूनतम मजदूरी और किसानो की खुदकुशी हो या सूखा । उम्मीद कही किसी को नजर आती नहीं । कमोवेश इसी तरह की बहस तो जेएनयू में ढाई दशक पहले होती थी और संयोग देखिये बीते 27 बरस से जेएनयू के फूटपाथ पर जिन्दगी गुजारने वाला कवि  रमाशंकर विद्रेही चार दिन पहल मंगलवार को ही गुजर गया । जो अक्सर
 बीच बहस में अपनी नायाब पंक्तियो से दखल देता । उसी ने लिखा था, " एक दुनिया हमको घेर लेने दो / जहा आदमी आदमी की तरह / रह सके/कह सके / सह सके "

Wednesday, December 9, 2015

कांग्रेस गुण्डागर्दी से सरकार,न्यायव्यवस्था,जनता,सरकारी तंत्र और अन्य विपक्षी दलों को डराकर देश पर "राज" करना चाहती है क्या ??- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511

जब 2009 में दोबारा मनमोहन सरकार बनी तो सभी कोंग्रेसी लीडर अपना छिपा हुआ "घमंड"जनता को टीवी के माध्यम से दिखाने लगे थे !चापलूस टाईप के अफसरों-पत्रकारों ने उनके दिमाग में ये भर दिया कि अब आपको कोई नहीं हटा सकता !जिससे राहुल-सोनिया सोचने लगे कि करो !! जो चाहो !! उन्हें देख कर उनके मंत्री-प्रवक्ता भी बहकने लगे ! हालात ये हो गए कि "कंस-हृन्याक्ष और रावण "जैसों का दम्भ  सामने बौना नज़र आने लगा ! और फिर 2014 के चुनाव नतीजों ने उनके इस दम्भ को नेस्तनाबूद कर दिया !
                         कुछ देर हार के बाद कोंग्रेसी शांत रहे लेकिन जैसे ही दिल्ली में केज़रीवाल की 
"आप"जीती तो उन्होंने उनके "बेशर्मी"वाले गुन को अपना लिया और अंट-शंट बकने लगे ! बिहार में जैसे ही "महागठबंधन"जीता ,वैसे ही बेशर्मी में "गुंडागर्दी"भी घुलगयी ! तो अवतार हुआ एक नयी कांग्रेस का जो अब जो अब बता रही है इस देश की जनता को कि "राज"तो वो ही करेगी , वोट से चाहे जो कोई दल भी क्यों ना जीत जाए ??
             भूतकाल में भी सर्व श्री ,  देवगौड़ा,चंद्रशेखर,गुजराल,वीपी सिंह के शासन को याद कीजिये तो आप पाएंगे कि परोक्ष रूप से कोंग्रेसियों का दखल हर निर्णय में रहा है ! इतना ही नहीं पाठक मित्रो ! मैं आप सबको चेता देना चाहता हूँ कि अगर भविष्य में खुदा-ना-खास्ता कहीं सर्व श्री मुलायम सिंह ,नितीश कुमार ,लालू यादव , बहन मायावती और ममता जी इस देश की प्रधानमंत्री बन गयीं, तो भी चलेगी तो कांग्रेस की ही न!
               भाजपा में भी कई राज्यों और केंद्र के ऐसे नेता हैं जो राहुल-सोनिया जी की हाज़री लगाते हैं ! सिर्फ मीडिया-अफसर ही नहीं है इस काम में माहिर ! समझे जनाब आप लोग !! सोचिये - सोचिये !! देश को बर्बाद करने में कौन क्या-क्या भूमिका निभा रहा है ! हर समझदार नागरिक को ना केवल अब "मुखर "होना पडेगा बल्कि देश की आम जनता को भी मुखर व होशियार करना पड़ेगा !!
                  चोर को चोर कहना और उसे दंड दिलवाना अब इस देश में बदले की कार्यवाही क्यों कहलाता है ??मोदी जी !! आपको डरने की कतई आवश्यकता नहीं है !! इस देश की जनता आपके साथ है ! 40 -50 लेखक-इतिहासकार और फिल्मकारों के कहने से ये देश "असहिष्णु"नहीं होने वाला ! वामपंथी विचारधारा वाले लीडरों,पत्रकारों और समाजसेवियों से आपको कतई घबराने की आवश्यकता नहीं ! एक-एक भ्रष्टाचारी को आप न्यायपालिका से दंड दिलवाइए !!लेकिन.... 
                  लेकिन पार्टी के अंदर बैठे जयचंदों को भी पहचानिये !

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Posted by PD SHARMA, 09414657511 (EX. . VICE PRESIDENT OF B. J. P. CHUNAV VISHLESHAN and SANKHYKI PRKOSHTH (RAJASTHAN )SOCIAL WORKER,Distt. Organiser of PUNJABI WELFARE

Friday, December 4, 2015

पानी पानी रे......

पानी पानी रे......

बिजली है नहीं। पीने का पानी मिल नहीं रहा। सड़क पर पानी है। घरों में पानी के साथ सांप-बिच्छू भी हैं। अस्पताल डूबे हुये हैं। स्कूल बीते 15 दिनों से बंद हैं। फ्लाइट की आवाजाही ठप है। बच्चों के लिये दूध नहीं है। आसमान से फेंके जाते खाने पर नजर है। तो जमीन पर किसी नाव या बोट का इंतजार है। 300 से ज्यादा की मौत हो चुकी है। 1240 झोपडपट्टियों में रहने वाले नौ लाख से ज्यादा लोग तिल तिल मर रहे हैं। यह चेन्नई है। वही चेन्नई जो कभी मद्रास के नाम से जानी जाती थी। वही मद्रास जिसकी पहचान पल्लावरम के जरीये पाषाण काल से रही। वही पल्लावरम जो दुनिया के नक्शे पर सांस्कृतिक, आर्थिक और शौक्षणिक केन्द्र के तौर पर विकसित हुआ। और मौजूदा वक्त में वहीं चेन्नई जहां के हर शख्स कमाई देश में तीसरे नंबर पर आती है । वही चेन्नई आज बूंद बूंद के लिये मोहताज है। वही चेन्नई आज जीने की जद्दोजहद में जा फंसी है। वही चेन्नई मदद के एक हाथ के लिये बैचेन है ।

वही चेन्नई अपनो के रोने को देख कर रो भी नहीं पा रही है। जिस चेन्नई ने बीते दस बरस में विकास की ऐसी रफतार पकड़ी कि उसकी अपनी अर्थवस्था देश में चौथे नंबर पर आ गई। वही चेन्नई जिसने तकनीकी संस्थानों के आसरे दुनिया में अपनी पहचान भी बनायी और दुनिया के तमाम साफ्टवेयर कंपनियों को हुनरमंद दिये। वही संस्थान आज पानी में डूबे हैं। अंधेरे में समाये हैं। कम्यूटर तो दूर मोबाइल चार्ज करने तक के हालात नहीं हैं। जिस चेन्नई को चकाचौंध के आसरे विस्तार दिया गया। संयोग से आज उसी चेन्नई में सबसे घना अंधेरा है। 27 कालोनियों के 2 लाख परिवारों के सामने संकट है कि वह जाये तो कहां जायें। पानी में घर। गाडी में पानी। सडक पर पानी । और आसमान से लगातार गिरते पानी के खौफ के बीच मदद के लिये सरकार नहीं सेना के जवान है । एनडीआरएफ की टीम है । नेवी के बोट है । सरकार ने तो निर्णय लेकर चेम्बरमबक्कम झील से पानी छोड़ा कि कही झील का बांध ही ना टूट जाये । और झील उस जमीन पर हर किसी को लील ना लें जो झील की जमीन थी और अब उसकी जमीन पर क्रंकीट के घरों में लोग रह रहे है । तो इस पानी में सरकार कहीं नहीं है । सियासत के जरीये तैयार की गई चेन्नई नगर कही नहीं है । जो बच रहा जो बचा रहा है वह सेना है। और जिसने चेन्नई को खत्म किया वह सियासत है।

क्योंकि चेन्नई में बेमौसम भारी बरसात सिर्फ इस बार का सच नहीं है। बल्कि बीते छह दशको में कमोवेश हर दस बरस में इस तरह की जबरदस्त बारिश हुई । 1969, 1976, 1985, 1996, 1998, 2005, लेकिन जो 2015 यानी इस बार हुआ वह पहले नहीं हुआ । तो हर जहन में यह सवाल उठ सकता है कि ऐसा क्यों । तो सच कितना खतरनाक है जरा देख लीजिये। 4 बरस पहले ही चेन्नई का जो चकाचौंध अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा बना आज वहा सिर्फ पानी पानी है। और 6 दिसंबर तक पूरी तरह बंद किया जा चुका है तो उसकी सबसे बडी वजह है कि हवाई अड्डा ही अडयार नदी की जमीन पर बना दिया गया। शहर का सबसे बडा माल फोनेक्सि वेलचेरी झील की जमीन पर बना दिया गया। अब जिस तरह चेन्नई वासियो को कहा जा रहा है कि वह सडक मार्ग पर ना निकले तो कल्पना कीजिये चेन्नई का सबसे बडा बस टरमिनल शहर के कोयबेडू इलाके में बनाया गया जो सबसे निचली जमीन पर है यानी बाढ से सबसे प्रबावित इलाका है । देश के महानगर यू ही मरते शहर साबित नहीं हो रहे बल्कि चकाचौंध और पैसा कमाने की होड में कभी किसी ने सोचा ही नहीं कि दो नदी और 35 झीलों वाले इलाके में अगर सिर्फ क्रंकीट खड़ा किया गया तो हालात बिगडेंगे तो क्यो और कैसे बिगडेंगे इसकी थाह भी कोई नहीं ले पायेगा। और हुआ यही। बंकिघम कैनल और पल्लीकरनई कैनल की जमीन पर कंसट्रक्शन किया जा चुका है। एक्सप्रेस वे और बायबास बनाते वक्त देखा ही नहीं गया कि पानी की आवाजाही कही रुक तो नहीं रही। कैसे लोगो के जीवन के साथ खिलावाड़ कर विकास की खुली बोली लगायी गयी । इसका सच राष्ट्रीय राजमार्ग 45 और एनएच 4 के बीच बनाया गया बायपास है। जहां ड्रेनेज सिस्टम बंद हआ तो  न्नागर,पोरुर,वनाग्राम,माडुरावोयल,मुग्गापेयर और अंबातूर डूब गये। जो डूबने ही थे। क्योंकि पानी निकाला कैसे जाये इसकी कोई व्यवस्था है ही नहीं। नौलेज कैरिडोर और इंजीनियरिंग कालेज का निर्माण भी डूब वालीजमीन पर ही हुआ। किस तरीके से जमीन पर कन्स्ट्रक्शन हुआ या यूं कहें बेखौफ जमीन का दोहन हुआ उसका सबसे बडा असर दुरआवोयल लेक की हालत देख कर समझा जा सकता है। जो कभी 120 एकड में फैला था लेकिन अब 25 एकड़ में सिमटा है। और अब जब पानी फैला है तो वह 200 एक़ड को झील में बदल चुका है। दो मंजिली इमारत में भी यहां पानी पानी है। नदी और झील ही नहीं बल्कि कैनाल की जमीन पर भी कन्स्ट्रक्शन हो चुका है। अडयार क्रिक से कोवालम क्रीक के बीच दक्षिणी बाकिघम कैनाल जो 25 मिटर का होता है वह 10 मिटर में सिमट चुका है । चेन्नई के अंबेटूर टैक , अडमबक्कम टैक, पाल्लाईकरनाई टैक, विलिवक्कम टैक गायब है । और तो और चेन्नई में बाढ के हालात हो तो फिर जो पानी दशक भर पहले तक चेन्नई हारबार के उस इलाके में समा जाता था जो समुद्दर से लगा था तो वह जमीन भी मालवाहक जहाज और फ्राइट कैरिडोर तले खत्म कर दी गई । इतना ही नहीं जिस शहर में दस बरस पहले तक पानी निकासी की 150 वाटर बाडिज थी अगर वह अब घटकर सिर्फ 27 बचेगी तो होगा क्या।

जिस शहर की जमीन पर क्रंकीट का जंगल खडा करने की होड में 35 में से दस झीलों पर लोग रहने लगे तो फिर पानी का बुलबुला बढ़ेगा तो वह किस किस को अपनी हद में लेगा। यह कोई नहीं जानता । और चेन्नई के करीब 20 लाख लोग थिलईगईनागर झील ,पुझविथक्कम झील ,वेलाचेरी झील ,और मडीपक्कम झील की जमीन को ही क्रकिट के घर बनाकर रहने लगे । दो सरकारी कालोनिया भी झील की जमीन पर ही बन गई । दो दर्जन निजी कंपनियो के दफ्तर भी झील की जमीन पर ही खडे हो गये । 10 बरस में दरीब 90 हजार कन्स्टच्रक्शन में इस बात का ध्यान ही नहीं दिया गया कि पानी की निकासी हो गी कैसे । और जो प्लान शहर के लिये 2005 में जबरदस्त पानी के बाद बनाया गया वह पानी पानी वाले मौजूदा हालात से पहले ही चेन्नई कारपोरेशन ने पानी में बहा दिया । जो जमीन 2005 में 80 रुपये स्कवायर फीट थी वह 2015 में पांच हजार रुपये स्कावय पिट तक जा पहुंची है । लेकिन जमीन खरीदने और गैर कानूनी तरीके से कन्स्क्ट्रक्शन की होड आज भी है । लेकिन इसका कोई प्लान शहर में बदलती सियासत तले बन नहीं पाया कि कैसे गैरकानूी तरीके से बनाये गये सिवर सिस्टम को रोका जाये । और कैसे पानी अगर कही जमा होता है तो उसे निकाला कहा जाये । यानी सवाल सिर्फ ट्रेनेज सिस्टम के फेल होने का नहीं है । आलम यह है कि समूचे चेन्नई के लिये कारपोरेशन के पास सिर्फ 22 ट्रेनेज मशीन है । जबकि प्लान के लिहाज से सवा सौ से ज्यादा होनी चाहिये । पानी चोक होने की सबसे बडी वजह ड्रेनेज के पाइंट पर ही कन्स्ट्रक्शन का होना है । इसलिये पहली बार सवाल यह उठा है कि आर्थिक मदद
की रकम कुछ भी हो लेकिन मौजूदा वक्त में जान बचायी कैसे जाये और लोगो तक राहत पहुंचायी कैसे जाये । तो क्या चेन्नई को पटरी पर लाने के लिये सिर्फ पैसा चाहिये । रुपया चाहिये । डालर चाहिये । या कुछ और । क्योकि जयललिता ने पिछले महीने ही मांगे थे 2000 करोड । प्रधानमंत्री ने पिछले महीने 940 करोड़ रिलिज किये तो आज 1000 करोड की सहायता का एलान कर दिया । लेकिन नंबर से लगातार तीसरी बार जिस तरह का बारिश का ताडंव चेन्नई समेत तमिलनाडु के 60 फिसदी हिस्से को पानी पानी कर चुका है उसने यह तो साफ कर ही दिया है कि चेन्नई को हजारों हजारों करोड की नहीं बल्कि ऐसी प्लानिग की जरुरत है जहा शहर जिन्दगी के लिये बसे ना कि नाजायज कमाई के धंधे के लिये । और इसके लिये आर्थिक मदद नहीं बल्कि ठोस नियम-कायदे चाहिये । क्योकि चेन्नई में बीते दस बरस में जितने भी गैरकानूनी तरीके से कन्स्ट्रक्शन हुये । या शहर के प्लानिंग सिस्टम को ही ताक पर रख कर इमारते खडी हुई उसमें मुनाफे की रकम ही 2 लाख करोड से ज्यादा की है । क्रंकीट के जो घर , दफ्तर, कालोनिया और माल से लेकर हवाई अड्डे तक नदी और झिलो की जमीन पर बनकर खडे हुये उन जमीनो की किमत मौजूदा वक्त के लिहाज से एक लाख करोड से ज्यादा की है । इसलिये नवंबर से अब तक नुकसान के जो सरकारी आंकडे भी सामने आ रहे है वह 10 हजार करोड के है । जिसमें सिर्फ बीते तीन दिनो में 8 हजार करोड का नुकसान बताया जा रहा है । लेकिन जिस तरह देसी विदेशी मल्टी नेशनल कंपनियो के दफ्तर से लेकर तीन दर्जन आत्याधुनिक अस्पताल , 22 सिनेमा घर, 180 स्कूल . 16 कालेज की इमारते और करीब दो लाख घर पानी में डूबे है उसमें नुकसान कितना ज्यादा हुआ होगा इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है ।लेकिन समझना होगा कि नुकसान का जो आंकड़ा सामने नहीं आ आ रहा है वह चेन्नई शहर की त्रासदी के सामने बेहद कम इसलिये है क्योकि अधिक्तर कन्स्क्शन ही गैर कानूी है । और यह मामला हाईकोर्ट में भी पहुंचा । जहा चेन्नई कारपोरेशन ने माना कि -जार्ज टाउन सरीखी नयी जगह पर तो 90 फिसदी
कन्स्क्ट्कशन गैर कानूनी है । लेकिन समझना यह भी होगा कि चेन्नई के इस तरह के विसातार में कितना ज्यादा भ्रष्टाचार है । क्योंकि कारपोरेश ने हाईकोर्ट के सामने फाइन के तौर पर वसूली की रकम भी इन उलाको से सिर्फ 1000 रुपये दिखायी । तो क्लापना किजिये चेन्नई को दोबारा मद्रास वाले हालात में लाकर खडे करना किस सियासत के बूते है और इसके लिये कितनी रकम चाहिये। क्योकि केन्द्र के मदद की रकम के कई गुना ज्यादा से बना चेन्नई का यह चमकने वाला अंतऱाष्ट्रीय हवाई अट्टा भी पानी में समाया हुआ है।



Friday, November 20, 2015

चले गये राम मंदिर की आस लिए ............!!!

जो ना तो राजनीति का नायक बना। ना ही हिन्दुत्व का झंडाबरदार। लेकिन जो सपना देखा उसे पूरा करने में जीवन कुछ इस तरह झोक दिया कि संघ परिवार को भी कई मोड़ पर बदलना पड़ा। और देश की सियासत को भी राम मंदिर को धुरी मान कर राजनीति का ककहरा पढ़ना पड़ा। जी अशोक सिंघल ने सदा माना कि धर्म से बडी राजनीति कुछ होती नहीं। इसीलिये चाहे अनचाहे अयोध्या आंदोलन ने समाज से ज्यादा राजनीति को प्रभावित किया और धर्म पर टिकी इस राजनीति ने समाज को कही ज्यादा प्रभावित किया। इसी आंदोलन ने आडवाणी को नायक बना दिया। आंदोलन से निकली राजनीति ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री बना दिया। लेकिन निराशा अशोक सिंघल को मिली तो उन्होने गर्जना की। स्वयंसेवकों की सत्ता का विरोध किया। लेकिन आस नहीं तोड़ी। इसीलिये 2014 में जब नरेन्द्र मोदी को लेकर सियासी हलचल शुरु हुई तो चुनाव से पहले ही मोदी की नेहरु से तुलना कर राम मंदिर की नई आस पैदा की। यानी अपने सपने को अपनी मौत की आहट के बीच भी कैसे जिन्दा रखा यह महीने भर पहले दिल्ली में सत्ता और संघ परिवार की मौजूदगी में अपने ही जन्मदिन के समारोह में हर किसी से यह कहला दिया कि सबसे बेहतर तोहफा तो राम मंदिर ही होगा । लेकिन क्या यह तोहफा देने की हिम्मत किसी में है। 


यह सवाल विष्णु हरि डालमिया ने उठाया । भरोसा हो ना हो लेकिन सिंघल ने राम मंदीर को लेकर उम्मीद कभी नहीं तोड़ी । किस उम्मीद के रास्ते देश को समझने अशोक सिंघल बचपन में ही निकले और कैसे इंजीनियरिंग की डिग्री पाकर भी धर्म के रास्ते समाज को मथने लगे यह भी कम दिलचस्प नहीं। आजादी के पहले बीएचयू आईटी से बीटेक छात्रों की जो खेप निकली, सिंहल भी उसी का हिस्सा थे। लेकिन सिंहल ने कैंपस रिक्रूटमेंट के उस दौर में नौकरी और कारोबार का रास्ता नहीं पकड़ा। बल्कि देश बंटवारे के उस दौर में हिंदूत्व की प्रयोगशाला के सबसे बड़े धर्मस्थान गोरखपुर के गोरक्षनाथ मंदिर में उन्होंने डेरा डाला..गीता प्रेस और गीता वाटिका में वेदों और उपनिषदों का अध्ययन शुरु किया लेकिन आरएसएस नेता प्रोफेसर राजेंद्र सिंह रज्जू भैय्या के निर्देश पर वो आरएसएस प्रमुख गुरुजी गोलवलकर से मिलने नागपुर पहुंच गए। (दरअसल रज्जू भैय्या और अशोक सिंहल दोनों के पिता प्रशासनिक अधिकारी थे और यूपी के इलाहाबाद में अगल-बगल ही रहते थे, इसलिए दोनों परिवारों में रिश्ता बहुत गहरा बना। ) गोलवलकर से मुलाकात के बाद फिर सिंहल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, उन्होंने वेदों को पढ़ने का विचार छोड़ दिया...संगठन के रास्ते पर कदम आगे बढ़ाए....1950 और 1960 के दशक में सिंहल गोरखपुर, कानपुर और सहारनपुर में आरएसएस के प्रचारक रहे तो बाद में पूरा उत्तराखंड देहरादून-हरिद्वार और उत्तरकाशी तक उन्होंने कई साल आरएसएस के संगठन और आध्यात्मिक साधना में
साधू-संतों के साथ भी बिताया। यानी समाज को मथा। और 70 के दशक में राजनीति मथने लगे। 1970 के दशक में सिंहल ने जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया...दिल्ली में वो आरएसएस के प्रांत प्रचारक थे, जनता पार्टी के गठन में वो पर्दे के पीछे से अहम रोल अदा कर रहे थे...इमर्जेंसी के वक्त सिंघल भूमिगत हो गए....और जब इमर्जेंसी का दौर खत्म हुआ तो आरएसएस ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद में भेज दिया। और पहली बार सिंघल को भी लगा कि अब धर्म के आसरे राजनीति को भी मथा जा सकता है।

सिर्फ मंदिर ही उनकी नजरों में नहीं था वो राम मंदिर के जरिए सियासी तौर तरीको को बदल डालने में जुट गए......हिंदू धर्म की अंदुरुनी कमजोरियों के खिलाफ भी सिंहल ने मोर्चा खोला..। 1986 में अयोध्या में शिलान्यास हुआ तो सिंहल ने कामेश्वर नामके हरिजन से पहली ईंट रखवाई। देश के मंदिरों में दलित और पिछड़े पुजारियों की नियुक्ति का अभियान भी सिंहल ने चलाया। दलित और पिछड़ों को वेद पढ़ने के लिए सिंहल ने मुहिम चलाई, शंकराचार्यों से सहमति भी दिलवाई। दक्षिण भारत में दलित पुजारियों के प्रशिक्षण का बड़ा काम सिंहल ने शुरु करवाया। हिंदुओँ के धर्मांतरण के खिलाफ भी सिंहल ने मोर्चा खोला.....वनवासी इलाकों और जनजातियों से जुड़े करीब 60 हजारगांवों में उन्होंने एकल स्कूल खुलवाए....सैकड़ों छात्रावास भी पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक खड़े किए। दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में अशोक सिंहल ने विश्व हिंदू परिषद के सेवा कार्य शुरु किए, खास तौर पर संस्कृत, वेद और कर्मकांड और मंदिरों के रखरखाव पर उनका जोर था...आधुनिक शिक्षा और शहरीकरण में उपभोक्तावाद के खिलाफ परिवार को मजबूती देने में भी वो जुटे रहे। यही वो दौर था जब राम मंदिर आंदोलन अयोध्या में करवट लेने लगा था.....सिंहल ने अयोध्या आंदोलन में वो
चिंगारी ढूंढ ली जिसमें देश की राजनीति को बदल डालने की कुव्वत थी...इसके पहले आरएसएस और वीएचपी के एजेंडे में दूर दूर तक राम मंदिर नहीं था.....कहते हैं कि 1980 में दिल्ली में पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस राम मंदिर की मांग को लेकर सिंघल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो वीएचपी का लेटर हेड भी उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया..रामजन्म भूमि में उतरने का फैसला अकेले सिंघल ने ले लिया तो फिर पूरे संघ परिवार को पीछे चलने पर मजबूर कर दिया। राम मंदिर को लेकर उनका जुड़ाव बेहद भावुक था जिस पर उन्होंने कभी कोई समझौता मंजूर नहीं किया...यही वजह है कि वो एनडीए सरकार के वक्त पीएम अटल बिहारी वाजपेई और एलके आडवाणी के खिलाफ मोर्चा खोलने में भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया.......फिर वहा भरोसा टूटा लेकिन उम्मीद नहीं छोडी 2014 के चुनाव के पहले मोदी की पीएम उम्मीदवारी की मुहिम भी प्रयाग माघ मेले से सिंहल ने शुरु करवाई तो उनका सपना यही था कि मोदी सरदार पटेल की तरह सोमनाथ मंदिर की तरह अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए संसद में कानून लाकर सारे रोड़े खत्म करेंगे । लेकिन सपना यहा भी टूटा और शायद जीवन की डोर भी यही टूटी । सपना पूरा होने से पहले ही वो दुनिया छोड़कर चले गए।
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Friday, November 13, 2015

"5th pillar corruption killer " नामक ब्लॉग का कार्यालय जल कर राख हुआ !

"5th pillar corruption killer " नामक ब्लॉग का कार्यालय जल कर राख हुआ ! श्री पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक - विश्लेषक) की दूकान भी जली ! सूरतगढ़ के मोज़िज़ लोगों ने अफ़सोस जताया और नगर-पालिका की छोटी फायर-ब्रगेड द्वारा आग बुझाने में ज्यादा समय लेने के कारण नुक्सान ज्यादा हो जाने पर रोष भी प्रकट किया ! भगवान की

माया है जी सब ! 
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"मीडिया"जो आजकल अपनी बुद्धि से नहीं चलता ? - पीताम्बर दत्त शर्मा {लेखक-विश्लेषक}

किसी ज़माने में पत्रकारों को "ब्राह्मण"का दर्ज़ा दिया जाता था और उनके कार्य को "ब्रह्मणत्व"का ! क्योंकि इनके कार्य समाज,द...