संघ मान रहा है बीजेपी को परिपक्व नेतृत्व चाहिये ?

बीजेपी अधय्क्ष को लेकर जलगांव में मंथन


एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी तो दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी । और बीच में अमित शाह के अध्यक्ष पद की कुर्सी । जिस पर फैसले की घड़ी अब आ चुकी है और कल से जलगांव में दो दिनों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोर कमेटी इसी पर मंथन करेगी की अमित शाह को दोबारा बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाये कि नहीं। बैठक में संघ के मुखिया मोहन भागवत समेत भैयाजी जोशी, सुरेश सोनी , दत्तात्रेय होसबोले, कृष्ण गोपाल, सह कार्यवाहक विभाग्या और बौद्दिक प्रमुख स्वांत रंजन समेत दर्ज भर अधिकारी चिंतन मनन करेंगे। और चिंतन मनन सिर्फ इस बात को लेकर नहीं होगा कि अमित शाह का क्या किया जाये बल्कि मंथन इस बात को लेकर ज्यादा होगा कि जब केन्द्र में संघ के राजनीतिक संगठन बीजेपी की सरकार है । प्रधानमंत्री स्वयंसेवक है । तो फिर बीजेपी के चुनावी जीत के विस्तार पर दिल्ली और बिहार में ब्रेक क्यों लग गयी । और संघ के सैद्दांतिक मुद्दों से इतर मोदी सरकार निर्णय ले रही है और फिर चुनावी जीत नहीं मिल रही है तो यह रास्ता कब तक अपनाया जा सकता है । यानी अमित शाह को दोबारा बीजेपी अध्यक्ष बनाने के लिये जिस मंथन की तैयारी संघ परिवार कर रहा है उसमें यह कहा जरुर जा सकता है कि आखरी फैसला तो पीएम मोदी को ही लेना होगा लेकिन आडवाणी और जोशी की सहमति भी होनी चाहिये यह संघ भी मान रहा है। क्योंकि अमित शाह का विरोध आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी ,शांता कुमार और यशंवत सिन्हा ने बिहार
चुनाव परिमाम के बाद पत्र को लिख कर किया था । और जिम्मेदारी से बचने और पार्टी को तानाशाह के अंदाज में चलाने का आरोप मढा था। जाहिर है इसपर आजतक जबाब नहीं दिया गया । और संघ परिवार ने भी खामोशी ही बरती । यानी जो सवाल आडवाणी जोशी ने उठाये वह भी बीजेपी के पास पेंडिग पडे है । और आरएसएस यह कतई नहीं चाहेगा कि कोर कमेटी की बैठक में बीजेपी अधयक्ष को लेकर जो भी फैसला हो उसके बाद बीजेपी के भीतर से कोई आवाज विरोध की उठे ।

ऐसे में अगर अमित शाह पर संघ मुहर लगाता है तो यह हो सकता है कि जलगाव में फैसले के बाद खुद सरसंघचालक मोहन भागवत और भैयाजी जोशी दिल्ली आकर आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की सहमति लें । क्योकि जानकारी के मुताबिक जलगांव बैठक से पहले संघ और सरकार के बीच तालमेल बैठाने का काम देख रहे कृषण गोपाल ने आडवाणी और जोशी से मुलाकात की थी । और दोनो ने पार्टी को परिपक्व हाथो में देने की वकालत की । यानी अमित शाह के नाम को लेकर दोनो का रुख नरम पड़ा नहीं था। यूं मोदी सरकार के नीतिगत फैसले और उसपर अमित शाह की खामोश मुहर ने भी बुजुर्ग और अनुभवी स्वयंसेवकों में अंसतोष पैदा किया है। मसलन कश्मीर में सरकार बीजेपी की भी है लेकिन धारा 370 जस का तस है। और माना जा रहा है मेहबूबा मुफ्ती के सीएम बनने के बाद धारा 370 को स्थायी भी बना दिया जायेगा। यानी बीजेपी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की ही लाइन को भूल चुकी है । फिर स्वदेशी का नारा संघ परिवार से निकला लेकिन सरकार एफडीआई के रास्ते चल निकली है । किसान संध और आदिवासी कल्याण संघ सरकार के भूमि अधिग्रहण के रुख को लेकर नाराज है । जनसंघ के दौर से आदर्श गांव का जिक्र हुआ अब स्मार्ट सीटी का जिक्र हो रहा है । संघ को अंखड भारत पर सफाई देनी पड़ रही है और प्रदानमंत्री मोदी पाकिस्तान की पीएम को जन्मदिन की बधाई देने के लिये लाहौर जाकर देश को चौंका रहे हैं। यानी सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या मोदी सरकार और बीजेपी के बीच राजनीतिक तालमेल नहीं है । संघ परिवार के सिद्दांत मोदी सरकार के दौर में बदल रहे है । या फिर सत्ता में आने के बाद से बीजेपी हो या संघ परिवार सभी की पहचान मोदी सरकार के निर्णयो पर आ टिकी है । यह ऐसे सवाल है जिसे लेकर पहली बार आरएसएस परेशान है । इसलिये जलगांव में संघ के कोर कमेटी की बैठक के
केन्द्र में वह सवाल है जिनके आसरे बीजेपी को परिपक्व नेतृत्व मिल सके या परिवपक्वता आ जाये। जनसंघ के दौर के नारे, एक निशान, एक विधान , एक प्रधान की सोच जाग सके। संघ की बुनियादी सोच को बीजेपी राजनीतिक तौर पर विस्तार दें । यानी मोदी के सत्ता में आने के बाद पहली बार संघ परिवार के भीतर इस बात को लेकर चिंता कही ज्यादा है कि राजनीतिक सफलता भर के लिये कहीं सामाजिक-आर्थिक जमीन पर से स्वयंसेवकों के पांव तो नहीं उखड़ रहे।

क्योंकि बीते हफ्ते ही इन्दौर में संघ की सभा हो या पुणे में संघ का समागम दोनो जगहों पर संघ के मुखिया ने सवाल सामाजिक मुद्दो के आसरे उठाये। तो सवाल यही है दिल्ली में अपनी सत्ता होने के बावजूद संघ अपने विस्तार के लिये अपने ही आधारो को अगर लगातार खंगाल रहा है तो फिर उसी के राजनीतिक संगठन बीजेपी को चुनावी जीत क्यो नहीं मिल पा रही है । और चुनाव में जीत अगर पार्टी सदस्य संख्या में बढोतरी या सांगठनिक ढांचे को दुरस्त करने के बाद भी नहीं मिल रही है तो क्या जिस परिपक्व नेतृत्व का सवाल आडवाणी जोशी उठा रहे हैं अब उस दिशा में बीजेपी को संघ ले जाना चाहेगा । यानी वैचारिक ताकत भी होनी चाहिये । जाहिर है संघ के कोर कमेटी की बैठक में इन सारे सवालो पर मंथन होगा । और माना जा रहा है कि 14 जनवरी को ही तमाम मशक्कत के बाद एलान होगा कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष होगा कौन।

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