" साभार श्री श्रीश सप्रे " " भविष्य-चिंतक वीर सावरकर के सपनों का भारत "

                        हिंदूराष्ट्र के उद्‌गाता वीर सावरकर न केवल एक महान हिंदूसंगठक थे, जिन्होंने अंडमान के कारागार में ही शुद्धि यज्ञ का सूत्रपात किया था अपितु, एक महान साहित्यकार भी थे, जिन्होंने कालकोठरी में ही रहते 'कमला" जैसे महाकाव्य का सृजन किया था, मुंबई मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से 1938 में 'लेखनियां तोडो और बंदूक हाथ में लो" का क्रांतिकारी वक्तव्य देकर खलबली मचा दी थी। वे क्रांतिमंत्र के उद्‌गाता, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रांतिकारी रहे; जिनका कहना था प्रत्येक क्रांति एक प्रयोग होता है, विज्ञाननिष्ठ, तर्कसिद्ध सर्वकालिक हिंदुत्व के प्रवक्ता, द्रष्टा-भविष्यचिंतक भी थे। अंडमान के तट को दूर से देखते ही, जहां उन्हें दो कालापानी का दंड भुगतने के लिए लाया जा रहा था, उनके मन में विचार उठे थे अरे! यह तो हिंदुस्थान के समुद्र का पूर्व की ओर का द्वार ही है, जहां भविष्य में भारतीय नौ-सेना का एक बलिष्ठ सैनिकी अड्डा स्थापित होगा, जो पूर्व की ओर से होनेवाले किसी भी आक्रमण का प्रथम प्रत्याघात कर देश की रक्षा करेगा। उनका यह स्वप्न सुन कारागार के अधीक्षक ने उपहास करने के लिए उनसे कहा - 'यह देखो सावरकर, इस अंडमान के तुम्हारे भावी जलदुर्ग के योद्धा इधर-उधर पहरा दे रहे हैं। देखो!" सावरकरजी ने इस पर हंसकर कहा, 'यह तुम्हें और मुझे कदाचित्‌ दिख न सकेंगे परंतु, अपने बच्चे बहुधा यहां आएंगे।" वीर सावरकर का यह स्वप्न सिद्ध हुआ। वे द्रष्टा ठहरे। 10 मई 1973 को लोकसभा में रक्षामंत्री ने पोर्टब्लेअर पर नौ-सेना का अग्रगामी अड्डा स्थापित करने के सरकार के निर्णय की घोषणा की। 

वीर सावरकर के हिंदुत्व-हिंदूराष्ट्रवाद को संकुचित समझनेवाले समझते रहें परंतु, उनका हिंदुत्व ग्रंथ जो 1921 के अंत और 1922 के प्रारंभ में गुप्तरुप से लिखकर अंडमान के कारागार से बाहर भेजा गया था वह 1923 में 'मराठा" इस सार्थ नाम से प्रकाशित हुआ था। और 1925 के प्रारंभ में हिंदूमहासभा के बेलगांव अधिवेशन में डॉ. मुंजे, लाला लाजपतराय, लाला हंसराज, बॅ. जयकर, तात्यासाहेब केलकर, बाबू राजेन्द्रप्रसाद जैसे बडे-बडे नेता उपस्थित थे में सावरकरजी द्वारा इस ग्रंथ में 'हिंदुत्व" की दी गई व्याख्या बतलाई गई थी। इस 'हिंदुत्व" ग्रंथ को जो कोई भी पढ़ेगा वह निःशंक होकर स्वीकारेगा कि सावरकरजी का हिंदुत्वाभिमान अंधधर्मांधता न होकर सांस्कृतिक स्वाभिमान था। हिंद्वेत्तर धर्मांधों को मुंहतोड उत्तर देनेवाला स्वाभिमानभरा संकल्प था। परंतु, जो बिना पढ़े ही उन्हेें और हिंदुत्ववादियों को धर्मांध और सांप्रदायिक ठहराना चाहते हैं। उन्हें अब क्या कहें?

'हिंदूराष्ट्र" की कल्पना को संकुचित कहनेवालों को उनके द्वारा दिया गया उत्तर था - हिंदूराष्ट्र की कल्पना संकुचित नहीं। क्योंकि, यदि इस प्रकार से कहा गया तो हिंदीराष्ट्र की कल्पना भी मानवता की विशाल कल्पना के सामने संकुचित ही ठहरेगी। 
  
वीरसावरकर भी हिंदूराष्ट्र का सपना देखा करते थे का उल्लेख कर हिंदुत्ववादियों का उपहास कर हिंदुत्व एवं हिंदुत्ववादियों के प्रति अनर्गल प्रलाप करनेवाले जिन्हें परंपरागत रुप से ही 'हिंदुत्वद्वेष" प्राप्त हुआ है वस्तुतः जानते ही नहीं कि वीर सावरकर अपने सपने के भारत के बारे में क्या विचार रखते थे। वीर सावरकर के शब्दों में ही - ''मेरे सपनों का भारत एक लोकतंत्रीय राज्य है, जिसमें सभी रुप धर्मों और मत-मतांतरों के अनुगामियों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार किया जाएगा। किसीको दूसरे पर आधिपत्य जमाने का अवसर न रहेगा। जब तक कोई व्यक्ति हिंदुओं की इस पुण्यभूमि तथा मातृभूमि हिंदुस्थान को एक राज्य मानकर इसके प्रति अपने दायित्वों का निष्ठा सहित पालन करेगा, जो आसिंधु-सिंधु पर्यंत विस्तीर्ण है, एक ओर अविभाज्य है तब तक उसे नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे। हिंदू एक जातिविहीन और संगठित आधुनिक राष्ट्र का रुप ग्रहण करेंगे। विज्ञान और टैक्नोलोजी को बढ़ावा मिलेगा, जिसमें सभी भूमि राज्य की होगी और कोई भी जमींदार न होगा। सभी महत्वपूर्ण उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होगा तथा भारत खाद्यान्न, वस्त्र और प्रतिरक्षा की दृष्टि से पूर्णतः आत्मनिर्भर होगा। मेरे स्वप्नों के भारत का वसुधैव कुटुम्बकम के महान आदर्श में विश्वास होगा। सैनिक दृष्टि से सबल अखंड हिंदुस्थान की विदेश नीति होगी तटस्थता और शान्ति की। शक्तिशाली और अखंड हिंदुस्थान ही विश्व में स्थाई शान्ति और समृद्धि की दिशा में प्रभावी योगदान दे सकता है।""

हिंदुत्व पर होनेवाले आक्रमणों एवं कुप्रचार से तथा गिरती नैतिकता देखकर निराश होनेवाले हिंदुत्ववादियों के लिए सावरकरजी के ये वचन निश्चय ही गौर करने लायक होकर उनके लिए सम्बल प्रदान करनेवाले हैं - ''स्वतंत्रता के 18 वर्ष (वर्तमान में 66) उपरान्त भी हम लोगों को निराश, हताश, विक्षुब्ध और नैतिकता से गिरता हुआ देख रहे हैं। आज जनसाधारण जो पेट की रोटी और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बडी योजनाओं ने उनको तनिक भी प्रभावित नहीं किया है। किन्तु इतने पर भी एक क्षण के लिए भी यह सोचना कि यह देश खंड-खंडित हो जाएगा, पागलपन ही होगा। एक ऐसा देश जिसने चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, शालिवाहन, चाणक्य और शिवाजी जैसे महान राजनीतिज्ञों को गोदी में खिलाया है, वह कभी भी राजनैतिक दृष्टि से दिवालिया नहीं हो सकता। सहस्त्रों वर्षों के इतिहास में हिन्दुस्थान पर जब-जब संकट के घन घहराए हैं तब ही किसी-न-किसी महापुरुष ने इसका नेतृत्व कर राष्ट्र को सम्बल दिया है। जैसा अतीत में हुआ है भविष्य में भी ऐसे लोग होते रहेंगे जो देश का दिशा निर्देशन करेंगे, इसकी सेवा के लिए ही जिएंगे और मरेंगे।""

जिस प्रकार से उनके 'हिंदुत्व" के प्रति अनेक भ्रांतियां व्याप्त हैं उसी प्रकार से उनकी धर्म संबंधी भूमिका, मान्यताओं के बारे में भी अनेकानेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। धर्म संबंधी उनके विचार थे - ''क्या धर्म अर्थात्‌ पारिमार्थिक चर्चा द्वैत, अद्वैत का वाद-विवाद या चेतन-अचेतन की खोज है? या केवल भावना है जो व्यक्ति शून्य हो? नहीं विशेष रुप से हमारा धर्म महान होने से हम धर्म को ही राष्ट्र कहते हैं। हमारा इतिहास ही धर्म है। इतना ही नहीं परंतु हमारा दैनिक व्यवहार जो इतिहास समाज और राष्ट्र को पुष्ट करता है वही हमारा धर्म है। धर्म की यह परिभाषा निधर्मी स्टालिन से कम्युनिस्टों को भी माननी पडी थी। धर्म की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी व्यक्ति धर्मातीत रह ही नहीं सकता। अमरीका का राष्ट्रपति बाइबल हाथ में लिए बिना राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण नहीं कर सकता; इंग्लैंड का सम्राट यदि प्रोटेस्टन्ट न हो तो उसे राज्य पद से त्यागपत्र देना पडता है। यदि छोटे से छोटे पाश्चात्य देश में भी हम गए तो हमें यही दिखाई देगा कि यह राष्ट्र किसी-न-किसी धर्म का अनुयायी होगा। हम हिन्दू हैं और हमने दुनिया देखी है? देश इतिहास और व्यवहार के विशुद्ध न्यायपूर्ण बरताव को ही हम धर्म कहते हैं। इसलिए धर्म में महान शक्ति होती है। हम, हमारा देश, इतिहास और व्यवहार हिंदुस्थान के वैभव को बढ़ानेवाला है। इस प्रकार व्यक्तिगत और सामाजिक भावनाओं में व्याप्त प्रेरणा को ही हम धर्म कहते हैं। धर्म की इस परिभाषा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदुस्थान का धर्म हिंदू है।""

इस हिंदूधर्म को और अधिक विस्तृत रुप से समझने के पूर्व उनके द्वारा दी गई हिंदू की परिभाषा जो उनकी प्रतिभा दर्शाती है को समझना अनिवार्य है। उनकी व्याख्या के अनुसार 'आसिंधु-सिंधु-पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः।।" सिंधुस्थान ही जिनकी केवल पितृभूमि ही नहीं तो पुण्यभूमि भी है वह हिंदू। सावरकरजी की 'हिंदू" शब्द की यह व्याख्या अतिव्याप्ति और अव्याप्ति इन दोनो ही प्रकार के दोषों से मुक्त है। इस व्याख्या के अनुसार वैदिक धर्मानुयायी, सिक्ख और भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राह्मोसमाजी, गिरीजन, वनवासी आदि का समावेश 'हिंदू" में होता है। चीनी बौद्धों का समावेश हिंदुओं में नहीं होता। क्योंकि, हिंदुस्थान उनकी पुण्यभूमि होने पर भी पितृभूमि नहीं है।
                     

 'हिंदूधर्म" यह नाम किसी एक विशिष्ट धर्म अथवा पंथ विशेष का न होकर जिन अनेक धर्मों और पंथों की यह भारतभूमि ही पितृभू और पुण्यभू है उन सारों का समावेश करनेवाले धर्मसंघों का हिंदूधर्म सामुदायिक अभिधान है। बहुसंख्य हिंदुओं के धर्म को सनातन धर्म अथवा श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त धर्म अथवा वैदिक धर्म इस प्राचीन एवं मान्य संज्ञाओं से संबोधित किया जाता है। अन्य हिंदुओं के धर्मों को उनके उनके मान्य नामों से जैसे सिक्ख धर्म अथवा आर्यधर्म अथवा जैन धर्म अथवा बौद्ध धर्म संबोधित किया जा सकता है। जब इन सारे धर्मों को एकत्रित नाम देने की आवश्यकता होगी तब हिंदूधर्म यह व्यापक नाम देना उचित होगा। इसके कारण अर्थहानि तो होगी ही नहीं, परंतु वह अचूक और निःसंदिग्ध जरुर होगी और अपने छोटे समाज के संदेह और बडे समाज का क्रोध दूर कर अपने समान वंश और समान संस्कृति दर्शानेवाले अपने प्राचीन ध्वज तले पुनः एक बार सभी हिंदुओं के एकत्रित करेगा। इसी प्रकार से हमारे यहां एक ही धर्म पुस्तक न होने का लाभ बतलाते हुए सावरकरजी इस संबंध में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा इससे अपना धर्मविकास थमा नहीं। हमारे धर्मतत्त्व भी किसी पुस्तक के दो पुट्ठों में समा नहीं सकते। इस विश्व के दो पुट्ठों में जितना सत्य और ज्ञान विस्तृत फैला हुआ है उतनी हमारी धर्म पुस्तक विस्तृत होगी। अंत में उनका कहना था कुछ भी हो तो भी बुद्धिवाद की दृष्टि से देखा जाए तो कुल मिलाकर सभी धर्मों में ग्राह्यतम धर्म यदि कोई हो सकता है तो वह है हिंदूधर्म।

सावरकर हिंदुत्ववादी थे किंतु उसकी अपेक्षा अधिक 'सेक्यूलर" भी थे। परंतु उनके सेक्लूरिजम को भी उनके विरोधियों ने विकृत कर जनता के सामने प्रस्तुत किया और उनके अनुयायियों ने भी उसे कभी जनता के सामने ठीक ढ़ंग से प्रस्तुत नहीं किया। 'सेक्यूलिरिजम" यानी शासन की धर्म संबंधी भूमिका। इस संबंध में वीर सावरकरजी की भूमिका इस प्रकार की थी, धर्म से संबंधित विषय पारलौकिक और आध्यात्मिक स्वरुप का माना जाना चाहिए। लौकिक विषयों में धर्म का अधिकार मान्य नहीं होना चाहिए। उनका कहना था - धर्म शब्दनिष्ठा और श्रद्धा का प्रांत है और परलोक उसका विषय; इहलोक यानी कानून, व्यवहार होकर प्रत्यक्षनिष्ठ प्रयोग का क्षेत्र! वहां धर्म नहीं चलेगा। धर्म अलग। कानून अलग। धर्मग्रंथ को बंद कर अगर बुद्धिवाद से विचार किया जाए तो ही ऐहिक जीवन के प्रश्न हल हो सकते हैं। अतः मानव जीवन का ऐहिक और पारलौकिक इस प्रकार का विभाजन कर धर्म को केवल पारलौकिक विषयों तक ही मर्यादित रखना और ऐहिक जीवन के सारे विषय बुद्धिवाद के या उपयुक्ततावाद के हवाले करना इस प्रकार की उनकी सेक्यूरिजम संबंधी भूमिका थी। इहलौकिक जीवन से धर्म को दूर कर उसे केवल पारलौकिक जीवन तक का मर्यादित माने बगैर ऐहिक मानवी जीवन के निर्णय बुद्धि के आधार पर लिए नहीं जा सकेंगे, ऐसा उनका कहना था। 'अरबी संस्कृति का उच्चाटन" इस निबंध में उन्होंने इस संबंध में बिल्कूल सुस्पष्ट विचार प्रस्तुत किए हैं। तुर्कस्थान के कमालपाशा ने इस्लाम को पारलौकिक जीवन तक मर्यादित कर डाला था। ऐहिक जीवन में इस्लाम के हस्तक्षेप का अधिकार गैरकानूनी कर डाला था। राजनीति, सामाजिक नीति, अर्थनीति, शिक्षा, रक्षा, भाषा, कानून आदि सारे ऐहिक विषय उन्होंने शासन के, विधिमंडल के बुद्धिवादी क्षेत्रतले ले लिए थे। ऐहिक क्षेत्र से धर्म का साफ उच्चाटन कर डाला था। 

सावरकरजी को भारत में यही भूमिका लेनी थी। भारत का संविधान और कामकाज पूरी तरह से बुद्धिवाद पर आधारित रहेगा; वह वेद, गीता, कुरान, बाइबल इस प्रकार के किसी भी धर्मग्रंथ पर आधारित नहीं रहेगा इस प्रकार की उन्होंने घोषणा ही की हुई थी।  धर्मग्रंथ आज कालबाह्य हो गए हैं; आज हम किस प्रकार से रहें; व्यवहार करें यह कहने का अधिकार धर्मग्रंथों को नहीं; धर्मग्रंथों पर आधारित सामाजिक संस्थाओं को खडा करने के दिन गए; आज हमें जो सामाजिक संस्थाएं खडी करनी हैं वे धर्मग्रंथ पर न होकर विज्ञानग्रंथों पर, बुद्धिवाद पर खडी करनी हैं इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। सावरकरजी के सेक्यूलरिजम की यह भूमिका हिंदू-मुस्लिम समस्या सहित अनेक राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं पर रामबाण उपाय जैसी थी। उन्हें मालूम था कि, संसार की धर्मों संबंधी अधिकांश समस्याएं, धर्म जो मनुष्य के इहलौकिक जीवन मेें प्रभावी होता है से पैदा होती हैं। उदाहरणार्थ सामाजिक विषमता की समस्या को लें तो धर्म ने जीवन के विषय में कही हुई आज्ञाओं में से ही वह पैदा हुई हैं। इहलौकिक जीवन पर के धर्म के अधिकार को ही निकाल लिया जाए तो धर्मप्रणीत सामाजिक विषमता का आधार ही उखड जाता है। मुस्लिमों का स्वतंत्र राष्ट्र यानी इहलौकिक रहनेवाले राजनैतिक क्षेत्र में धर्म का उपयोग। धर्म का विषय परलोक तक का मर्यादित कर दिया जाए तो सारा इहलौकिक मानवी जीवन धर्म के नियंत्रण से मुक्त हो जाता है और धर्मसंबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं, इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। इस भूमिका के कारण हिंदुओं पर होनेवाला अन्याय भी समाप्त होनेवाला था, मुस्लिमों का प्रश्न भी हल होनेवाला था; धर्म का राजनैतिक आधार भी समाप्त होनेवाला था; सामाजिक सुधार और आधुनिकता का मार्ग भी खुला होनेवाला था। जिसे परलोक में या अध्यात्म में श्रद्धा होगी वह उस विषय तक का मर्यादित अपने धर्म का पालन कर सकेगा। पारलौकिक और आध्यात्मिक अर्थ का धर्म केवल मानसिक और आत्मिक संतुष्टि तक का सीमित होने के कारण उसका किसी भी तरह का दुष्परिणाम समाज पर और राष्ट्र पर नहीं होगा। सेक्यूलरिजम की इस प्रकार की भूमिका रखनेवाले होने के बावजूद सावरकरजी के  धर्म संबंधी विचारों के बारे में भ्रांतियां फैलाना, उन पर मिथ्या दोषारोपण करना इस अज्ञान को या जानबूझकर किए जानेवाले भ्रामक प्रचार को क्या कहा जाए?

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