"सेक्स की भूख से पगलाए "कुत्तों"की राक्षसी छेड़छाड़"!त्रस्त समाज ! - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)- +9414657511

सभी विद्वत्जन कहते हैं कि इंसान को परमात्मा ने "बुद्धि"दी है इसलिए ताकि वो जान सके कि वो कौन हैं?क्यूँ है कहाँ से आया है ?कहाँ जाएगा?उसे इस जीवन में क्या करना है ?क्या नहीं करना है?क्यों बार बार आता है?और कैसे वो इस आने-जाने के चक्कर से "छुटकारा"पा सकता है !पश्चिमी वैज्ञानिक लोग तो मानते हैं कि "मानव पहले बन्दर"था धीरे-धीरे वह मनुष्य बन गया !लेकिन एशियाई देशों में इंसान का इतिहास अलग-अलग बताया जाता है !ज्यादा धार्मिक ग्रंथों में जाकर आपको बोर नहीं करना चाहता , इसलिए इतना ही बताता हूँ कि हमारे मास्टर जी तो किसी को "कुत्ते का बच्चा",किसी को खोते दा  पुत्तर"बताते रहते थे !लड़कियों को कुछ भी नहीं कहा जाता था ,हालांकि वो लड़कों से ज्यादा शरारतें करतीं थी !जैसे आज चेनलों के एंकर,महिला-आयोग की महिलाएं,अखबार के सम्पादक और "महान-नेता"किसी भी "अभद्र-महिला"को कुछ भी नहीं कहने देते !टीवी 24 ने तो ऐसी महिलाओं की रक्षा करने हेतु अपने पैनल में "हार्ड-कौर"नामक महिला को भी बुला रख्खा था एक बहस के कार्यक्रम में , जिसने भरपुर शराब पी रख्खी थी !बहरहाल !मुद्दे पर आते हैं !
                     मैंने ये भी देखा कि जिन बातों के बोलने पर मर्दों को कोसा जा रहा था , वही बचाव के तरीके और सुझाव एक महिला ndtv के प्राइम-टाइम में दे रही थी तो बहुत तारीफ़ हो रही थी !ये भी एक समस्या है आजकल !कोई भी बात कहने से पहले मैं ये कहना चाहूंगा कि पहले हमें ये तय करना पड़ेगा कि हम आधुनिकता में जिन चाहते हैं या हिन्दू संस्कृति के अनुसार !यहाँ हिन्दू का मतलब सभी एशियाई धर्मों से है! यानी जीवन पद्धिति से !
                                          अगर तो हमें पाश्चात्य संस्कृति पसन्द है तो फिर हमें अपने दिमाग की सोच को पूरी तरह से ना केवल बदलना होगा बल्कि "हिन्दू जीवन पद्धिति"क्या थी ?ये भी भूलना पड़ेगा जी ! दोनों हाथों में "लड्डू" लेकर नहीं इस बात का निर्णय किया जा सकता !क्योंकि दोनों संस्कृतियां बिलकुल ना केवल अलग हैं बल्कि कभी ना मिलने वाली भी हैं !एक पद्धिति सेक्स को जीवन की अमूल्य वस्तु मानते हुए ,इसे समय पर और सूयोग्य साथी के साथ ही उपयोग करने हेतु कहती है तो दूसरी इसे केवल आनन्द का विषय मानकर जब भी,जैसे-कैसे भी  और किसी के साथ भी सेक्स करने की आजादी देती है !ना कोई उम्र का लिहाज और ना ही किसी रिश्ते का ख्याल रख्खा जाता है !हाँ !! एक समानता अवश्य है दोनों में , वो ये कि जबरदस्ती कहीं भी मान्य नहीं है !  
                                    अब आते हैं हाल ही में हुई उन घटनाओं की तरफ जो पाश्चात्य नववर्ष की रात्रि के आस-पास हुई हैं !अपराधियों ने क्या सोचकर ये सब किया ? क्या वो उन लड़कियों के साथ पहले से परिचित थे ?दोनों का किस संस्कृति की तरफ झुकाव था ? ये सब सवालों और इन जैसे अन्य सवालों को जाने बिना हम अगर केवल लड़कों को ही दोषी मान लेने की आदत दाल लेंगे तो "न्याय"नहीं हो पायेगा जी !"पशुता"का कोई भी बुद्धिजीवी समर्थक नहीं हो सकता ,उन्हें भारतीय संविधानुसार सज़ा अवश्य मिलनी चाहिए ! लेकिन क्या लडकियां बिलकुल "दूध की धुली"हुई होती हैं हमेशां ही !उनकी बात कोई कब और कौन करेगा ?क्या हम "त्रिया-चरित्र"को भूल जाएँ!क्या मर्द लोग इस बीमारी के भुक्त भोगी नहीं हैं ?क्या महिलाओं द्वारा किये गए अपराधों की संख्या शून्य है ?
                              अगर नहीं तो ये पत्रकार,नेता,महिला-आयोग की महिलाएं, टीवी एंकर और सम्पादक लोग ड्रामे क्यों करते रहते हैं ?क्या जनता को बेवकूफ बनाना ही इनका काम रह गया है ?क्यों ये ऐसे लोगों के समर्थक नज़र आते हैं जो भारतवासियों को भारतीय संस्कृति के अनुसार रहने नहीं देना चाहते ?क्यों वामपंथी और कोंग्रेस्सी विचारधारा हिंदुओं पर पिछले 70 सालों से थोपी जा रही है !क्यों आतंकवाद की मदद से भारत को एक मुस्लिम या ईसाई देश बनाया जा रहा है ?क्या भारत का कोई क़ानून ऐसे गन्दे विचारों वाले लोगों के लिए नहीं है जो सोचते हैं कि  हम पत्रकारिता से,लॉखों-कविताओं से,फिल्मों-विज्ञापनों से और झूठे इतिहास लिखने-पढ़ाने से इस पवित्र भारत को गन्दा कर रहे हैं ??
आप अपने अनमोल विचारों से मुझे अवश्य अवगत करवाएं !
  जय - हिन्द , जय भारत और वन्दे - मातरम !


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सधन्यवाद !!
आपका प्रिय मित्र ,
पीताम्बर दत्त शर्मा,
हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार,
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जिला-श्री गंगानगर।

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