"मंहगाई कम करने में बाधक ये "व्यपारी"!! - पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. +9414657511

आलू, हो या प्याज ,दाल हो या घी-तेल और मिर्च हो या मसाले , इनमे से किसी का भी अगर दाम बढ़ जाता है तो बेचारे मध्यम दर्जे के आदमी का बुरा हाल हो जाता है ! क्योंकि वो पहले ही "गरीब-अमीर"के दो पाटन के बीच में पिस रहा जो होता है ! निष्चय ही सभी सरकारों को इस विषय पर सबसे पहले विचार करके तुरंत ही उपाय करने चाहिए महंगाई रोकने हेतु , लेकिन कोई भी सरकार सफल नहीं हो पाती है !मैंने अपने जीवन के अनुभव से जो समझा और जाना है , वो ये है कि जब भी किसी फसल के आने का समय होता है तब व्यापारी लोग बेचारे किसान को कम मूल्य देते हैं ,और जब साड़ी फसल आ चुकी होती है तब ये व्यापारी लोग उस माल को किसी जगह छिपा लेते हैं और फिर महंगे दामों पर बेचते हैं !
                                  ये भी देखने में आया है कि आजकल भारत के लोगों का रहने का स्तर भी "ऊंचा" हो गया है !सैंकड़ों कमाने वाला आज हज़ारों कमा रहा है , हजारों कमाने वाला आज लाखों और लाखों वाला करोड़ों कमा रहा है ! सब्जी बेचने वाले रेहड़ी वालों से लेकर बड़े-बड़े मॉल के शो-रूमों वालों को भी इसका एहसास हो चुका है,इसलिए सब 10/- रूपये वाली वस्तु के 50 /-रूपये ग्राहक से मांगते हैं ! ग्राहक बड़े ही आराम से उसे पैसे दे देता है और घर आकर सरकारों को कोसता है !मैं तो हंसी-हंसी में सब्ज़ी-राशन बेचने वालों से कहता ही रहता हूँ कि यारो क्यों हमारे मोदी जी को बदनाम करने में लगे हो ?
                    सच में मित्रो !! आज हर नागरिक को जागरूक होने की आवष्यकता है !उसे अपने "ज्ञान-चक्षु"खुले रखने चाहिएँ !किसी मीडिया या राजनितिक नेता के कहने से नहीं बल्कि अपने ज्ञान से दोषी को ढूंढना चाहिए , फिर उसकी शिकायत उस विभाग के अधिकारी को करनी चाहिए ! निजात अवश्य मिलेगी ! दूसरी तरफ मेरी सभी प्रांतों की सरकारों से भी हाथ जोड़कर गुज़ारिश है कि सभी कार्यों से पहले खाद्य-सामग्री के मूल्यों को निर्धारित कीजिये !आज हालात ये हैं कि कोई व्यापारी जितना चाहे उतना अपने उत्पाद पर मूल्य छाप सकता है क्यों कोई अफसर ऐसे लोगों को चेक नहीं करते ?ऐसे नाकारा अफसरों को भी दण्डित किया जाना चाहिए !
           जय - हिन्द !! जय - भारत !!
 "5th पिल्लर करप्शन किल्लर"वो ब्लॉग जिसे आप रोज़ाना पढ़ना,बाँटना और अपने अमूल्य कॉमेंट्स देना चाहेंगे !


                           

Comments

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-05-2016) को "कहाँ गये मन के कोमल भाव" (चर्चा अंक-2355) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ऐसे सवालों का जवाब नहीं दिया जाता है शर्माजी , फिर तब जब कि सत्ता व संगठन दोनों में एक ही व्यक्ति हो , वैसे भी भा ज पा का यह कार्यकाल इतना प्रभावी नहीं रहा है जितना पिछले रहा था , आपकी मंत्रियों के कार्य की प्रशंसा व्यंग है तब तो ठीक है वर्ण तो चापलूसी ज्यादा महसूस होती है , मेडम शायद इस गणित को समझ चुकी हैं कि जनता बारी बारी से मौका देती है इसलिए काम करना न करना एक समान ही है व मंत्री गण भी इसलिए राज काज को देख कर लगता है की सब अपनी बारी पूरी कर रहे हैं व अपना पेट भर रहे हैं , जनता व कार्यकर्ता को जो होना है होता रहे , उन्होंने दरियां बिछनी हैं बिछाएंगे ही ,जनता तो यूँ ही पल जायेगी , इसलिए इस बार से सरकार निश्चिंत हैं बहुत उम्मीद थी इस बार कि कुछ होगा पर कुछ भी न हुआ

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