Wednesday, September 17, 2014

" भाजपा की गैस-प्रॉब्लम बहुत पुरानी है , हर जीत के बाद हो ही जाती है " !!कोई दवा काम नहीं कर रही - पीताम्बर दत्त शर्मा ( लेखक-समीक्षक-विश्लेषक )

मित्रो !! चाहे समय जनसंघ का हो या भाजपा का हमारे ये भारतीय संस्कृति वाले नेता " राजनितिक-गैस प्रॉब्लम " के शिकार हैं ! जब ये जीत नहीं होते हैं तब तो ये कार्यकर्त्ता को पार्टी की रीढ़ और ना जाने क्या-क्या भाषण देते हैं , नियम बताते हैं और आदेश देते हैं , वो आप भी भलीभांति जानते होंगे क्योंकि आपने भी कभी ना कभी अवश्य सुने होंगे !! सारा देश ये मानने लगा की जो ये कह रहे हैं , शायद वो ही " सत्य " है , इसीलिए जनता ने अबकी बार भाजपा को एक मुश्त जीत दिलवादी ! 
               लेकिन बेचारा अकेला मोदी  जी क्या करें ???? किस-किस पर नज़र रख्खें ?? किस-किस को रोकें ?? ससुरे भाषण देकर सारे घोड़े बेचकर सो गए !! भाड़ में जाएँ कार्यकर्त्ता और भाड़ में जाये जनता !!जनता ने भी तुरन्त " नतीजा " दिखा दिया ! अब बोल रहे हैं " गहरा-मंथन " करेंगे ?? हो गया मंथन !! जनता को रोज़ सारे मंत्रियों की ऐसी कार्यवाही का समाचार पढ़ने देखने को मिले जिसमे किसी भ्रष्ट पर कार्यवाही हुई हो !! क्या देश में रहने वाले चोर-गद्दार को पकड़ने हेतु कोई पहाड़ तोड़ कर लाना पड़ता है ??बाबुओं को जल्दी काम करने और करवाने  हेतु फ़ालतू की "ऑफिस - कानूनों से छुटकारा दिलाने हेतु क्या अमेरिका की इजाजत चाहिए ???
         दूसरी तरफ भाजपा के संगठन को ही ले लो !! इतने वर्षों तक संघ और भाजपा अपने निर्धारित पदों हेतु कोई योग्यता निर्धारित नहीं कर पायी है ! बस ! एक ही फार्मूला है की जो किसी का चाहता है  पदाधिकारी है !! दिखावटी लोकतंत्र है पार्टी में !!क्या ये सब सही करना कोई बड़ा काम है ! लेकिन कोई कर नहीं रहा क्यों ?? क्योंकि सबको अपनी दुकानदारी चलानी है , देश सेवा तो मात्र एक बहाना है !!भाजपा में भी !! कोई पार्टी विद डिफ़रेंस नहीं है ये भाजपा !!
          अन्य राजनितिक दलों हेतु भी ज्यादा नाचने का अवसर नहीं आ गया है , क्योंकि जनता उनको तो " धिक्कारने " लायक भी नहीं समझती है ! 8 - 10 सीटें जीत जाना कोई बहादुरी का काम नहीं है ? आगामी विधानसभा चुनावों में ये भी पता चल जायेगा !! परन्तु भाजपा को अवश्य अपने आपको सुधारना होगा या फिर मोदी जी को देश हित में " तानाशाह " बनना होगा !! मेरे प्रिया मित्र श्रीमान पुण्य प्रसुन वाजपेयी जी ने भी अपने ताज़ा लेख में भाजपा की पूरी बखियां उधेड़ीं हैं !! आप भी पढ़िए ! साभार लिया है !!



                

TUESDAY, SEPTEMBER 16, 2014

सपने का टूटना या लोकतंत्र की जीत की उम्मीद

प्रधानमंत्री मोदी का जादू चल जायेगा। लेकिन नहीं चला। संघ परिवार की सक्रियता के बगैर जीत जायेंगे। लेकिन नहीं जीते। लव जेहाद और सांप्रदायिक बोल हिन्दु वोट को एकजुट रखेंगे। लेकिन नहीं रख पाये।
अल्पसंख्यक असुरक्षित होकर बीजेपी की छांव में ही आयेगा या फिर उसकी एकजुटता हिन्दुओं में जातीय समीकरण को भुला देगी। लेकिन यह भी नहीं हुआ। मायावती की गैरहाजरी में दलित वोट विकास की चकाचौंध में खोयेगा। लेकिन वह भी नहीं खोया। वसुंधरा की बिसात और मोदी की चमक राजस्थान में बीजेपी से इतर किसी को कुछ सोचने नहीं देगी। लेकिन यह भी नहीं हुआ। छह करोड़ गुजराती मोदी के पीएम बनने की खुमारी में डूबा रहेगा और आनंदीबेन मोदी को जीत का बर्थ-डे गिफ्ट दे देगी। लेकिन बर्थ-डे गिफ्ट भी धरा का धरा रह गया। तो फिर उपचुनाव के परिणाम के संकेत ने क्या लोकसभा चुनाव के फैसले को ही पलटने की तैयारी कर ली है। या फिर राजनीतिक शून्यता के ऐसे पायदान पर देश की संसदीय राजनीति जा खड़ी हुई है जहां बार बार आगे बढ़कर पीछे लौटने के अलावे कोई विकल्प देश की जनता के सामने है नहीं। मंडल की धार से 25 बरस पहले कमंडल टकरायी।

लेकिन 25 बरस बाद मोदी के विकास मंत्र ने मंडल की धार को भोथरा बना दिया और कमंडल को हिन्दु राष्ट्रवाद के आइने में उतार कर एक नयी लकीर खिंचने की नायाब पहल की। लगा यही कि मंडल के दौर में क्षत्रपों की सियासत ने देश का बंटाधार ही किया तो फिर मोदी के विकास के घोड़े की सवारी कुछ सकून तो देगी। लेकिन हकीकत से कहां कैसे वोटर भागे। उसे तो हर दिन रसोई में आंसू बहाने है। विकास का ताना बाना चाहे विदेशी पूंजी की आस जगाता हो। चाहे इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर क्रक्रीट का जंगल खडा करने की बैचैनी दिखाता हो। चाहे डिजिटल इंडिया के सपने तले हर हाथ में तकनालाजी की उम्मीद जागती हो। चाहे कॉरपोरेट के धुरंधरों और औघोगिक घरानो के एफडीआई के समझौते के नये रास्ते खुलते नजर आते हो। चाहे मोदी सरकार की इस चकाचौंध को बेहद बारिकी से मीडिया लगातार परोसता हो। और इस भागमभाग में चाहे हर कोई हर उस मुद्दे से ही दूर होता चला गया हो जो लोकसभा चुनाव के वक्त देश के आम जन की आंखों में जगाये गये हों। चाहे वह रोजगार पा जाने का सपना हो। चाहे वह पाकिस्तान और चीन से दो दो हाथ करने का सुकुन हो। चाहे बिचौलियों और कालाबाजारियों पर नकेल कसने की उम्मीद हो। चाहे कांग्रेस के गैर सरोकार वाले रईस कांग्रेसियों या कहें लूटने वालो को कटघरे में खड़ा करने की हनक हो। सबकुछ नरेन्द्र मोदी ने जगाया। और इन्हीं सबकुछ पर कुंडली मार कर देश को भुलाने और सुलाने का तरीका भी मोदी सरकार ने ही निकाला। तो क्या विकल्प की बात ख्वाब थी या विकल्प या विकास का ताना बाना सत्ता पाने का सियासी स्वाद बन चुका है । इसलिये सौ दिन की सरकार की हार ने मंडल प्रयोग से आगे मंडल का ट्रैक टू शुरु करने का संकेत दे दिये। जहां मायावती की खामोशी मुलायम को जीता कर आने वाले वक्त में गेस्टहाउस कांड को भुलाने की दिशा में जाना चाहती हैं। ठीक उसी तरह जैसे सुशासन बाबू जंगल राज के नायक के साथ खड़े हो गये। पहले तमगा दिया फिर दिल दे दिया ।

गजब की सियासत का दौर है यह । क्योंकि इस बिसात पर संभल कर चलने के लिये चुनावी जीत की तिकडमें ही हर दल के लिये महत्वपूर्ण हो चली हैं। और तिकडमों से निकलने वाली चुनावी जीत संविधान से बड़ी लगने लगी है। यूपी के सांप्रदायिक दंगे। मुजफ्फरनगर की त्रासदी के बीच सैफई का नाचगान। अब कोई मायने नहीं रखता। गहलोत के दौर के घोटाले सचिन पायलट की अगुवाई में काग्रेस की जीत तले छुप जाते हैं। मोदी के दरबार में वसुंधरा राजे के प्यादा से भी कम हैसियत पाना। यूपी की बिसात पर राजनाथ को प्यादा और योगी आदित्यनाथ का वजीर बनाने की चाहत वाले अमित शाह की चाल भी जीत के दायरे में मापी जाती है। और अमित शाह को हर राज्य में जीत का सेहरा पहनाने की हैसियत वाला मान कर आरएसएस झटके में प्यादे से वजीर बनाकर सुकुन पाती है। तो फिर चुनावी दौड़ का यह रास्ता थमता किधर है। शायद कहीं नहीं। क्योंकि यह दौड़ ही सत्ता की मलाई खाने के लिये जातीय और धर्म के आधार पर उचकाती है। या फिर विकास का अनूठा मंत्र देकर ऐसे भ्रष्टाचार की ऐसी लकीर खिंचती है,जिसके तले मजदूर के हक के कानून बदल जाये। पर्यावरण से खुला खिलवाड विकास के नाम पर दौड़ने लगे। जन-धन योजना तले देश की लाइफ इंशोरेंस कंपनी एलआईसी का नहीं बल्कि विदेशी बैंक एचडीएफसी के लाइफ इंशोरेंस का कल्याण हो। विदेशी पूंजी की आहट राष्ट्रीयता को इतना मजबूर कर दें कि जुंबा पर हिन्दु राष्ट्रवाद गूंजे जरुर लेकिन देश बाजार और व्यापार में बदलता दिखे। जिसमें चुनी हुई सरकार ही बिचौलिये या कमीशनखोर हो जाये। ध्यान दीजिये तो मनमोहन का दौर हो या मोदी का दौर पटरी वही है इसलिये बार बार देश उन्हीं क्षत्रपों की गोद में लौटता है, जहां मलाई खाने के लिये सत्ता के दरवाजे तो खुले मिलते है चाहें लूट खुली क्यों ना हो। इसलिये उपचुनाव के परिणाम निराशा और सपनों की टूटने के अनकही कहानी भी है और लोकतंत्र की जीत की उम्मीद भी।
            " इन्टरनेट सोशियल मीडिया ब्लॉग प्रेस "" फिफ्थ पिल्लर - कारप्शन किल्लर "
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Posted by PD SHARMA, 09414657511 (EX. . VICE PRESIDENT OF B. J. P. CHUNAV VISHLESHAN and SANKHYKI PRKOSHTH (RAJASTHAN )SOCIAL WORKER,Distt. Organiser of PUNJABI WELFARE SOCIETY,Suratgarh

1 comment:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18-09-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1740 में दिया गया है ।
    आभार ।

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