Friday, June 6, 2014

" राही मनवा दुःख की चिन्ता क्यूँ सताती है , दुःख तो अपना साथी है " ???- पीताम्बर दत्त शर्मा ( विश्लेषक-विचारक )

" दुःख-सुख के चक्क्रों से दूर जा चुके मेरे सभी स्वर्ग का सुख भोग रहे " मित्रों को मेरा सादर नमन !! क्या कहा ?? ऐसा इस दुनिया में कोई नहीं ?? नहीं - नहीं ऐसा नहीं है जी , सभी जीवित प्राणी अपने जीवन में भरपूर सुख भी भोगते हैं , लेकिन हम हमेशां ही और बड़े सुख को भोगना चाहते हैं ! इस चक्कर में हम रोज़ाना भोग रहे छोटे सुखों को " नज़रअंदाज़ " कर देते हैं या फिर उसे भोगते ही नहीं बल्कि उसे नकार देते हैं !!
            एक फ़िल्मी गीत है कि " सुख के सब साथी , दुःख में ना कोय !! इसका मतलब ये हुआ कि जब आपके पास 4 यार दोस्त आकर बैठ जाते हैं उस वक्त आप सुखी होते हैं , लेकिन हमें आभास नहीं होता ! क्योंकि हम सोचते हैं की ये तो हमारे कारण से आये हैं ! भगवान का इसमें क्या हाथ है ?? हम बड़े ही चालाक हो गए हैं जी , भगवान के नाम, हम सारे दुःख लिख देते हैं और सुखों के दावेदार हम खुद बन जाते हैं ! ना जाने हम किसको धोखा दे रहे होते हैं !!
           आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी ना किसी चक्कर में ही उलझे रहते हैं !मुझे याद है हम जब छोटे हुआ करते थे तो हमारे शहर , गाँव और घर में बहुत कम मशीनें और साधन हुआ करते थे !! 10 - 20 कोस तो लोग ऐसे ही चले जाया करते थे ! दो तीन पशु तो हर घर में हुआ करते थे ! हाथ की चक्की से आता पीसना , पानी गाँव के कुँए से भर कर लाना दिन में दो बार घर को गोबर का पोचा लगाकर साफ़ करना हमारी माँ  सहयोग से बड़े ही आराम से कर लिया करती थी !!साधन के नाम पर गाड़े हुआ करते थे !! 
         साल में 2-3 बार हम अपने रिश्तेदारों के घर मिलने जाया करते थे और 15 दिनों से लेकर महीना भर वहां रह आया करते थे !! आजकल तो जिधर देखो उधर मशीनें ही मशीनें और साधन ही साधन नज़र आते हैं ! घंटों का काम मिनटों में हो जाता है ! तब तो सबके पास खुला टाइम  था सुख भोगने हेतु , लेकिन वाह मेरे राम जी आपकी ये माया भी अजीब है जी आदमी को तो मरने की भी फुर्सत नहीं है !!
           अगर भगवान ने जनम और मरण मानव से पूछ कर करना होता तो ये आदमी भगवान को ऐसे - ऐसे चक्क्रों में डालता की स्वयं भगवान भी घूम जाता !!शायद इसीलिए परमात्मा ने सतयुग के बाद ऐसे कई काम अपने कंट्रोल में रख लिए ताकि उसकी व्यवस्था बिगड़े नहीं !!क्योंकि भगवान भी कर्मों के फल का तुरन्त हिसाब करने के चक्कर में कई बार उलझन में फंस जाया करते थे और बाद में कई राक्षस उन्हें बड़ा नचाया भी करते थे !

           इसलिए मेरे प्यारे मित्रो !! स्वर्ग हमारे सामने होता है लेकिन हम संसारी माया के चक्कर में फंसकर उसे देख-समझ नहीं पाते ! इस दुनियादारी के चक्कर में सुखी होते हुए भी दुखी होकर अपना जीवन नीरस बना डालते हैं !! हमारे शरीर से ही हमें कितने सुख मिलते हैं , ज़रा नज़र दौड़ा कर देखिये समझिए तो सही !! परमात्मा ने अपनी प्रकृति को कितने सुखदायी रंगों से रचा-भरा हुआ है तो सही !! एक ऑक्सीज़न का सिलेण्डर डॉक्टर लगाये तो कितने पैसे लगते हैं और कितना कष्ट भोगना पड़ता है और भगवान ने तो हमें " ऑक्सीज़न " फ्री में और आसान तरीके से लेने और कार्बनडाईऑक्साइड मज़े से छोड़ने का सिस्टम बना रख्खा है देखिये तो ज़रा यारो !! हम कितने सुखी हैं ???? इसलिए सब मेरे साथ कहिये - परमपिता परमात्मा की जय हो !!
              आपका क्या कहना है साथियो !! अपने विचारों से तो हमें भी अवगत करवाओ !! ज़रा खुलकर बताने का कष्ट करें !! नए बने मित्रों का हार्दिक स्वागत-अभिनन्दन स्वीकार करें !
जिन मित्रों का आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं और बधाइयाँ !!
"इन्टरनेट सोशियल मीडिया ब्लॉग प्रेस "
" फिफ्थ पिल्लर - कारप्शन किल्लर "
की तरफ से आप सब पाठक मित्रों को आज के दिन की
हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं !!
ये दिन आप सब के लिए भरपूर सफलताओं के अवसर लेकर आये , आपका जीवन सभी प्रकार की खुशियों से महक जाए " !!
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आशा है आपका प्यार मुझे इसी तरह से मिलता रहेगा !!आपका क्या कहना है मित्रो ??अपने विचार अवश्य हमारे ब्लॉग पर लिखियेगा !!
सधन्यवाद !!
आपका प्रिय मित्र ,
पीताम्बर दत्त शर्मा,
हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार,
R.C.P. रोड, सूरतगढ़ !
जिला-श्री गंगानगर।
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Posted by PD SHARMA, 09414657511 (EX. . VICE PRESIDENT OF B. J. P. CHUNAV VISHLESHAN and SANKHYKI PRKOSHTH (RAJASTHAN )SOCIAL WORKER,Distt. Organiser of PUNJABI WELFARE SOCIETY,Suratgarh (RAJ.)  

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-06-2014) को ""लेखक बेचारा क्या करे?" (चर्चा मंच-1636) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. भगवान की इस दुनिया में दुःख-सुख लगा ही रहता है ,मानव स्वभाव चिंता तो होनी ही है .सुन्दर रचना

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