क्या हिन्दू धर्म में जाती प्रथा सही है ?| जानिये क्यों ????

पहले हम जानते हैं इसके बारे में अंग्रेजों द्वारा फैलाई गयी आम धारणा क्या है वह यह है के हिन्दू समाज से मनुस्मृति में लिखा है ४ तरह की जाती होती हैं ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र इनमे ब्रह्मा जी के सिर से ब्राह्मण , छाती ,बाजुओं से क्षत्रिय , पेट से वैश्य तथा पैरों से शुद्र पैदा हुए हैं और हिन्दू धर्म में शूद्रों पर सदियों से बहुत अत्याचार हुए हैं और उन्हें पढने भी नहीं दिया गया और गुलाम बनाकर रखा गया इसलिए अब इन्हें आरक्षण दे दिया गया ताकि ये अत्याचार का बदला ले सकें | संक्षिप्त भाषा में यही अधिकतर भारतीय भी आज समझते हैं जो मेकाले की शिक्षा पद्दति से पढ़े हुए हैं पर सच क्या है आइये जानते हैं :-
सबसे पहली बात जाती और वर्ण दो अलग अलग चीजे हैं जातियां वर्णों में आती हैं जैसे की कुम्हार , सुतार , बढ़इ, लोहार , नाइ, धोबी , पंडित आदि कई जातियां हैं तथा वर्ण चार हैं ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र अब जिन मूर्खों ने इन्हें जाति या कास्ट कहा , वो यहीं गलत साबित हो गए | अगली बात ये चार वर्ण हर देश हर समाज में होते हैं और इन्ही से समाज चलता है ये सिर्फ हिन्दुओं में नहीं हैं सब जगह हैं, प्रश्न उठता है कैसे तो एक एक करकर यह समझते हैं - पहली बात तो यह है की वर्ण जन्म के आधार पर नहीं कर्म और अपने कार्यक्षेत्र के हिसाब से बनाये गए हैं |
मैंने इन्हें बारीकी से समझने के लिए कई लोगों से इसे जाना तथा इसे आज की आसान से आसान भाषा में यहाँ समझाया है ताकि हर कोई इसे समझ सके क्योंकि सबसे अधिक झगडे इन्ही बातों को लेकर हैं तो आइये जानते हैं इन्ही के क्रमानुसार सबसे पहले ब्राह्मण | 

ब्राह्मणों में वो लोग आते हैं या आते थे या आते हैं जो दिमाग से अधिक श्रम करते हैं अर्थात वैज्ञानिक वर्ग , शिक्षक वर्ग , लेखक , मनोवैज्ञानिक , सुलह कराने वाले , पंडित तथा वेदों – उपनिषदों या विज्ञान की आयुर्वेद की खोज करके इनकी किताबे आदि ग्रंथो को लिखने और समझने तथा औरों को आसान भाषा में समझाने वाले, यह वर्ग ब्राह्मण कहलाता है जो की हर समाज में तथा देश में होता आया है |

क्षत्रिय :- यह वर्ग प्रशासन को सँभालने वाला अर्थात प्रशासक वर्ग होता है जैसे राजा उसका मंत्रिमंडल , सैनिक , सेनापति , ख़ुफ़िया विभाग , योद्धा आदि | यदि आज की भाषा में बात करूँ तो राजनैतिज्ञ , सेना , पुलिस , कलेक्टर, आदि सरकारी अफसर और सेना के सभी लोग | इनका काम देश को या राज्य को सही तरह से चलाना तथा समय आने पर अपने प्राण देकर भी देश की और आम जनता की रक्षा करना होता है | इन्हें इसी के लिए तैयार किया जाता है , तथा यह अपना पूरा समय देश को या राज्य को कैंसे सुखी एवं समृद्ध बनाया जाए इसी कार्य में लगाते हैं | यह भी हर देश में होता है |

वैश्य :- अब बुद्धिजीवी हो गए तथा सैनिक हो गए प्रशासक हो गए पर देश में अन्दर कार्य कैसे चलेगा क्या सामान बनेगा , क्या बिकेगा इसलिए वैश्य होते हैं यानी व्यापारी जो व्यापार करते हैं अर्थात क्या वस्तुएं समाज के लिए आवश्यक हैं उन्हें बनाकर बेचने का कार्य इनके हाथों में होता था | मूलतः इनमे किसान , लोहार , कुम्हार , कपडे बनाने वाले , सुतार , सुनार आदि आते थे | आज की भाषा में उद्योगपति जिनका कार्य अनाज , कपडे , मशीन आदि बेचना तथा कारखाने खोलकर बनाना होता है | यह वैश्य कहलाते हैं | यह भी अत्यंत आवश्यक हैं समाज में इसलिए सभी देशों में पाए जाते हैं |

शुद्र :- अब प्रशासक , बुद्धिजीवी , व्यापारी यह तीनो कार्य सँभालने वाले जब किसी भी व्यवस्था को मिल जाते हैं तो अंत में जरुरत होती है इनकी मदद करने वालों की अर्थात इनके यहाँ नौकरी करने वालों की जैसे की कारखाने में कितने लोग काम करेंगे , किसान के यहाँ , राजा के यहाँ , सभी प्रकार के व्यापार में कार्य करने हेतु इन्हें तनख्वाह देकर रखा जाता है ताकि इनका भी घर चल सके | इनकी तनख्वाह इनके द्वारा किये गए कार्यों पर निर्भर करती है | यह कहलाते हैं शुद्र | जैसे आज सभी लोग बड़ी बड़ी सॉफ्टवेर कंपनियों के कार्य करते हैं या वाल्ल्मार्ट में या किसी भी कंपनी में वो कही भी काम करें कितना भी पैसा कमायें, पर कही भी जिनका खुदका कोई व्यापार नहीं है जो तनख्वाह पर काम करते हैं वह शुद्र होते हैं | इस हिसाब से आज अधिकतर लोग शुद्र हैं और पड़-लिख कर नौकरी करके शुद्र बनना चाहते हैं और विरोध करते हैं हिन्दू धर्म में शुद्र वर्ण का | अदभुत है ना ?
मनुस्मृति एवं ऋग वेद में क्या लिखा है फिर

अब ऐसा कही भी नहीं लिखा न वेदों में ना मनुस्मृति में के शूद्रों पर अत्याचार करो उन्हें मारो या दबाकर रखो वहां बस यह चार वर्ण दिए हैं जो हर समाज को चलाने के लिए आवश्यक हैं | अब आते हैं ब्रह्मा जी वाली कहानी पर तो उसमे लिखा है उनके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए अर्थात चेहरे से जहाँ दिमाग होता है मतलब समाज के वो लोग जो बुद्धिजीवी हैं कलाकार हैं , वैज्ञानिक हैं आदि ( यहाँ कोई सरनेम या उपनाम नहीं लिखा है शास्त्रों में ) वह लोग जो अपनी बुद्धिमता का प्रयोग समाज के हित में करते हैं इसलिए उन्हें मुख से उत्पन्न कहा गया | फिर क्षत्रिय इन्हें बाजुओं से छाती से उत्पन्न कहा गया क्योंकि यह यह सेना में लड़ते हैं हमारे शरीर में भी ताकत हाथों और छाती में होती है इसलिए क्षत्रियों को हाथों और छाती से उत्पन्न बताया गया | फिर वैश्यों को बताया गया के वह पेट से उत्पन्न है अर्थात जिस तरह पेट के लिए ही सब लोग कार्य करते हैं तथा उसी जगह माँ की कोख में बच्चा पैदा होता है उसी तरह समाज में व्यापारी ही धन की अनाज की उत्पत्ति करते हैं इन्ही के कारण बाकी के तीन वर्ण कार्य करते हैं तथा लड़ते हैं, जिस तरह शरीर में इसी पेट को पालने के लिए इंसान कमाई करता है इसीलिए वैश्यों की उत्पत्ति उदर या पेट से बताई गयी अंत में शुद्र को पैरों से उत्पन्न बताया गया अर्थात यह वह लोग हैं जिनके आधार पर पूरा समाज टिका रहता है यदि किसी के पैर कर जाए तो वह आगे नही बड सकता उसके हाथ भी भीख मांगने पर मजबूर हो जाते हैं पेट की खातिर | इसी तरह व्यापारी , बुद्धिजीवी तथा , राजा इन तीनो को ही अपने साथियों की आवश्यकता होती है बिना इनके सहयोग के यह कुछ भी नहीं हैं इसीलिए जिस तरह किसी भी घर के निर्माण में उसकी नीव आवश्यक होती है इसी तरह शरीर में पैर या फिर एक समाज में शुद्र आवश्यक होते हैं यही वेदों में या ऋग्वेद में पुरुश्सुख्त में लिखा है तथा यही मनुस्मृति में लिखा है | पर अंग्रेज इसे समझ नहीं पाए और किताबों में गलत लिख दिया उसी की पढाई करकर कुछ काले अंग्रेज भारतीय भी उसी ढांचे को मानते चले गए जो गलत था और आज भी इसी कारण हिन्दू धर्म को गालियां देते हैं पर असल में यह ढांचा पूर्ण रूप से कर्म आधारित है और कोई भी बड़ा या छोटा नहीं है बल्कि सभी के परस्पर सहयोग से समाज चलता है |

*फूट डालो राज करो नीति *

इसी को अंग्रजों ने फूट डालो राज करो की नीति के तहत बदल दिया एवं वह यह लिखवा दिया ब्राह्मण और क्षत्रिय ऊँचे कुल के हैं तथा यह शूद्रों पर अत्याचार करते हैं और इन सबको आपस में लडवा दिया | क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय अंग्रेजो की चाल समझ कर उनसे लड़ाई लड़ रहे थे इसलिए उन्हें उन्ही के लोगों द्वारा ख़त्म करने की साजिश रची गयी जिसमे विल्बरफ़ोर्स, टीबी मेकाले , मैक्स मूलर आदि लोगों ने बड़ी भूमिका निभाई इन्होने भारत के असली शास्त्रों में बदलाव कर दिए एवं कई लेख खुद की भाषा में लिखे और कई शोध कार्य गलत व्याख्याओं पर करवाए एवं उन्हें अपने भारत के बच्चों को पढाया जिससे भारत में दो वर्ग पैदा हो गए एक वो जो शूद्रों से नफरत करते थे दुसरे वो जो ब्राह्मणों से एवं क्षत्रियों से नफरत करते थे यह आज तक चला आ रहा है तथा कई लोगों का इस लड़ाई का फ़ायदा उठाकर अंग्रेजो ने धर्म परिवर्तन करा दिया तथा उनको उत्तर पूर्वी राज्यों में अब यह सिखाया जा रहा है की भारत से अलग एक देश की मांग करो यह सब तो दुसरे धर्म के हैं इसके लिए कई संस्थानों को विदेशों से पैसे आते है ताकि भारत को तोड़कर एक कमजोर देश बनाया जा सके | 
एक और मजेदार बात यह है के अंग्रेजो ने वैश्यों को भी शुद्र लिख दिया जैसे , बड़ई, सुतार , लोहार जबकि यह तो व्यापारी वर्ग था अब आप ही सोचिये आज आदिदास, रिबोक नाईकी आदि जूता कंपनी के मालिको को आप चमार बोलेंगे क्या और कहेंगे वो नीच जात है नहीं ना उसी तरह चमार वर्ग वह था जो जुते बनाता था तथा चमड़े से सम्बंधित सारे कार्य करता था जैसे जुते, चप्पल , हाथी घोड़े बैल के ऊपर बिछाने का कपडा महल की घर की वस्तुए खेत की वस्तुए आदि तथा उसका दर्जा उतना ही था जितना की आज आदिदास या रीबोक के मालिक का समाज हर जाती का सम्मान करता था अब भंगी का लीजिये मैंने कई भंगियों से बात की तो पता चला के वो सब क्षत्रिय हैं तथा जब मुग़ल आये और उन्होंने इनको हरा दिया कुछ हिन्दू राजाओं की ही गद्दारी के कारण तन मुगलों ने इनके सामने शर्त रखी या धर्म परिवर्तन करो या फिर हमारी गंदगी उठाओ तब इन सब राजाओं ने गंदगी उठाना मंजूर किया मगर धर्म परिवर्तन नहीं इसके बाद कई सालों तक मुगलों ने फिर अंग्रेजो ने इनसे तथा इनकी पीड़ियों से यही कार्य करवाया जिससे इनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास में बहुत कमी आई
और बाद में अंग्रेजो ने अपना पल्ला झड़ने यह इल्जाम फिर ब्राह्मण और क्षत्रियो और वैश्यों पर लगा दिया के इनके कारण इनकी बुरी हालत है यह तो शूद्रों पर अत्याचार करते हैं और भंगी , चमार शुद्र हैं जबकि चमार , सुतार , लोहार आदि बड़े व्यापारी हुआ करते थे तथा इनके द्वारा बनाया गया माल सारी दुनिया में भेजा जाता था तथा बदले में सोना आता था जिसके कारण भारत सोने की चिड़िया था इनके इसी व्यापार को अंग्रेजो ने नष्ट किया ईस्ट इंडिया कंपनी खोलकर इन्होने एक कंपनी के बाद कई कंपनियां भारत में खोली तथा भारत के सभी व्यापारियों के धंधे समाप्त करते गए या उन्हें मरवाते गए तथा आज़ादी आते आते यह हालत हो गयी के सभी व्यापारी सड़क पर आ गये तथा मुश्किल से गुजारा करने लगे | अब जब अंग्रेजों के जाने की बारी आई तो इन्हें डर लगा की कही ये हमसे इस ज्यादती का बदला ना लें , तो इन्होने फिर कई किताबों में उल्टा सीधा लिखकर इन सबको शुद्र बना दिया तथा जो उस समाज में अमीर या थोड़े संपन्न थे उन्हें ऊँची जाती का बना दिया और लिख दिया के ऊँची जाती के लोग नीची पर अत्याचार करते हुए आये हैं और जिन्हें नीची जाती का बनाया उनके बच्चों को भी इंग्लैंड में बुलाकर पढाया शोध करवाया इन चीजो पर के कैसे तुम्हे दबाया गया यह लिखो सब तैयार किये गए आंकड़ो से उनको भ्रमित किया तथा भारत भेजकर दोनों तरफ की सोच के लोगों को बड़ा नेता बनवा दिया पैसे भेजकर जिससे वो लड़ते रहें तथा आज भी लड़ रहे हैं | यही ब्राह्मणों और राजाओं के बच्चों को सिखाया यह शुद्र है यह तुम्हारा राज्य हड़पना चाहते हैं तुम्हे ख़त्म करना चाहते हैं इन्हें दबा कर रखो वरना तुम्हे ख़त्म कर देंगे तो जो अंग्रेजो की मेकाले की शिक्षा पड़कर आये वो सचमुच इन जातियों पर अत्याचार करने लगे तथा इन्ही कुछ लोगों के द्वारा किये गए अत्याचारों को बड़ा चढ़ा कर पेश किया जाता रहा है तथा आज भी इन्ही पर शोध होते हैं पेपर लिखे जाते हैं भले ही कितने ही विवेकानंदा , दयानंद , शंकराचार्य , गाँधी आदि ने जाती प्रथा की कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी हो पर यह बात अंग्रेज नहीं चाहते फैले वो चाहते हैं सिर्फ नफरत फैले जिससे भारत टूटे और कमजोर हो जिससे उन्हें वापस आने का मौका मिल सके | पर हिन्दू धर्म के बुद्धिजीवी जो सच्चाई जानते हैं के जातियां कर्म के आधार पर थी आगे लगे हुए उपनाम तो गाँव का या पिता का या कुल का नाम था | यह जानने वाले हिन्दू लोग आज भी जाती प्रथा को समर्थन करते हैं तथा अंग्रेजों की चाल को नाकामयाब करना चाहते हैं | वह चाहते हैं के बड़ई, कुम्हार , लोहार , सुतार ,सुनार , जुलाहा , पंडित , सैनिक आदि सभी जातियां भारत के हर गाँव में फिर खडी हो जाए तथा सामान तीव्र गति से बनाने लगे तो , एक साल में भारत इतना सामान बना देगा की सारे भारत के ही नहीं सारे विश्व के व्यापार पर हमारा कब्ज़ा हो जाएगा तथा सभी आत्म निर्भर हो जायेंगे हम नौकरी नहीं करेंगे हम अंग्रेजो से नौकरी करवाएंगे इसके लिए हमें हर जाती को तथा उसके द्वारा किये जाने वाले व्यापार , कार्य या उद्योग को संरक्षण देना होगा तथा आज की तकनीकों के हिसाब से विकसित करना होगा यह हो सकता है पर यदि जाती प्रथा समाप्त हो गयी तो भारत का बहुत सारा प्राचीन ज्ञान लुप्त हो जाएगा तथा कई लोग विदेशी धर्म अपना लेंगे फिर देश से अलग होने की बात करेंगे या फिर वो जो धर्म अपनाएंगे वह धर्म जिस देश से आया होगा उसी देश की संस्कृति तथा उद्योगों की वकालत करेंगे जिससे देश टूट जाएगा देश बचाना है तो जाती बचानी होगी इसलिए हिन्दू समाज जातियों का समर्थन करता है | हमारा मानना है की वर्ण और जातियां रहनी चाहिए बस अन्याय और शोषण नहीं होना चाहिए सभी जातियों और वर्णों में हर व्यक्ति को हर काम करने तथा चुनने की आजादी होनी चाहिए एवं दूसरी जाती में विवाह की आज़ादी भी होनी चाहिए जिसे वेदों में गंदर्भ विवाह कहा गया है तथा कोई किसी को छोटा या बड़ा न माने सभी बराबर हो तथा साथ मिलकर देश और समाज के हित में कार्य करें | 



नोट :- हिन्दू समाज जाती प्रथा और वर्ण व्यवस्था का समर्थक है पर किसी पर भी हो रहे अन्याय का शोषण का समर्थन नहीं विरोध करता है तथा सभी इंसानों को एक सामान मानता है तथा जो लोग गलत करते हैं या किसी भी इंसान को दबाकर रखते हैं उनको सजा दिलाने के पक्ष में है तथा इस अंग्रजों द्वारा फैलाई गयी मानसिकता को बदलने के लिए तथा प्राचीन वैदिक व्यवस्था को वापस लाने के लिए प्रयासरत है |

हर हर महादेव  जय - हिन्द !! जय भारत ! वन्दे मातरम !
प्रिय मित्रो !सादर नमस्कार !कुशलता के आदान-प्रदान पश्चात जिन भी मित्रों का आज जन्म-दिन या विवाह दिवस है , उनको मेरी तरफ से हार्दिक बधाई और शुभ कामनाएं !आप अपने ब्लॉग "फिफ्थ पिल्लर करप्शन किल्लर"को बहुत पसंद कर रहे हैं,रोज़ाना इसमें प्रकाशित लेखों को पढ़ कर शेयर करते हैं ,उन पर अपने अनमोल कॉमेंट्स भी देते हैं !उस सब के लिए भी आपका हार्दिक आभार प्रस्तुत करता हूँ !इस ब्लॉग का लिंक ये है - www.pitamberduttsharma.blogspot.com 
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Comments

  1. वाह री कलम-सदियों के झूठ और इतिहास को तोड़ने मरोड़ने की आदत गयी नहीं।
    कानों से मधु कैटभ,नाभि से ब्रह्मा,सूर्य से कर्ण, और अवैधता का इनाम उसको सूतपुत्र बनाकर,एकलब्य का अंगूठा काटना,हरिश्चंद्र को डोम यानि अछूत बनना,बाल्मीकि सन्तान को हरिजन बना देना,मौर्य वंश को बौद्ध धर्म प्रसार का बदला अनुसूचित जाति बनाकर लेना जिनका काल स्वर्णिम काल कहलाया था और उसी वंश के सम्राट अशोक का चक्र चुराकर तिरंगे में लगा लेना,सिंह चिन्ह को चुराकर राजकीय मुद्रा बना लेना-लेकिन उनके नाम का कोई अनुष्ठान आयोजित न करना-इसे चोरी और कृतघ्नता कहते हैं तथा शिक्षक खुद,किताबों के रचयिता खुद,ज्यादा धनलोभ के लिए शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम में बदलने वाले खुद और दोषी-मैकाले-यानि अपने दुष्कृत्य को सदियों की भांति दूसरों के माथे मढ़ते रहना-यही तो होता आया है आजतक।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (09-09-2016) को "हिन्दी, हिन्द की आत्मा है" (चर्चा अंक-2460) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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