"अंधेर नगरी - चौपट राजा "......जनता की अक्ल का बंद हुआ दरवाज़ा ..?? - पीताम्बर दत्त शर्मा

   एक पुरानी कथा प्रचलित है कि  भारत में एक गुरुदेव अपने शिष्यों के साथ विचरण करते हुए पंहुचे ! सुबह की ठंडी हवा के साथ सूर्यदेव ने अपने दर्शन देकर प्रकृति की सुंदरता को जैसे दो गुना कर दिया था ! चिड़िया की चहचाहट और भँवरों का गुंजन इस सुंदरता को और भी मनमोहक बना रहा था ! चरों और फूलों की सुगन्ध फैली थी !

         " गुरुदेव ! ये हम किस नगर में प्रवेश कर चुके हैं ? देखिये न ! कितने सुन्दर पुष्प हैं यंहां ! इनकी सुगंध तो मन को मोह रही है ! ऐसा लगता है कि हम किसी ऐश्वर्यपूर्ण नगरी में आ पंहुचे हैं "! शिष्य ने प्रसन्न होते हुए कहा ! गुरुदेव बिना कोई उत्तर दिए आगे बढ़ते गए ! चलते-चलते दोपहर हो चली ! अब गर्मी  के साथ भूख-प्यास भी शिष्य को सताने लगी थी ! उसने कहा - " गुरुदेव , लगता है , पैरों की थकान अब और आगे नहीं जाने देगी ! क्यों ना एक वृक्ष के नीचे ठहर कर थोडा विश्राम कर लिया जाए "? गुरुदेव ने सहमति दे दी ! शिष्य ने तुरंत पड़ाव दाल दिया ! फिर जेब को टटोला ! और गुरु जी से पुछा , क्या मैं कुछ खाने को ले आऊं ?? गुरु जी ने अपनी आज्ञा दे दी !
                   वापिस आकर शिष्य ने जो नगरी की प्रशंसा करी उसे सुन गुरु जी भी दांग रह गये ! शिष्य ने बताया , यंहा तो सब कुछ एक ही भाव में मिलता है ! चाहे पका हुआ लो या फिर कच्चा , मैंने तो अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और मैं टेक का पका हुआ भोजन ही ले आया !!गुरु जी ने ये सुनते ही अपने शिष्य को भी पड़ाव बाँधने का कहा और लगे सव्यं भी पोटली बाँधने ! शिष्य ने पूछा क्यों गुरु जी तो वे बोले यंहा रहना खतरे से खाली नहीं है जंहाँ " अंधेर नगरी,चौपट राजा , टेक सेर भाजी , टेक सेर ख्वाजा !! जंहा गुणों की कदर ना होती हो वंहा कुछ भी अनिष्ट हो सकता है ! इसलिए चलो ! शिष्य लगा मिन्नतें करने गुरु जी मुझे तो यंही रहने दीजिये कुछ दिन तो आनद ले ले हैम इस बढ़िया जगह का , हमारी सेहत भी बन जायेगी ! गुरु जी बोले ठीक है मैं शहर के बाहर रुकता हूँ और तुम यंही रहलो !
             बस जी वो शिष्य लगा घूमने , खाने और आनंद उठाने ! तभी उसे एक घोषणा सुनायी दी-सावधान !! राजा ने एक बुद्धिमान व्यक्ति ढूंढकर लाने हेतु कहा है , ये सुनते ही शिष्य सब छोड़ उनसिपहियों के सामने आ गया और बोला कहिये राजा को क्या काम है ! मैं ही हूँ इन सब में से बुद्धिमान आदमी !
                    सिपाही उसे राजा के सामने ले गये , राजा बोला , " डालदो इसके गले में ये फांसी का फंदा , और देखो पूरा आता है या नहीं" , भगवान की मर्ज़ी देखिये वो फांसी का फंदा उस शिष्य के गले में बिलकुल पूरा आ गया ! ये सुन शिष्य की तो साँसें ही रुक गयीं !! उसने पूछा , राजा जी मैंने कौन सा अपराध किया है , मुझे क्यों फांसी दी जा रही है ?? तो राजा  बोला हमारे मंत्री ने घोटाला कर दिया था , उसे फांसी की सज़ा होनी थी लेकिन जांच करने वालों और फांसी लगाने वालों ने फंदा बड़ा बना दिया तो हमने आदेश दे दिया कि जिसके गले में ये फंदा पूरा आएगा उसे ही फांसी पर चढ़ा दो !
              फांसी का तखत लग गया , फंदा शिष्य के गले में दाल दिया गया , और फिर गिनती होने लगी ....एक - दो -और इससे पहले कि तीन बोला जाता एक्साख्त आवाज़ आयी , ठहरो !! गुरु जी आ गये थे , वे राजा से बोले कि हे राजन ये मेरा शिष्य बड़ा ही लालची है , इसे पता था कि इस शुभ महूरत को जो फांसी चढ़ेगा वो सवर्ग को जाएगा , जबकि स्वर्ग जाने का हक़ पहले मेरा है क्योंकि मैं इसका गुरु हूँ और इस से ज्यादा मैं विद्वान् हूँ !
             शिष्य भी समझ गया कि गुरु जी उसे बचने आये हैं क्योंकि गुरु जी ने चंद इशारे भी कर दिए थे , वो बोला गुरु जी आप को आने में देर हो गयी , और ये सिपाही भी पहले मुझसे मिले इसलिए मैं पहले स्वर्ग जाऊँगा !
                  राजा ने सोचा इस से बढ़िया मौका कब हाथ आएगा , वो बोला एक राजा के होते हुए भला दूसरा कोई पहले स्वर्ग कैसे जा सकता है , इसलिए केवल और केवल मुझे ही इस पुण्य बेला पर फांसी चढ़ाया जाएगा !!
            और इसतरह से एक राजा फांसी चढ़ गया और एक शिष्य बच गया ठीक उसी तरह से जैसे भारत में सरदार मनमोहन सिंह जी बच गये , उनपर आजकल कोई टीका-टिप्प्णी नहीं हो रही और राहुल गांधी एवं सोनिया गांधी जी पर सभी हमला बोल रहे हैं !! जबकि उन्होंने सवयम कोई घोटाला नहीं किया , उनके मंत्रियों ने चोरी करके उनके श्री चरणो में सारा माल रख दिया !
                   
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Comments

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (18-02-2014) को "अक्ल का बंद हुआ दरवाज़ा" (चर्चा मंच-1527) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. रोचक कथा जो वर्तमान परिस्थितियों एवँ परिवेश में भी सामयिक एवँ प्रासंगिक सी लगती है ! बहुत बढ़िया !

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