Friday, June 27, 2014

वैदिक धर्म यानी हिन्दू धर्म के पुनरुद्धारक थे कुमारिल भट्ट - - - !! साभार !!


 जब पूरा भारत बौद्धों की चपेट यानी बौद्धप्राय हो गया था, लगभग नास्तिक धर्म राष्ट्रबाद से अलग -थलग होता भारतदेश, विदेशी आक्रमण-कारियों के लिए चारागाह होता देश, बौद्धधर्म राजा और महराजाओ का धर्म, जनता की बिना इक्षा के उस पर थोपा हुआ धर्म, जिसका भारतीयता से कोई ताल-मेल नहीं, जिसमे राष्ट्रबाद के लिए कोई स्थान नहीं, ऐसे में किसी भी देश-भक्त का चिंतित होना स्वाभाविक है काशी में एक बौद्ध राजा की महारानी अपने घर के छत पर खड़ी होकर वैदिक धर्म की दुर्दशा पर रो रही थी किससे कहे अपने मन की ब्यथा को--! वैदिक अथवा सनातन धर्म का नाम लेना तो अपराध हो गया था, गली से जाता हुआ गुरुकुल का एक ब्रम्हचारी जिसके सिर पर पानी की कुछ बूद टपकी ब्रम्हचारी को लगा कि बिना वर्षा के ये पानी -- ऊपर देखा तो एक महिला रो रही है, माता क्या कष्ट है-? उस रानी के मुख से अनायास ही निकल गया कौन बचाएगा इस सनातन- वैदिक धर्म को --? मै वेदों का उद्धार करुगा, मै पुनर्स्थापना करुगा अपने सनातन धर्म का, यह आश्वासन देना किसी और का नहीं आचार्य कुमारिलभट्ट का ही साहस था.
         कुमारिलभट्ट के जन्म के बारे में कई मत है कुछ लोग उन्हें दक्षिण भारत का मानते है जबकि उत्तर के लोग मिथिला को उनकी जन्म भूमि मानते है इतना तो सही है २८०० वर्ष पूर्व शंकराचार्य के समकालीन यानी उनसे लगभग उम्र में कुछ बड़े थे, उनके मुख्य शिष्य मंडन मिश्र की शिक्षा -दीक्षा कुमारिल द्वारा स्थापित गुरुकुल गौड़ राजधानी मंडला में हुई, वे पहले आचार्य है जिन्होंने जैन अथवा बौद्ध धर्म का खंडन कर वैदिक धर्म की श्रेष्ठता को सिद्ध किया, कुमारिल भट्ट माँ नर्मदा उद्गम स्थल अमरकंटक जो गोविन्द्पाद [शंकराचार्य के गुरु] के गुरु गौडपाद की तपस्थली पहुचे उन्होंने गौडपाद [वेदब्यास के अवतार] से कई शंकाए ब्यक्त की आचार्य 'एकं सद बिप्रा बहुधा बदंति'--! इसका निवारण करते हुए गौड़ पाद  ने उन्हें बताया की जिनका विस्वास वेदों पर है, जो भारतीय वांगमय को मानते है, ये उन्ही के लिए है न कि अन्य अथवा परकियो के लिए, दूसरा उन्होंने कहा पुत्र खंडन नहीं मंडन करो, तीसरा उन्होंने वैदिक कर्मकांड पर जोर दिया, उन्ही की बात को ध्यान में रखकर अपने प्रिय शिष्य विश्वरूप का नाम मंडन मिश्र रखा, आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने जो दिग्विजय यात्रा शुरू की उसकी पूर्व भूमिका अथवा वातावरण कुमारिल भट्ट ने पहले ही तैयार किया था, यह अतिसयोक्ति नहीं होगा कि कुमारिल की तर्क बुद्धि के आधार पर ही शंकराचार्य को दिग्विजय प्राप्त हुई .
           कुमारिल को वेदाध्ययन तो था ही लेकिन बौद्ध मत के खंडन हेतु मगध के नालंदा बौद्ध गुरुकुल में अध्ययन करना पड़ा, प्रति-दिन धर्मपाल द्वारा प्रवचन में वेदों की आलोचना होती कुमारिल इस आलोचना को कितना बर्दास्त करते एक दिन सभा में कुमारिल के आखो से आसू बहने लगा धर्मपाल [कुलपति] ने कहा कुमारिल तुम्हारा स्वस्थ ठीक नहीं है तुम विश्राम करो, नहीं आचार्य मेरा स्वस्थ ठीक है पुनः वेदों की आलोचना पर उनके आखो में आसू देखकर धर्मपाल  ने दुबारा टोका वे फिर वही बैठे रहे, जब तीसरी बार वेदों की आलोचना होने लगी तो कुमारिल के आसू देख धर्मपाल ने डाटा की तुम्हारी तबियत ठीक नहीं तुम कमरे में क्यों नहीं जाते---? नहीं आचार्य स्वास्थ तो आपका नहीं ठीक है मै तो ठीक ही हूँ, बिना वेदों के अध्ययन के वेदों की आलोचना कर रहे है आप जैसे विद्वान के लिए यह शोभा नहीं देता, फिर क्या था--? गुरुकुल के आचार्यो को लगा ये तो बौद्ध धर्म को स्वीकार ही नहीं किया, ये सनातन हिन्दू धर्म को ही मानता है जिनका सिद्धांत कहता है अहिंसा परमो धर्मः, उन्होंने कुमारिल को सजा सुनाई कि इसको दुमंजिले से सिर के बल फेक दिया जाय, कुमारिल भट्ट ने कहा -मुझे एक मौका चाहिए, वे पद्म आसन में बैठे आवाहन किया यदि वेद सत्य है तो मुझे कुछ नहीं होगा, उन्हें सिर के बल फेका गया वे पैदल चलते चले गए उनकी विजय पताका पूरे मिथला फिर देश -देशांतर में फैलने लगी.
           कहते है कि वे पूर्वमीमांशा के प्रथम आचार्य है आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने जो वैदिक धर्म की विजय पताका पूरे देश में फहरायी उसकी पूरी भूमिका कुमारिल भट्ट ने पहले ही तैयार कर दी थी आचार्य की विद्वता के लिए उनके शिष्य मंडन मिश्र का ही परिचय ही पर्याप्त है, आदि शंकर उनसे शास्त्रार्थ के लिए पधारे तो वे प्रयाग में संगम पर तुषानल [चावल की भूसी] में जल रहे थे शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ के लिए आवाहन किया तो उनकी यह दशा देखकर अपनी अंजुली में जल लेकर मै अभी तुषानल को शांति करता हूँ, नहीं आचार्य मुझे पता था आप आने वाले है, यह कार्य मेरा शिष्य मंडन करेगा मैने गुरुद्रोह किया है मैंने यह स्वयं ही स्वीकार किया है, शंकर ने उनसे कहा कि आपने तो सनातन धर्म, वेदों को बचाने के लिए ही यह कार्य है इसलिए यह कैसे गलत हो सकता है, लेकिन कुमारिल किसी तर्क को मानने को तैयार नहीं थे! शंकराचार्य उन्हें हमेशा गुरु स्थान पर रखते थे उनका मत मीमांसामें गुरुमत कहा जाता है, पूर्वमीमांसा दर्शन के शावर भाष्य पर उनकी टीका है, इनका दूसरा ग्रन्थ 'श्लोक-वार्तिक' है, वे जैन अथवा बौद्ध मतों को खंडन करने वाले प्रथम आचार्य है उन्होंने वेदों की सार्थकता, वेद अपौरुषेय है यह अपने तर्कों द्वारा सिद्ध किया, जिन्हें हमेशा भारतवर्ष और हिन्दू धर्म कृतज्ञता अर्पित करता रहेगा. 



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पीताम्बर दत्त शर्मा,
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जिला-श्री गंगानगर।
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Posted by PD SHARMA, 09414657511 (EX. . VICE PRESIDENT OF B. J. P. CHUNAV VISHLESHAN and SANKHYKI PRKOSHTH (RAJASTHAN )SOCIAL WORKER,Distt. Organiser of PUNJABI WELFARE SOCIETY,Suratgarh (RAJ.) 
Posted by PITAMBER DUTT SHARMA  

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-06-2014) को "ये कौन बोल रहा है ख़ुदा के लहजे में... " (चर्चा मंच 1658) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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