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"खुले-साँड"बने घूमते , भारतीय लोकतंत्र के चारो स्तम्भ !!?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511.

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"न्यायपालिका,कार्यपालिका,विधायिका और पत्रकारिता"हमारे लोकतंत्र के मुख्य स्तम्भ रहे हैं ! वैसे तो लोकतंत्र भी हमारा नहीं है और इसके खम्भे भी "उधर के सिन्दूर " की तरह हैं जिनको हमने दुसरे देशों की देखा-देखि अपनाया है ! इतना ही नहीं हमारी आधुनिकता और हमारे मौजूदा सिद्धांत भी किसी दुसरे देशों की ही देन हैं !राष्ट्रपिता भी हमारे नहीं हैं राष्ट्र भाषा ,राष्ट्र-वर्दी भी हमारी नहीं है !केवल फोटो चिपकाये हुए हैं हम भारतवासी अपने लोकतंत्र के माथे पर !
                 क्यों ये आवश्यक था और क्यों ये भार धोना हमारे लिए आज भी आवश्यक है ! आज मीडिया समाचार दिखा रहा है कि बिहार में जंगल-राज फिर से अपने पैर पसर रहा है तो क्या मीडिया इस सबके लिए दोषी नहीं है उन विशेष राजनितिक दलों के साथ-साथ जिनको उसके सहयोग से वहाँ सत्ता प्राप्त हुई थी ! कितने पत्रकार नतीजे आने वाले  दिन विभिन्न चैनलों में मज़े ले-लेकर विश्लेषण कर रहे थे !इसी तरह से कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका भी ना जाने कितनी बार अपनी संवेधानिक सीमाएं लांघ चुकी हैं !
                             अब इन हालातों में कौन रोक पाये…

हम हन्दुस्तानी "पल में तोला पल में माशा"हो जाते हैं !! - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511 .

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वाह जी वाह !! हमारा भी जवाब नहीं जी ! इतिहास गवाह है हमारा , हम " हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानीयों "का क्योंकि वो भी तो पुराने हन्दुस्तानी ही हैं ! अल्लामा-इक़बाल भी तो लिखकर गए हैं कि " सारे जहां से अच्छा , हिन्दुस्तान हमारा " , क्या हुआ वो अगर बाद में पाकिस्तान चले गए तो उन्होंने कुछ और भी लिख दिया ?? कवि लोग तो भावुक होते ही हैं !?"फितरत" तो नहीं बदलती हमारी ! अब मुझे ही देखलो ! मैं भी उर्दू के शब्दों को वैसे ही प्रयोग करता हूँ जैसे हिंदी या किसी अन्य भाषा के !उसी तरह से ये भी हमारी फितरत का ही एक अहम हिस्सा है की हम पल में किसी को इतना प्यार करने लग जाते हैं कि , फिर हमें उससे प्यारा कोई और नज़र ही नहीं आता , जबकि कुछ ही समय पहले हम उसे मारने हेतु अपना 56 इंच का सीना दिखा रहे होते हैं !
                       हमें आशावान होना ही सिखाया गया है !! क्योंकि हर कष्ट सिर्फ "आशा" नामक "दवाई " से ही सही हो सकता है !किसी गोली तलवार या बम्ब से नहीं !और तर्क तो हम हर किसी हालात के अनुरूप गढ़ने में माहिर तो हैं ही ! इसीलिए हमें हर उस कदम का स्वागत ही…

" जनता के मुद्दे अब संसद से गुम होने लगे हैं "- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) - मो. न. - 9414657511

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जन हित हेतु देश के टुकड़े हुए,संविधान बना,नेता बने,संसद-विधानसभाएं-जिला परिषदें और नगर-पालिकाएं बनी ! इतना ही नहीं बल्कि धर्म बने , संत बने , समाज सेवी बने और संस्थाएं बनीं !जनता की सुविधा हेतु ही प्रशासन और उसके नियम बने , न्याय-पालिका बनी ,वकील -जज बने ! इन सबसे ऊपर पत्रकार-टीवी चेनेल और उनके एंकर बने ! लेकिन ....  महात्मा गांधी वाले " हे-राम " !! जनता आज इतना सब कुछ होने के बावजूद भी "खुश" नहीं है !!क्यों भला .....??????
                              क्यों आज उसे कोई नेता नहीं पसंद ?क्यों उसे आज कोई धर्म और उसके संत नहीं पसंद ? क्यों उसे आज देश की व्यवस्था पर विश्वास नहीं ? क्यों आज उसे हर कोई धोखेबाज़ नज़र आता है ? आइये ! हम नज़र डालते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है !! मैं यहां अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ - 
          1. आम आदमी जितना सारी उम्र में कमाता नहीं है ,उससे ज्यादा तो इस देश में एक अमीर आदमी को बैंक लोन की सब्सिडी मिल जाती है क्यों?
          2. आम आदमी के 35 कीमती साल बेहूदा शिक्षा - व्यवस्था की भेंट चढ़ जाते हैं , जबकि कोई हाथ का कारीगर 20 साल का होते-होते 500/…

नंगी होती हमारी राजनीति - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511

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आदम युग में नंगापन मनुष्य को बुरा नहीं लगता था क्योंकि सब नंगे ही होते थे ! लेकिन जब से समझदारों ने वस्त्र ग्रहण करने शुरू किये , तब से अगर कोई बिना किसी विशेष-कारण से नंगा होता है तो मानव-समाज को बुरा लगता है ! आज वस्त्रों के इलावा कई तरह के "ओढ़ने" हमें ओढ़ने पड़ते हैं ! जैसे लाज-शर्म की ओढ़नी,अपने मान-सन्मान की ओढ़नी और "ज्ञान" की ओढ़नी ओढ़ कर हमें चलना पड़ता है जी ! तभी तो हमारे प्रिय सलमानखान की एक फिल्म में एक गीत भी रख्खा था कि "ओढ़नी ओढ़ के नाचूँ आज "!!
                         लेकिन आज हम यहां चर्चा करना चाहते हैं राजनीतिज्ञों की ओढ़नी की , जो उन्होंने पिछले तीन दशकों से ओढ़ रख्खी है !!"  बेशर्मी "की ओढ़नी !जैसे-जैसे ये ओढ़नी मैली होती जा रही है वैसे वैसे हमारे नेता उसे बढ़िया बताकर हंस रहे हैं !हालांकि लोगों को उनकी पुरानी-फटी ओढ़नी से उनका नंगापन नज़र आ रहा है , जनता उन्हें इशारा भी कर रही है ,लेकिन हमारे नेतागण हैं कि अपने नंगेपन को वो नया फैशन बता रहे हैं !जो चंद नेता अपनी ओढ़नी को फटने से जैसे-तैसे बचाये हुए हैं ,उनकी ओढ़नी को भी ये बदमाश नेता तार-त…

जेएनयू, संसद, सत्ता और सपने !!?????

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"जहर मिलता रहा, जहर पीते रहे/रोज मरते रहे , मर कर जीते रहे /जख्म जब कोई जहनो दिल को मिला /जिन्दगी की तरफ एक दरीचा खुला / जिन्दगी हमें रोज आजमाती रही /हमे भी उसे रोज आजमाते रहे...."याद तो नहीं यह गजल है किसकी । लेकिन अस्सी के दशक में जेएनयू के गंगा ढाबे पर जब भी देश के किसी मुद्दे पर चर्चा होती तो एक साथी धीरे धीरे इन्ही लाइनों को गुनगुनाने लगता और तमाम मुद्दो पर गर्मा गरम बहस धीरे धीरे खुद ही इन्हीं लाइनों में गुम हो जाती। और तमाम साथी यह मान कर चलते कि आने वाले वक्त में अंधेरा छंटेगा जरुर। क्योंकि बहस का सिरा  तब मंडल-कमंडल की सियासत से शुरु होता और पूंछ पकडते पकडते हाथ में संसदीय चुनावी राजनीति का अंधेरा होता । लेकिन यह एहसास ना तब था ना अब है कि लोकतंत्र की दुहाई देकर जिस तरह चुनावी राजनीति को ही सर्वोपरि बनाया जा रहा है और राजनीतिक सत्ता के हाथों में अकूत ताकत समा रही है उसमें तमाम संवैधानिक संस्थाओं की भी कोई भूमिका बच पायेगी । यह लकीर है महीन, लेकिन इतनी धारदार है कि इसने संसदीय राजनीति की बिसात पर सांसदों और राजनेताओं को ही प्यादा बना दिया है । संसद की साख पर ही सवाल…

कांग्रेस गुण्डागर्दी से सरकार,न्यायव्यवस्था,जनता,सरकारी तंत्र और अन्य विपक्षी दलों को डराकर देश पर "राज" करना चाहती है क्या ??- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - +9414657511

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जब 2009 में दोबारा मनमोहन सरकार बनी तो सभी कोंग्रेसी लीडर अपना छिपा हुआ "घमंड"जनता को टीवी के माध्यम से दिखाने लगे थे !चापलूस टाईप के अफसरों-पत्रकारों ने उनके दिमाग में ये भर दिया कि अब आपको कोई नहीं हटा सकता !जिससे राहुल-सोनिया सोचने लगे कि करो !! जो चाहो !! उन्हें देख कर उनके मंत्री-प्रवक्ता भी बहकने लगे ! हालात ये हो गए कि "कंस-हृन्याक्ष और रावण "जैसों का दम्भ  सामने बौना नज़र आने लगा ! और फिर 2014 के चुनाव नतीजों ने उनके इस दम्भ को नेस्तनाबूद कर दिया !
कुछ देर हार के बाद कोंग्रेसी शांत रहे लेकिन जैसे ही दिल्ली में केज़रीवाल की 
"आप"जीती तो उन्होंने उनके "बेशर्मी"वाले गुन को अपना लिया और अंट-शंट बकने लगे ! बिहार में जैसे ही "महागठबंधन"जीता ,वैसे ही बेशर्मी में "गुंडागर्दी"भी घुलगयी ! तो अवतार हुआ एक नयी कांग्रेस का जो अब जो अब बता रही है इस देश की जनता को कि "राज"तो वो ही करेगी , वोट से चाहे जो कोई दल भी क्यों ना जीत जाए ??
             भूतकाल में भी सर्व श्री ,  देवगौड़ा,चंद्रशेखर,गुजराल,वीपी सिंह के शासन को याद कीजिय…

पानी पानी रे......

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पानी पानी रे...... बिजली है नहीं। पीने का पानी मिल नहीं रहा। सड़क पर पानी है। घरों में पानी के साथ सांप-बिच्छू भी हैं। अस्पताल डूबे हुये हैं। स्कूल बीते 15 दिनों से बंद हैं। फ्लाइट की आवाजाही ठप है। बच्चों के लिये दूध नहीं है। आसमान से फेंके जाते खाने पर नजर है। तो जमीन पर किसी नाव या बोट का इंतजार है। 300 से ज्यादा की मौत हो चुकी है। 1240 झोपडपट्टियों में रहने वाले नौ लाख से ज्यादा लोग तिल तिल मर रहे हैं। यह चेन्नई है। वही चेन्नई जो कभी मद्रास के नाम से जानी जाती थी। वही मद्रास जिसकी पहचान पल्लावरम के जरीये पाषाण काल से रही। वही पल्लावरम जो दुनिया के नक्शे पर सांस्कृतिक, आर्थिक और शौक्षणिक केन्द्र के तौर पर विकसित हुआ। और मौजूदा वक्त में वहीं चेन्नई जहां के हर शख्स कमाई देश में तीसरे नंबर पर आती है । वही चेन्नई आज बूंद बूंद के लिये मोहताज है। वही चेन्नई आज जीने की जद्दोजहद में जा फंसी है। वही चेन्नई मदद के एक हाथ के लिये बैचेन है ।

वही चेन्नई अपनो के रोने को देख कर रो भी नहीं पा रही है। जिस चेन्नई ने बीते दस बरस में विकास की ऐसी रफतार पकड़ी कि उसकी अपनी अर्थवस्था देश में चौथे नंबर पर …

चले गये राम मंदिर की आस लिए ............!!!

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जो ना तो राजनीति का नायक बना। ना ही हिन्दुत्व का झंडाबरदार। लेकिन जो सपना देखा उसे पूरा करने में जीवन कुछ इस तरह झोक दिया कि संघ परिवार को भी कई मोड़ पर बदलना पड़ा। और देश की सियासत को भी राम मंदिर को धुरी मान कर राजनीति का ककहरा पढ़ना पड़ा। जी अशोक सिंघल ने सदा माना कि धर्म से बडी राजनीति कुछ होती नहीं। इसीलिये चाहे अनचाहे अयोध्या आंदोलन ने समाज से ज्यादा राजनीति को प्रभावित किया और धर्म पर टिकी इस राजनीति ने समाज को कही ज्यादा प्रभावित किया। इसी आंदोलन ने आडवाणी को नायक बना दिया। आंदोलन से निकली राजनीति ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री बना दिया। लेकिन निराशा अशोक सिंघल को मिली तो उन्होने गर्जना की। स्वयंसेवकों की सत्ता का विरोध किया। लेकिन आस नहीं तोड़ी। इसीलिये 2014 में जब नरेन्द्र मोदी को लेकर सियासी हलचल शुरु हुई तो चुनाव से पहले ही मोदी की नेहरु से तुलना कर राम मंदिर की नई आस पैदा की। यानी अपने सपने को अपनी मौत की आहट के बीच भी कैसे जिन्दा रखा यह महीने भर पहले दिल्ली में सत्ता और संघ परिवार की मौजूदगी में अपने ही जन्मदिन के समारोह में हर किसी से यह कहला दिया कि सबसे बेहतर तोहफा तो राम…

"5th pillar corruption killer " नामक ब्लॉग का कार्यालय जल कर राख हुआ !

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"5th pillar corruption killer " नामक ब्लॉग का कार्यालय जल कर राख हुआ ! श्री पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक - विश्लेषक) की दूकान भी जली ! सूरतगढ़ के मोज़िज़ लोगों ने अफ़सोस जताया और नगर-पालिका की छोटी फायर-ब्रगेड द्वारा आग बुझाने में ज्यादा समय लेने के कारण नुक्सान ज्यादा हो जाने पर रोष भी प्रकट किया ! भगवान की

माया है जी सब ! 
" आकर्षक - समाचार ,लुभावने समाचार " आप भी पढ़िए और मित्रों को भी पढ़ाइये .....!!!
BY :- " 5TH PILLAR CORRUPTION KILLER " THE BLOG . प्रिय मित्रो , सादर नमस्कार !! आपका इतना प्रेम मुझे मिल रहा है , जिसका मैं शुक्रगुजार हूँ !! आप मेरे ब्लॉग, पेज़ , गूगल+ और फेसबुक पर विजिट करते हो , मेरे द्वारा पोस्ट की गयीं आकर्षक फोटो , मजाकिया लेकिन गंभीर विषयों पर कार्टून , सम-सामायिक विषयों पर लेखों आदि को देखते पढ़ते हो , जो मेरे और मेरे प्रिय मित्रों द्वारा लिखे-भेजे गये होते हैं !! उन पर आप अपने अनमोल कोमेंट्स भी देते हो !! मैं तो गदगद हो जाता हूँ !! आपका बहुत आभारी हूँ की आप मुझे इतना स्नेह प्रदान करते हैं !!नए मित्र सादर आमंत्रित हैं ! the link is - w…