Tuesday, January 31, 2017

"बजट हमारा-आपके द्वारा" !क्यों नहीं हमें पूछते ?- पीताम्बर दत्त शर्मा मो.न.+ 9414657511

लो जी !एकबार फिर हमारे ही द्वारा जो चुने गए हैं  कर्णधार,वो बनाएंगे हमारा बजट ,बताएंगे हमें कि क्या हमने अगले वर्ष खाना-पीना है ,कितना हमने अपनी सरकार को टेक्स देना है ,कितना धन देश की जनता का उसकी रक्षा पर लगना है और कितने धन से हमारे लिए साधन उपलब्ध करवाये जायेंगे ,जैसे रेल,बसें,बिजली-पानी और कपडा-मकान आदि !लेकिन हमारे नेता लोग ,समाजसेवी लोग और देश भक्त पत्रकार लोग अपनी "छिपी हुई सहूलियतें"कैसे प्राप्त करते आये हैं और कैसे भविष्य में प्राप्त करेंगे ?ये नहीं बताते !
                       कल हमेशां की तरह हमारे विपक्षी नेताओं ने एक मीटिंग करी और उसमे ये विचार तो किया की संसद को चलने से कैसे रोकेंगे , लेकिन ये नहीं विचार किया कि जनता को वो फायदे कैसे पहुंचेंगे ?जो उन्होंने अपने घोषणा-पत्रों में कर दिए हैं उनके वोट लेने हेतु !ऐसा सुनने में आया है कि "चतुर विपक्षी नेताओं" ने आज ऐसे तरीके अपनाये ,माननीय राष्ट्रपति जी का भाषण रोकने हेतु पहले तो भाषण के दौरान संसद का साउंड सिस्टम खराब करवा दिया ,बाद में एक सांसद ने बीमार होने का नाटक किया ! इसकी जांच होनी चाहिए !क्योंकि अगर विपक्ष के कुछ षड्यन्त्रकारी सोच वाले नेताओं ने ऐसा करवाया है तो देश की जनता को उन्हें अवश्य दण्ड देना चाहिए !
                     आजकल राजनीतिक दल चुनावों में जनता को फ्री घोषणाओं द्वारा एक प्रकार की रिश्वत-प्रलोभन दिया जाने लगा है , जिसका संज्ञान सर्वोच्च-न्यायालय को अवश्य लेना चाहिए !माननीय मोदी जी को मैं दो निवेदन करना चाहता हूँ !1. मोदी जी !भारत का विपक्ष और R.S.S. आपको दोबारा सत्ता में आने नहीं देगा !इन्होंने वाजपेयी जैसे नेता को ढंग से काम नहीं करने नहीं दिया !क्योंकि दोनों नहीं चाहते कि कोई उनसे भी बड़ा नेता बने !और दूसरी ये कि आप अमेरिका के नए चुने गए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जी की तरह ही एकमुश्त निर्णय लेकर अपने कार्यकाल के अंत में अगला ठोस रोडमैप जनता को बताएं !घोषणापत्र बन्द होना चाहिए !शपथ-पत्र होना चाहिए !वो भी स्टाम्प-पेपर पर !कृपया नोटबन्दी पर श्वेत-पत्र अवश्य जारी करवाएं !ताकि जनता को विपक्ष के झूठ का पता चल पाए !कलयुग चल रहा है महाराज !! फिर भी हमें पूरी उम्मीद है कि "अच्छे दिन आएंगे "!!


                   



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Monday, January 30, 2017

"मिलिए - श्री बल्ला राम भाट "से !!पुराणी संस्कृति के पुरोधा !- पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

भारत के पाकिस्तान बॉर्डर के पास सूरतगढ़ शहर में रहने वाले श्री बल्ला राम भाट नामक शख्स रहते हैं ! आइये आज हम आपका परिचय इनसे करवाते हैं !आज तलक आपने कई तरह के मशहूर शख्सियतों के बारे में जाना होगा ,आप कइयों से मिले भी होंगे , लेकिन इनके बारे में हम जो कुछ आज आपको बताएँगे वो आपने शायद ना देखा हो और ना ही सुना होगा !


साधारण जीवन ,पुराणी संस्कृति के अनुसार ज़ेवर पहनना , मेहनत करके खाना और सदा सुखी रहना इनके स्वभाव में हैं !74 वर्षीय बल्ला राम श्री बोहरा राम की सन्तान हैं ,जो घुम्नतरु जातियों में से एक बंजारा भाट जाति से सम्बन्धित हैं !सड़क निर्माण में पहले मजदूरी का काम करते थे ,फिर उन मजदूरों के "जमादार"बन गए और आजकल ये ठेकेदार हैं इनके 3 बहने ओऱ 5 भाई हैं !5 लड़के और 3 लड़कियां हैं !इनके पुराने गाँव "कापेरो",मेड़ता जैसलमेर हैं !इनकी जाति के 200 परिवार यहां आस-पास रहते हैं !जिनके लड़ाई-झगडे ये ही निपटाते हैं !ये आज के चुने हुए नेता नहीं बल्कि पुरानी परंपरा के सरपंच हैं !इनकी जाति के लोग इन्हें बड़ी इज्जत देते हैं !ये तलवारबाज़ी और लठ्ठ-बाज़ी के माहिर हैं !इनकी पत्नी श्रीमती नाथी देवी हैं जो एक ग्रहणी होने के साथ साथ कोमल हृदय वाली महिला हैं ! इन्होंने अपने घर के पास सैंकड़ो ऐसे लोगों को अपनी जगह देकर बसाया है जिनके पास एक मुश्त पैसा नहीं होता था !उनसे किस्तों में धन लिया जैसे सुलभ हो पाता था !
                            इन्होंने जो सबसे बड़ा काम किया है वो ये कि इनकी जाति में लोग पहले अपनी बेटियों को पैसे लेकर बेच दिया करते थे !लेकिन इनके प्रयासों से 300 परिवारों ने ऐसी कुप्रथा को त्यागने की कसम खायी !इसीलिए हमने आपके समक्ष इनका ये संक्षिप्त परिचय दिया है !आपके अनमोल कॉमेंट्स आमंत्रित हैं ! 

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Saturday, January 28, 2017

"जो संविधान इतनी लूट-खसूट मचाने की इज़ाजत दे !उसे भला क्यों सही करें हमारे नेता लोग"????

संविधान लागू होते ही लोकतंत्र के जिस पाठ को देश ने पढ़ा, वह वोट देने कीबराबरी का ही था। 1950 में 17 करोड 32 लाख,12 हजार, 343 वोटर थे तो आज यानी 2017 में 83 करोड 40 लाख 82 हजार 814 वोटर हो चुके हैं। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश होने का तमगा लिये भारत का अनूठा सच ये भी है कि अपनी सत्ता खुद चुनने वाले देश में सत्ता ने चुनने वालो को ही जाति धर्म से लेकर महिला-युवा और गरीब-रईस में भी बांटा। अपना संविधान अपनी सरकार थी तो भी संविधान में दर्ज लोकतंत्र की धज्जियां जमकर उड़ायीं गईं। आपातकाल तो18 महीने रहा। लेकिन बरस दर बरस संसदीय चुनावी लोकतंत्र के राग को देश में हर सत्ता ने कुछ इस तरह गाया कि कि संविधान में दर्ज जनता के हक को देने या छिनने की राजनीति चुनावी मेनिफेस्टो में सिमट गई। और देश इतना गरीब होता चला गया कि 2017 में 1950 के हिन्दुस्तान से दोगुने नागरिक गरीबी की रेखा से नीचे खड़े नजर आये। शिक्षा-हेल्थ-पीने का पानी भी मुनाफे के धंधे में समा गया। खेती से उघोग और उघोग से खनिज संसाधनों की लूट सबसे बडी कमाई बन गई। लेकिन सत्ता उसी को मिली जिसने भूखी जनता

का पेट भरने का नारा दिया।

तो लोकतंत्र की ताकत गरीबी में समायी। और सत्ता रईसी की कुर्सी बन गई। देश के संसधानो की लूट में गरीबों की हिस्सेदारी नहीं मिली। गरीबों के लिये पैकेज और कल्याण योजनाओं से होते हुये चुनावी मेनीफेस्टो ने भूखे भारत की तस्वीर ही राज्य दर राज्य रखी। वह भी सत्ताधारियो ने। इसी बार पंजाब में अकाली 10 बरस की सत्ता के बाद भी आटा, चावल गेंहू, दूध ही बांटते नजर आये और यही हालत 5 बरस सत्ता में रहने के बाद समाजवादी अखिलेश यादव की भी रही। तो सत्ता ने गरीबी बरकरार रखकर गरीबों को अपनी सत्ता पर आश्रित किया। और गरीबों ने लोकतंत्र के राग तले संविधान में दर्ज अपने अधिकार को ही जीने की न्यूनतम जरुरत पाने के लिये सत्ता तले बंधक मान दिया। असर इसी का हुआ कि नेहरु से लेकर मोदी तक के दौर में 60 फिसदी गरीब सबसे बडा एकमुश्त वोटर हो गया। तो 60 फिसदी संपत्ति-संसाधनों के मालिक बहुराष्ट्रीय कन्ज्यूमर हो गये। और सत्ताधारियों ने रईसी को निसाने पर लेकर खुद को गरीब से जोड़कर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नेता खुद को मान लिया। लेकिन लोकतंत्र के इस मिजाजमें सत्ता पाने के लिए प्रचार प्रसार की चकाचौंध में पानी की तरह पैसा हर किसी ने कुछ बहाना शुरु किया । कि गरीबी सिर्फ चुनावी नारो में सिमटी और विकास शब्द लोकतंत्र पर भारी लगने लगा। और ऐसे में वोट के लिये नेताओं की जुबां जिस तरह कभी महिलाओं की खूबसूरती पर चोट तो कभी वोट और महिलाओं का घालमेल। किसी को तड़ीपार कहना तो किसी को करप्ट कहना। किसी को चोर तो किसी को डकैत तक कहना। तो क्या ये माना जाये कि गणतंत्र के लोकतंत्र में ये बोली वोट के लिये है।

ये अंदाज सत्ता पाने या गंवाने की उम्मीद बनने या टूटने के है। या फिर लोकतंत्र का मिजाज सत्ता पाने के लिये अब इतना अराजक हो चला है कि मर्यादा टूटेने का खतरा नहीं है बल्कि समाज की मर्यादा कौन कैसे कितने विभत्स तरीके से हवा में उछाल सकता है भीड़ उसी के हिस्से में आयेगी क्योंकि सवाल वोट बैक का है। और वोट भीडतंत्र से समेटे जा सकते है लोकतंत्र से नहीं। तो क्या जिस संसदीय चुनाव को संविधान लागू होने के बाद लोकतंत्र का सबसे बडा ककहरा माना गया वह मौजूदा वक्त में लोकतंत्र से ही दूर हो चला है। ये सवाल इसलिये क्योंकि एक तरफ गरीबी और भूखमरी देश की राजनीति को सत्ता तक पहुंचाती हैं। दूसरी तरफ चुनाव जीतने के लिये सबसे ज्यादा धन प्रचार प्रसार की चकाचौंध में ही बहाया जाता है। अगर यूपी के चुनाव को ही तोल लें। तो एक तरफ 12 करोड़ गरीब पिछड़े हाशिये पर जी रहा यूपी है। दूसरी तरफ करोड़ों-अरबों का प्रचार है। और प्रचार के आइडिया देने वाले करोड़ों ले रहे हैं। यानी सत्ता पाने के लिये सत्ताधारियों की कवायद को देख लीजिये। लखनऊ में चुनाव जीतने के लिये समाजवादियों का ये वार रुम हर आधुनिक तकनीक से लैस है। कमरे से ही पूरे यूपी के प्रचार पर नजर रखी जा सकती है। यही से चुनाव जीतने वाले नारे निकलेंगे। यानी
गरीबों को कैसे नारो और चकाचौंध से लोकतंत्र में गुम कर दिया जाये, इसके व्यवस्था वार रुम में से होगी। तो याद कीजिये 2014 के लोकसभा में भी मोदी का वार रुम कितना आधुनिक था। अत्याधुनिक तकनीक से लैस प्रचार प्रसार में तो पहली बार देश ने नेता की मौजूदगी को वर्चुअल पर देखा। यानी नेता नहीं है लेकिन नेता है। जो गरीबी पर बोल रहा है। जो करप्शन और कालेधन पर बोल रहा है। तो सवाल सिर्फ तकनीक या पढ़े लिखे लोगों का चुनाव जीतवाने का ठेका लेने वाले प्रचार तंत्र का नहीं है। सवाल तो लोकतंत्र का है। और लोकतंत्र कैसे इजाजत दे सकता है कि प्रचार में तीस हजार करोड़ फूंक दिया जाये। ये रुपया किसका है। कहां से आया है। कोई नहीं जानता क्योंकि एडीआर की रिपोर्ट ने कल ही जानकारी दी कि कांग्रेस हो या बीजेपी, समाजवादी पार्टी हो या अकाली दल। हर कोई अपने चंदे को छुपाता है। और औसतन हर राजनीतिक दल 60 फीसदी रकम बताते ही नहीं कि उनके पास फंड आया कहां से। तो वजह भी यही है कि मूल मुद्दों से इतर अब नेता इस जुबा पर उतर आये हैं। और देश की बहस इन्हीं मुद्दों में गुम हो चली है।



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Friday, January 27, 2017

"चढ्ढी पहन के फूल खिला है " !! - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक)मो.न.+9414657511

प्रिय मित्रो ! "बसन्त-बहार "का महीना शुरू होने को है !बाग़,उपवन,बगीचे,क्यारियां और फ्लैटों की गैलरियां रंगबिरंगे सुंदर-सुंदर फूलों से सजने लगी हैं !प्रकृति ने सुंदर छटा बिखेरनी शुरू कर दी है !पहाड़ों पर बर्फ पड़ने लगी है !सब तरफ सफेद-सफेद चादर सी बिछी हुई लगती है !वहाँ थोड़ा रुक कर बहार आएगी !लेकिन हिमालय के साथ लगते इलाकों में वातावरण "रमणीय"होने लगा है !गीत गाने को मन करने लगा है !"भ्रमर "कलियों के इर्द-गिर्द "डोलने"लगे हैं !जिन्हें देख कर मन "बावरा"हुआ जा रहा है !दूर-दूर तलक घुमते रहने को मन करता है !घण्टों चलते-चलते किसी के साथ बतियाने को मन करता है ! लेकिन हाय री  !! ये उम्र !!और ये मोटा थुलथुला शरीर !जो आजकल की आधुनिक बिमारियों से भर चुका है !इस की वजह से  कुछ भी कर नहीं पा रहे हैं !बस ! देख-सुन और लिखकर ही अपनी इस "पवित्र-आत्मा"को शांत कर लेते हैं !इसीलिए हमने आज के इस लेख का शीर्षक भी बच्चों वाला ही रख्खा है !क्योंकि कहते हैं ना कि बुढ़ापा और बचपन एक सा ही होता है !
                     लेकिन देश के नेता कभी बूढ़े होते ही नहीं !अगर आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो पूछ लीजिये माननीय एनडी तिवाड़ी जी से ,आडवाणी जी से और मुरली मनोहर जोशी जी से !!आपको विश्वास हो जाएगा !ऊपर से देश के पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं !अपने अमित शाह जी इनको आजकल "मस्का "भी शायद इसीलिए लगा रहे हैं !कहते हैं -:"माननीय अटल,आडवाणी और जोशी जी की तैयार की गयी भूमि पर हम अवश्य चुनाव जीतेंगे "!सभी राजनितिक दल "लुभावने"घोषणा पत्र सुनकर वोट लेनेकी कोशिश करते नज़र आ रहे हैं !कई दलबदल करते समय "फूलों को चढ्ढी"पहनाकर (बुके)एक दुसरे को गुलदस्ते भी देते नज़र आ रहे हैं !बेशर्मी की हद्द है !नेताओं ने सारे सामजिक नियम तो काफी पहले से ही तोड़ रख्खे थे ,लेकिन आजकल तो कोई सर्वोच्च-न्यायालय की भी नहीं सुनता दिखाई पड़ता ! टीवी चेनेल वाले शरेआम जातिवाद,धर्मवाद और इलाके आदि पर बहस कराने के नाम पर जोरशोर से राजनितिक दलों का प्रचार करते हमें तो नज़र आते हैं लेकिन चुनाव आयोग को नहीं क्यों?सब एक दुसरे को "फूल"बनाते घूमते हैं ! इसीलिए शायद फूल भी शर्म के मारे चढ्ढी पहन कर ही खिल रहा है !
              आखिर क्या कर रहे हैं हम ?छोडो सारे भ्रम !! जिनके कारण आप और हम अकड़ते हुए घुमते हैं !बन जाओ कोमल और खुशबूदार "फूल"!!फिर चाहे "चढ्ढी"(खादी का चोला)ना भी पहनोगे तो भी लोग एक दुसरे से प्यार करेंगे !हमारा भारत भी महकने लगेगा ! "अच्छे दिन आएंगे"!!तो सब मिलकर गाओ !!-:"जंगल जंगल पता चला है , बात चली है .......!!! चढ्ढी पहन के फूल खिला है फूल खिला है "......!! 
                           





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Wednesday, January 25, 2017

"चश्मा उतारो !! फिर देखो यारो"! - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र टिप्पणीकार) मो.न. +9414657511

आज एक समाचार ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम आज भी कितने "पुराने-ढर्रे"पर चल रहे हैं और दूसरों को भी हमारी ही  मुताबिक  देखना चाहते हैं !सतयुग-द्वापर और त्रेता युग की अच्छी-अच्छी बातें सुनेंगे-सुनाएंगे,और इतिहास की गहरी धूल में छिप चुके चन्द महापुरषों और वीरांगनाओं की कहानियों पर चलने हेतु अपनी अगली पीढ़ी के बच्चों को मजबूर करेंगे !क्या सन्त लोग , क्या नेता लोग, क्या समाजसेवी लोग और क्या महान पत्रकार-एंकर लोग चिल्ला-चिल्ला कर कहते दिखाई पड़ते हैं कि देखो उसने "विवादित"ब्यान दे दिया !उसने महिलाओं की भावनाओं को तार-तार कर दिया !वगैरह-वगैरह !!
                    लेकिन आज जिधर देखो उधर क्या बच्चे क्या बड़े ,अपनी सभी सीमाएं तोड़ते ही नज़र आते हैं ! लड़कों की गलतियां तो हम बड़े चटखारे ले-लेकर सुनाते फिरते हैं लेकिन जब लड़कियों की बात आती है तो हम उसपर "सौ -सौ मुलम्मे "चढाने लग जाते हैं !भारत के "महिला-आयोग "की महान चरित्रवादी बहनें टीवी पर आकर बड़े नेताओं को सम्मन भेजने की बातें करती हैं लेकिन उन "बुरी-महिलाओं"को सुधरने के कोई कदम उठती नज़र नहीं आतीं जिनके कारण हमारे "बेचारे-लड़के"खराब हो रहे हैं !भले ही आप मुझे मेरे इन विचारों पर सौ-दो सौ गालियां दे लेना लेकिन मेरे उठाये प्रश्नों का उत्तर अवश्य देना !
                 तो  ! दिमाग को सुन्न कर देने वाला समाचार ये है कि एक सुशिक्षित लड़की ने एक सुशिक्षित लड़के से प्यार कर लिया !आप कहेंगे इसमें क्या बड़ी या बुरी बात है ? उस लड़की ने अपनी जाति  से बाहर जाकर दूसरी जाती के लड़के से ना केवल प्यार किया बल्कि उसके साथ भाग गयी !आप फिर कहेंगे कि "फिर क्या हुआ"?लेकिन आगे सुनिये !वो लड़की भागते वक़्त अपनी माँ को साथ ले गयी !उसका प्रेमी अपने 4 साथियों सहित कुछ दूरी पर एक जीप में प्रतीक्षा कर रहा था !लड़की जब जीप के पास पहुंची ,तो लड़के ने हैरान होकर पूछा इनको साथ क्यों ले आयी ?तो वो शिक्षित युवा लड़की बोली मेरे पिता इसको तंग करते हैं इसलिए मैं इनको दुखी नहीं देख सकती मैं इनको मेरे ननिहाल के गाँव के बाहर छोड़ दूँगी !ये अपने "आधुनिक-मिलन"पर सहमत हैं !आप कहेंगे कि ये तो लड़की की समझदारी थी !लेकिन रुकिए हज़ूर कहानी अभी खत्म नहीं हुई है !हुआ गज़ब ये कि कुछ दूर चलके लड़की और उस लड़के को लगा कि ननिहाल में माँ को मामा भी तो तंग कर सकता है !तो क्या किया जाए ?वापिस गाँव जा नहीं सकते !तो उन "पढ़े-लिखे आधुनिक नोज़वानों"ने लड़की की माँ को एक नहर के किनारे जीप रोक कर , पुलिस चौकी के पीछे लेजाकर नहर में धक्का दे दिया !
                         उसके दोस्त पहले दोनों को लड़के के मामे के घर छोड़ने गए !लेकिन मामा ने उन्हें धक्के मार कर घर से निकाल दिया !बाद में पुलिस मेहनत करके उन्हें पकड़ लायी !तो राज़ खुला जी !अब कौन सी महिला योग की सदस्य और आधुनि पत्रकार उस मामे के खिलाफ f. i. r. करवाएगा !लड़का और लड़की दोनों "नेट"की परीक्षा देने पर एक दुसरे से मिले थे !लड़की तो कॉलेज में प्रथम आती थी !ये है असली समाचार -:
 सूरतगढ़ 25 जनवरी।
 अपने प्रेम को परवान चढ़ाने के लिए कॉलेज की बेस्ट छात्रा ने अपनी सगी मां को नहर में धक्का देकर मार डाला। यह घिनौना अपराध पुलिस ने खुलासा किया है। 
यह घिनौनी  घटना सूरतगढ़ सदर थाना इलाके के गांव सरदार  पुरा बीका की है। 
सुमन ने अपने प्रेमी कमल के साथ जाने से पहले अपनी मां को साथ लिया और इंदिरा गांधी नहर में धक्का दे दिया।




 सूरतगढ़ के उप पुलिस अधीक्षक मोहम्मद आयूब ने 24 जनवरी को पत्रकारों को बताया। इस पूरे प्रकरण में पुलिस ने सुमन उसके प्रेमी कमल व उसके साथियों जितेंद्र सुथार, नारायण रावत व बबलू को गिरफ्तार किया है।
 पुलिस उपअधीक्षक ने बताया कि कमल अपने साथियों जितेंद्र सुथार,नारायण रावत  व बबलू के साथ 6 जनवरी की रात को 10:30 बजे के करीब bolero गाड़ी से सरदारपुरा बीका पहुंचा। 
वहां सुमन अपनी मां को साथ लेकर गाड़ी में बैठी।
 वापसी में नहर पर गाड़ी रुकवा  कर कमल और सुमन उतरे। सुमन ने अपनी मां को भी उतारा। वहां नहर में मां को धक्का दे दिया गया।
 इसके बाद कमल सुमन को लेकर अजमेर में अपने कमरे में आया जहां वह किराए पर रह रहा था। वह अजमेर में एक सीए के यहां काम करता था। उसके बाद वह गांव में अपने मामा के घर गया लेकिन मामा ने उसे शरण नहीं दी।
 कमल और सुमन कई जगह होते हुए भावनगर अहमदाबाद गए। वहां उसके पुराने मित्रों ने उसे कमरा दिलाया।
 पुलिस ने बताया कि कमल और सुमन की मुलाकात 2015 में बीकानेर में हुई थी।                             ******************
                            किसका कसूर है ये सब जो हुआ उसमे ? क्या हमारी खोखली शिक्षा पद्धति या फिर खोखले सिद्धांत ?क्या फायदा है "बेटी-दिवस"माता-दिवस "और शिक्षक दिवस मनाने का ?? जीवन की सच्चाइयां कुछ और हैं और जो "दवाइयां"हम ले-दे रहे हैं वो कुछ और बिमारी का इलाज करती हैं !या नाकाम हैं !तो फिर क्या किया जाए ? मेरे हिसाब से तो दस-बीस साल भारत पर शासन करने का इतिहास बनाने का लालच त्याग कर हमारे "खेवनहारों"को हमारे आगे आनेवाली पीढ़ियों के मार्गदर्शन हेतु "नए-रास्ते और नए - कानून"बनाने पड़ेंगे !ये जो हम "तमाशे"करते रहते हैं या देखते-सुनते रहते हैं ना यही खराब करते हैं जी !
               राम-राम ! जय-हिन्द !! अच्छे दिन आएंगे !!

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Tuesday, January 24, 2017

"मुझे आजाद किसने करवाया"??? - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र-टिप्पणीकार) मो.न. +941465751

कल एक टीवी चेनेल पर बहषों रही थी कि "भारत को आजाद किसने करवाया"? उसमे कोई नेहरू-गांधी जी का पक्षकार था तो कोई भगत सिंह-सुभाष चन्द्र बोस का पक्षकार था !वहाँ कोई उन देश भक्तों का पक्षकार नहीं था जो अपनी जान देने से पहले उपरोक्त दोनों प्रकार के पक्षकारों के "प्रेरकों की लिस्ट"में अपना नाम लिखवाकर नहीं गए !बहस करने वाले "पक्षकार"गला फाड़-फाड़ कर केवल अपने पक्ष की वजस से आजादी मिली यही कहा जा रहा था !इसके साथ साथ वो एक दुसरे पर ये भी आरोप लगाए जा रहे थे कि हमारे स्वतन्त्रता सेनानी को इन्होंने हीरो बनने से तरह-तरह से रोकने का काम किया !आजादी के बाद इन्होंने अपनी मर्ज़ी से इतिहास को लिखवाया,पढ़वाया और प्रकाशित करवाया !जिससे हमारे नेता आज पीछे रह गए ! इनके नेता तो कोई "चाचा"बन गया तो कोई "राष्ट्र-पिता"बन गया और हमारा स्वतन्त्रता सेनानी बेचारा केवल "नेता जी" ही रह गया !
                          ये तो वो मसले हैं जो आजकल टीवी चेनल वालों को खूब कमाईयां करवा रहे हैं !दूसरी और वो मसले हैं जो आजादी के बाद बने नेताओं और पुराने नेताओं के "होनहार-बच्चों"ने पैदा कर दिए ! आज हम सब कहने को आजाद तो हैं , लेकिन "मनमर्ज़ियाँ"करता कोई "और"ही है !जनता रोज़ ही किसी न किसी बात पर अपने को ठगा हुआ सा महसूस करती है !मुझे याद है कि हमारे बुज़ुर्ग लोग अंग्रेजों के जाने के बाद भी उनके बढ़िया शासन की तारीफ़ किया करते थे और उनको कुछ कमियों के बावजूद अच्छा भी बताते थे !आज उनकी वो बातें बिलकुल सही नज़र आ रही हैं !
                         आज सोचता हूँ कि अगर मैं किसी का गुलाम होता तो मुझे कोई करने को काम तो मिलता ! समय पर भोजन तो मिलता !एक निश्चत मात्रा में धन भी मिलता ! आजकल ये सब सुविधाएँ भारतीय जेलों में ही उपलब्ध हैं !वहाँ मुझ जैसा "ईमानदार और शरीफ "आदमी जाना नहीं चाहता !मौजूद लोकतंत्र में या तो आपके पास किसी आरक्षित जाति में जन्मे का प्रमाण पत्र होना चाहिए !या फिर किसी बड़े व्यपारी या नेता का पुत्र होना आवश्यक है !तब तो आपका जीवन मजे से गुजर जाएगा अन्यथा मित्रो !इस आजाद देश में आजादी किसी काम की नज़र नहीं आती !कल एक बड़े कवि साहिब "पुस्तक-सम्मेलन"में फ़रमा रहे थे कि जिन "फ़िल्मी गीतों"पर महिलाओं को आपत्ति होनी चाहिए उन पर ही वो आजकल नाचती हैं !बात सौ प्रतिशत सही है लेकिन महाराज आप भी तो फिल्मों में वैसे ही गीत लिखकर इस स्टेज तलक पहुँचने में कामयाब हुए !भजन-लोकगीत लिखने वाले तो इस सम्मेलन की दर्शक कुर्सियों तलक भी नहीं पहुँच पाते हैं जी !
                   सारा सार आज की बात का ये है मित्रो कि "मैं"और मेरे जैसे साधारण एवं पवित्र लोग पहले तो मिलते काम हैं क्योनी हमारी प्रजाति लुप्त प्रायः है !अगर कहीं हम जैसे लोग दिखाए दे भी जाते हैं तो वो "विक्षिप्त"से ही नज़र आते हैं !वो अमीरों की महफ़िल में "मनोरंजन"के पात्र तो बन सकते हैं लेकिन कोई भी उनको "महत्व"नहीं देता !यहां तलक की भारत की जनता भी "वोट" देते समय उनको इस लायक नहीं समझती !इसीलिए मैंने आज ये बड़ा प्रश्न आपके सामने रख्खा है कि   "मुझे आजाद किसने करवाया"??? यारो पहले सच्चा संविधान तो बनाओ !!!अपना सिस्टम (तन्त्र)तो सही कर लो !कोई रोड मैप तो बनाओ !आम आदमी के दिमाग में सभी समस्याओं के निराकरण के तरीके हैं तो हमारे सांसदों के दिमागों में क्यों नहीं ?क्यों ये अपनी पार्टियों की "भेड़ें"बने फिरते हैं ?आप अपने विचार हमारे ब्लॉग पर आकर अवश्य सांझा कीजिये !आपके अनमोल कॉमेंट्स की प्रतीक्षा में !आपका ये मित्र !




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Monday, January 23, 2017

"लूट-घूस की सत्ता तले स्कूली बच्चो की मौत" !! "क्यों नहीं रोते हम"??


इतनी खूबसूरत दुनिया के लिये भगवान तुम्हारा शुक्रिया / भोजन देने के लिये भगवान तुम्हारा शुक्रिया /पक्षी का इतना सुंदर गीत सुनाने के लिये भगवान तुम्हारा शुक्रिया / हर चीज जो तुमने दी भगवान उसका शुक्रिया

पहली कक्षा में इस कविता को पढ़ने वाला बच्चा अब इस दुनिया में नहीं है। सड़क किनारे जमीन पर बिखरे किताब कॉपी। टिफिन बाक्स। बस्ते में उस बच्चे के मांस के लोथडे भी हैं, जो किताबो को पढ़ पढ़ कर भगवान की बनायी दुनिया में जीने और बड़े होने के सपनों को जीता रहा। और इस कविता के जरीये भगवान को शुक्रिया कहता रहा जिसने जमी, आसमान, पक्षी बनाये। वातावरण में ही जिन्दगी के रस को घोल दिया। लेकिन इस बच्चे को कहां पता था जो किताबों में लिखा हुआ है। या जिन कोमल हाथों से पन्नों को उलटते हुये वह मैडम के

कहने पर भगवान तुम्हारा शुक्रिया कर अपने सपनो को जीता उसे इतनी खौफनाक मौत मिलेगी जो भगवान ने नहीं बल्कि भगवान बन देश चलाने वालों ने दी। हर बैग के भीतर ऐसी ही किताब -कापी में दर्ज बच्चों के सपने हैं। वह सपने जिसे बच्चो ने पालना और सीखना ही तो शुरु किया था। और अंधेरे में उठकर मा बच्चे के टिफिन को भरने में लग जाती तो बाप स्कूल यूनिफार्म पहनाने से लेकर किताब-कापी को सहेज सहेज कर बैग में ऱखता। गले में टाई लटकाता। जूतो के फीते बांधता । लेकिन सडक पर बिखरे इस मंजर ने सिर्फ मां बाप के दिलो में ही सन्नाटा नहीं बिखेरा बल्कि उस अपराधी समाज के समाने अपनी बेबसी को भी रो रो कर घो दिया, जिसने नियम कायदो को ताक पर रख भगवान को शुक्रिया कहने तक की स्थिति की हत्या कर दी। तो क्या ये हादसा नहीं हैं। ये महज कोहरे में लिपटे वातावरण की देन भी नहीं है। ये सिर्फ बच्चों की मौत नहीं है। ये उस व्यवस्था का खौफनाक चेहरा है, जो हर रुदन को लील लेने पर हमेशा आमादा रहती है। क्योंकि बस बिना परमिट के चल रही थी। ट्रक अवैध रुप से बालू ले जा रहा था। स्कूल बंद करने के आदेश के बावजूद चल रहा था। गांव में अस्पताल नहीं सामुदायिक हेल्थ सेंटर था। तो क्या मौत होनी ही थी। और ऐसी ही कई मौत का इंतजार हर मां बाप को ये जानते समझते हुये करना ही होगा। क्योंकि सिस्टम प्राईवेट स्कूल के अलावे कुछ दे नहीं सकता। प्राईवेट स्कूल मुनाफे की शिक्षा के अलावे कुछ देख नहीं सकते। मुनाफे तले कही बसो के परमिट घूस देकर दब जाते है। या घूस देकर बच निकलते हैं। अवैध खनन के बाद बालू को लेजाते ट्रक भी घूस देकर सडक पर सरपट दौडने का लाइसेंस पा लेते है । और जब टुर्धना हो जाये तो बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर के जीते गांव दर गांव में इलाज के लिये अस्पताल तक नहीं होता। तो ये हादसा नहीं। हत्या है । 

ये वातावरण का कोहरा नहीं । सिस्टम और सियासत पर छाया कोहरा है। ये सिर्फ बच्चों की मौत नहीं बल्कि विकास के नाम पर होने वाली सियासत की मौत है। और मां-बाप की रुदन महज बेबसी नहीं बल्कि सत्ता के भगवान होने का खौफ है। और संयोग ऐसा है कि जिस लखनऊ की सियासत को साध कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब सिस्टम साधने वाले नेता पाले हुये है। उस दिल्ली लखनऊ के ठीक बीच एटा के अलीगंज ब्लाक का असदपुर गांव है। और हर कोई इस सच से आंख मूंदे हुये है कि यूपी में 20 हजार प्राइवेट स्कूल बिना पूरे इन्फ्रास्ट्रक्चर के चलते हैं। 12 हजार सरकारी स्कूल तो बिना ब्लैक बोर्ड बिना पढे लिखे शिक्षक के चलते है। 30 हजार से ज्यादा ट्रक अवैध बालू ढोते हुये यूपी की सडको पर सरपट दौडते है । सड़क पर सुरक्षा के नाम पर पुलिस की तैनाती होती ही नहीं। और सडक पर अवैध तरीके से सिर्फ ट्रको से अवैध वसूली की रकम सिर्फ यूपी में हर दिन की 8 लाख रुपये से ज्यादा की है। और बिना परमिट दोडते स्कूल बसों से वसूली हर महीने की 50 लाख से ज्यादा की है । इतना ही नहीं प्राइवेट स्कूल खोलने के लिये जितनी जगहो से एनओसी चाहिये होता है, उसमें स्कूल खोलने वाले जितनी घूस अधिकारियों से लेकर पुलिस और नेताओं को देते है वह प्रति स्कूल 40 लाख से ज्यादा का है। यानी सरकारी स्कूल खोलने का बजट 2 लाख और प्राइवेट स्कूल खोलने के लिये घूस 40 लाख । तो कौन सा सिस्टम कौन सी सरकार इस तरह बच्चो की मौत पर मातम मनाती है। ये सोचने का वक्त है या पिर समझने का कि बच्चो ने तो जिन्दगी देने के लिये भगवान का शुक्रिया करने वाला पाठ पढ़ा। लेकिन अपने अपने कठगरे में सत्ताधारियों ने भगवान बनने के लिये ये मौत दे। और 24 बच्चो की मौत का कोई दोषी नहीं। 


!! sdhnywaad !!

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Friday, January 20, 2017

"तो भाजपा हारेगी"और भाजपा हारेगी तो"??- पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र टिप्पणीकार) मो.न.+ 9414657511

परमप्रिय माननीय पाठक मित्रो ! सादर नमन !आज मैं आपसे एक विशेष चर्चा करना चाहता हूँ !क्योंकि आज कुछ ख़ास किस्म की घटनाएं घटित हुई हैं !जिनमे से कुछ का ज़िक्र मैं आपके साथ करना चाहूंगा !ये घटनाएं आपको बतलायेंगी कि भारतीय राजनितिक दल ,उनके नेता और वामपंथी सोच वाला एवम कोंग्रेस द्वारा पोषित मीडिया हम भारत वासियों के बारे में क्या-क्या सोचता है !ये किस प्रकार से हम भारतवासियों पर षड्यन्त्र रचकर हम पर शासन करना चाहते हैं !ये हमारे रीती-रिवाजों,त्योहारों और परम्पराओं को तोडना चाहते हैं !ये हमारी न्याय-संगत बात को भी गलत साबित करना चाहते हैं !देखिये इन घटनाओं को फिर विचार कीजिये !
                      1. अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह दिखने के साथ साथ "चतुर"पत्रकारों द्वारा "वाम"सोच को सही साबित करना,वहां के "सात्विक-विरोध"प्रदर्शन को भारत के "तोड़-फोड़-प्रदर्शन"जैसा ही बताना जैसे कुत्सित प्रयास हुए हैं !कुछ मीडिया घराने आजकल स्वयं को "खुदा"समझने लगे हैं !उनको ये लगने लगा है कि हम जनता और कर्णधारों को जैसा चाहें वैसे चला सकते हैं !
               2. आरएसएस प्रचार-प्रमुख जी का सवाल पूछने पर उत्तर स्वरूप ,कही गयी एक न्यायसंगत बात को ऐसे प्रदर्शित करना और साथ-साथ विरोधी नेताओं के घर जाकर उनसे ऐसे ऐसे ब्यान दिलवाना, जिससे लगे कि पता नहीं "आरक्षण-प्राप्त"लोगों पर कोई पहाड़ टूट पड़ा हो !पत्रकारिता की क्या ये कोई नयी मिसाल है ?
                  3. बहन मायावती जी द्वारा नोटबन्दी के कारण ,महँगी चुनावी रैली नहीं कर पाने के कारण ,इस चालाक मीडिया ने ,उनकी "प्रेस-कांफ्रेंस"के नाम पर  न केवल चुनावी सभा करवादी बल्कि चुनाव आयोग की आँखों में मीडिया ने धूल झोंक दी ,और चुनाव आचार संहिता की भी धज्जियां उड़ा दीं !सर्वोच्च-न्यायालय को इस विषय पर अवश्य संज्ञान लेना चाहिए !
                 4. कुछ समय पहले तलक "राजस्थान-पत्रिका का वसुंधरा जी के साथ विज्ञापन देने-ना देने पर झगड़ा चल रहा था ,ये सर्वविदित है !लगता है जैसे अब समझौता हो गया हो !आज पूरे पेज विज्ञापनों से भरे हुए थे !क्या अब इस अखबार की दृष्टि में सब सही हो गया ?जबकि विज्ञापनों में बताई गयी योजनाओं का लाभ जनता के पास पहुँच ही नहीं रहा !ये हमने सर्वे में पाया है !
                       इन सब अलग अलग घटनाओं का सार ये समझने के लिए काफी है कि भारतीय मीडिया के एक पक्ष की चली "तो पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा हारेगी" और भाजपा के नेताओं और आरएसएस ने अपने कार्यकर्ताओं एवम अपनी योजनाओं पर "नज़र"नहीं रख्खी "तो भाजपा हारेगी"! "और अगर भाजपा हारी तो"भारत के सभी "नरभक्षी"इकठ्ठे हो जाएंगे !जनता को नोच-नोच कर खा जाएंगे !इसलिए मित्रो !हमें हमेशां सजग रहने की आवश्यकता है !हमारा दुश्मन हमारे बीच में ही छिपा हुआ है !आज हमीं को ये हौसला दिखाना पड़ेगा !जो भ्रष्टाचार के पक्ष में अपने विचार रख्खे उसे चिन्हित कर समाज से बाहर करें !चोर को चोर बड़े ही जोर से कहना होगा !नहीं तो ये छिपे हुए भेड़िये हमारी आनेवाली पीढ़ियों को जीने नहीं देंगे ! भाजपा के नेताओं से भी मेरी एक अपील है कि विज्ञापनों में लगने वाला धन अपने कार्यकर्ताओं को दो , वो प्रभावित तरीके से आपकी योजनाओं का ना केवल प्रचार करेंगे बल्कि आपकी योजनाएं कितनी कार्यन्वित हो रही हैं ये भी बताएँगे !अगर भाजपा ने अपने जमीनी कार्यकर्ताओं की "सार-संभाल"नहीं की "तो भाजपा हारेगी","और अगर भाजपा हारी तो"..... !!! दोबारा सत्ता में नहीं आ पायेगी !आखिर क्यों चाहिए उसे वर्षों तलक सत्ता?????क्या चन्द महीनों में एकमुश्त बदलाव लाकर नयी व्यवस्थाएं लागू नहीं की सकतीं?????आखिर किस बात से डरते हैं भाजपाई नेता ??जनता जवाब चाहती है ! जनता बदलाव चाहती है !!निकम्मे सांसदों,विधायको और मंत्रियो .. !समय का सदुपयोग करो !बाकी बचे 2 -3 वर्षों में दशकों जितना काम करो !मुख्य - धारा को बदलो !ताकि जनता कहे कि इनको ही जिताना है !लाओ कोई ऐसी व्यवस्था ,जो भुलादे पुराने "आरक्षण-सिस्टम" को !बनाओ कुछ ऐसे नए क़ानून जो ला दें इस देश में वही प्रेम-प्यार !बढादे सदाचार !पनपा दें भारतीय संस्कार !
          जय हिन्द !!जय भारत !! "अच्छे दिन आएंगे !
आपके अनमोल कॉमेंट्स का स्वागत है !





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Thursday, January 19, 2017

"धक्के के जनसेवक और शोषित कार्यकर्ता"!? - "परुपदेशक"

क्या भारत आज भी आजाद है ?क्या हम स्वयं अपने लिए कोई क़ानून बना या रद्द कर सकते है ?क्या हम अपने हित की कोई योजना बनाकर इस देश में लागू कर सकते हैं ?क्या हम किसी भ्रष्ट अफसर पर कोई कार्यवाही कर सकते हैं ?क्या हम किसी अच्छे आदमी को चुन या बुरे को हटा सकते हैं ? अगर नहीं तो क्यों हम इन 70 सालों में पनपे "नक़ली-जनसेवकों"की "चतुर-चालों"में फंस कर इनको ही घूम-फिर कर अपना "अनमोल-वोट"दे देते हैं ,फिर ये नेता रुपी राक्षस अपने रिश्तेदारों को हमारा खून पिलाते हैं !
                      सभी राजनीतिज्ञों के निष्ठावान कार्यकर्त्ता तो बेचारे दरियां बिछाते,भाषण देते नारे लगाते और वोट भुगताते ही रह जाते हैं !लेकिन जब समय चुनाव में टिकट देने का आता है ,तब ये नेता अपने कार्यकर्त्ता को छोड़ दुसरे को "जिताऊ"मानते हैं जो अपना दल छोड़ ,हमारी पार्टी में आया हुआ होता है !आखिर कौन होता है इस दलबदल के पीछे ??और कौन होता है उस राजनितिक दल के पीछे जो कुछ समय पहले अपना मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार को ही पीछे धकेलकर किसी दुसरे दल के साथ ही गठबंधन कर लेता है ?और फिर एक "राष्ट्रिय ऐतिहासिक राजनितिक दल " एक प्रादेशिक राजनितिक दल से 70 - 80 विधानसभा की टिकटें मांग रहा होता है !
                   कौन होता है उस बात के पीछे ,जब एक राष्ट्रिय हिंदुओं का रक्षक राजनितिक दल पंजाब में डरकर "आतंकवाद में मारे गए हिंदुओं"का हिसाब मांगने की बजाये ,उनसे ही गठबंधन कर लेता है और उनकी की गयी गलतियों को भी धोता और ढोता रहता है ?? क्या होता है उस फिकरे के पीछे "जब भ्रष्ट  राजनितिक दल "साम्प्रदायिक ताक़तों को रोकने"का हवाला देकर एक होने का नाटक करते हैं और अपना हिस्सा ना मिलने पर कुछ ही देर बाद अलग भी हो जाते हैं ?कौन सा कारण होता है उसके पीछे जब ये सब मिलकर अपनी तनख्वाह बढ़ा लेते हैं और संसद को चलने भी नहीं देते ?कौन सा कारण होता है जब हमारा सिपाही तो कई प्रकार की "कमियां"झेलते हुए इस देश पर कुर्बान हो जाता है और ये हमारे नेता कुछ ना करते हुए संसद में बढ़िया भोजन करते रहते हैं , सुविधाएँ प्राप्त करते रहते हैं ??
                              पांच राज्यों के चुनाव में मित्रो चाहे कोई जीते या हारे ,इन निकम्मों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला जी !ये सब बातें इनके चापलूस पत्रकारों द्वारा घड़ी जाती हैं जी !नतीजे आने के कुछ दिनों बाद सब भूल जाते हैं !दरअसल में कोंग्रेस ने सारा ढांचा ही इस प्रकार का बना दिया है ,जिसमे "गन्दगी"के इलावा कुछ भी सम्भव नहीं है !और भाजपा वाले इस खेल के बड़े खिलाड़ी बन गए हैं !कोंग्रेस-कॉमरेड इस अपने ही बनाये गए खेल के "फिसड्डी"खिलाड़ी साबित हो रहे हैं !केवल कोई "तानाशाह"ही इसको सही कर सकता है !अन्यथा मौजूदा लोकतान्त्रिक तरीके से सुधार लाने पर कई प्रकार कीं अड़चने आ जाती हैं जैसेकि  "जांचें-आयोग ,धरने-प्रदर्शन और नियम-क़ानून"इतनी मुश्किलें खड़ी कर देती हैं कि सब "जुमले"बनकर रह जाते हैं !
जय हो !! "अच्छे दिन आएंगे"?????
  





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Monday, January 16, 2017

"अलग विचारधारा"या देश-द्रोह ? - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र-टिप्पणीकार) मो.न. - +9414657511

अलग विचार धाराएं भारत में आज से नहीं तबसे हैं जब से सृष्टि ने इसका निर्माण किया था !सबकी बातें सुनी जाती थीं , सुनी जाती हैं और सुनी जाती रहेंगी इस भारत में !लेकिन इस तथाकथित विचारधारा के नामपर देश को तोडने का काम और स्वयं को सत्ता में स्थापित करने का कुत्सित प्रयास जबसे होने लगा तो इसका भरपूर विरोध भी भारत में होने लगा !ये भी एक कटु स्तय है !लेकिन इन नए "विचारकों" ने बड़ी ही चतुराई से पहले मुस्लिम शासकों , फिर अँगरेज़ शासकों के धर्म को भारत में मान्यता दिलाने के प्रयास में मदद देने का लालच देकर अपने लिए उनकी नज़रों में एक विशेष स्थान बना लिया !
                            एक "फार्मूला"ये बन गया कि वो इनको धन और सन्मान देते थे ,स्मृति चिन्हों के साथ ऊंचे स्थान सत्ता में देते थे , उसके बदले में ये भारत के हिंदुओं को उसकी संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं से बड़ी "दूर" ले गए !इस छिपे हुए मिशन के कार्यकर्ताओं की वेशभूषा ठेठ भारतीय होती है , जैसे इनकी महिला-कार्यकर्ता मोटी बिंदियाँ लगाती हैं,सूती वस्त्र पहनती हैं और सूखे सफेद बाल लहराकर चलती हैं तो वहीँ पुरुष कार्यकर्ता भी सादे वस्त्र लेकिन घातक-विचारों से भरे हुए होते थे !ये लोग अक्सर गरीब मजदूरों,जन-जाति के भोले-भाले लोगों को ही पहले अपना निशाना बनाते हैं , फिर छात्रों को और अंत में भोले-भाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भड़काकर देश की "प्रगति"को रोकने का प्रयास करते रहते हैं !
                          आपने ये तो सूना होगा कि किसी कॉमरेड लीडर या संस्था ने कोई "बन्द"का ऐलान कर दिया हो या हड़ताल करवा दी हो , लेकिन ये कभी नहीं सुना होगा की किसी कॉमरेड ने देशहित में ज्यादा काम करने की सलाह दी हो , या कोई कार्यक्रम चलाया हो ! इनके नेता संसद की कार्यवाहियां रोकते हैं , वर्कर गाड़ियाँ रोकते हैं ,तोड़फोड़ करते हैं तो इनके शिक्षाविद और पत्रकार बड़े विद्वता से भरे विचारों से देश और समाज को तोड़ने का काम करते हैं !इसीलिए ये लोग भारत को जोड़ने वाले संगठनों को "साम्प्रदायिक-ताक़तें"कहते हैं !धर्म से चलने वाली कोई भी चीज़ भला "घातक" कैसे हो सकती है जी ??
                       लेकिन हमारे भारत की भोली-भाली  जनता को  जिसे ये चालाक लोग "बुद्धिमान-जनता" कहते हैं , बड़ी ही चतुराई से बेवकूफ बनाते रहते हैं !और हम बेवक़ूफ़ बनते रहते हैं जी !पता नहीं कब हमें अक्ल आएगी ?एक बार हम अक्ल का प्रयोग कर लेते हैं तो कुछ समय पश्चात हमें हमारा ही निर्णय गलत लगने लगता है इनकी चतुराई भरी बातें और तर्क सुनकर !भारत काफी बड़ा देश है इसलिए कोई भी नेता सारे क्षेत्र पर अपना काबू नहीं पा सकता !ये चोर और ड्रामेबाज़ लोग अपने कुत्सित इरादों में सफल हो जाते हैं !
होशियार - खबरदार !! जागते रहो वैचारिक दृष्टि से भारतवासियो !जय - हिन्द जय भारत !!




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Thursday, January 12, 2017

अंधेरे में रौशनी की खोज करता हिन्दुस्तान !!! ????

कोई कह रहा है-आर्थिक इमरजेन्सी । तो कोई फाइनेंशियल इमरजेन्सी तो कोई सुपर इमरजेन्सी भी कहने से नहीं चूक रहा है । तो क्या 1975 के आपातकाल के आगे के दौर को मौजूदा वक्त के खांचे में देखा जा रहा है । या फिर नोटबंदी प्रधानमंत्री मोदी का ऐसा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है, जिसके दायरे में हर राजनीति सिमट गई है और हर तरह की राजनीति के केन्द्र में प्रधानमंत्री मोदी आ खड़े हुये हैं। या फिर इमरजेन्सी शब्द को विपक्ष अब इस तरह क्वाइन कर रहा है, जिससे इंदिरा गांधी की इमरजेन्सी के सामानांतर मोदी की इमरजेन्सी घुमडने लगे। याद कीजिये इमरजेन्सी के खिलाफ जेपी के संघर्ष को खारिज करने के लिये इंदिरा गांधी विनोबा भावे की शरण में गई थीं। और जेपी ने जब संपूर्ण क्राति का आंदोलन छेड़ा तो विनोबा भावे से कागज पर इमरजेन्सी को इंदिरा गांधी ने अनुशासन पर्व लिखवा लिया। लेकिन मौजूदा वक्त में ना तो जेपी सरीखा कोई संघर्ष है और ना ही नैतिक बल लिये विनोबा भावे । और 1975 में तो संघ परिवार भी जेपी के पीछे जा खडा हुआ था । और जिस बीजेपी के पास मौजूदा वक्त में सत्ता हैा उनके तमाम नेता इंदिरा की इमरजेन्सी में संघर्ष करते हुये ही पहचान बना पाये । तो क्या मौजूदा वक्त में जब कांग्रेस से लेकर ममता और मायावती से लेकर अखिलेश या केजरीवाल भी नोटबंदी के दायरे में इमरजेन्सी शब्द का जिक्र कर रहे हैं तो तीन सवाल हैं।

पहला क्या इमरजेन्सी शब्द मोदी की सत्ता के साथ टैग करने भर का सवाल है । दूसरा, क्या इमरजेंसी शब्द के जरीये भ्रष्टाचार और कालेधन को दबाना है । तीसरा , क्या इमरेन्सी शब्द के जरीये ही राजनीतिक सत्ता पलटी जा सकती है । जाहिर है तीनों हालात राजनीति कठघरा ही बनाते हैं। लेकिन जब इक्नामिक इमरजे्न्सी का जिक्र देश में चल पडा है तो याद कीजिये 1974-75 में इंदिरा गांधी के करप्शन के खिलाफ ही जेपी ने संघर्ष छेडा था । और मौजूदा वक्त में सत्ता के करप्शन का सवाल सुप्रीम कोर्ट के दायरे में ही खारिज हो रहा है । यानी एक वक्त जैन हवाला के पन्नों पर आडवाणी ने इस्तीफा दे दिया । तो सहारा-बिरला के दस्तावेजों को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना । राजनीति में भी नैतिकता गायब हो गई । तो क्या करप्शन की परिभाषा भी मौजूदा दौर में बदल रही है । या करप्शन के खिलाफ कोई भी कार्रवाई राजनीतिक तौर इमरजेन्सी शब्द से जोडना आसान है ।मसलन ममता की सत्ता पर करप्शन के लगे दाग पर सीबीआई की कार्रवाई के खिलाफ टीएमसी राष्ट्रपति से मिलकर लौटती है, तो सुपर इमरजेन्सी शब्द उछालती है। 

तो क्या नोटबंदी से मुश्किल में आती मोदी सरकार के सामने अब चुनी हुई सत्ता के करप्शन के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी छवि साफ रखना जरुरी हो चला है । यानी इमरजेन्सी के हालात राजनीतिक टकराव के उस मुहाने पर देश को ले जा रहे है जहा अच्छे दिन का मतलब होता क्या है इसे हर कोई मिल जाये । और इसीलिये 2014 में अच्छे दिन का सपना मोदी ने दिखाया । क्योंकि मनमोहन की सत्ता भ्रष्ट हो चली थी । और 2017 की शुरुआत ही राहुल गांधी ने अच्छे दिन का सपना 2019 तक के लिये मुल्तवी कर दिया जब कांग्रेस सत्ता में आ जायेगी । तो क्या इमरेजन्सी शब्द के बाद अच्छे दिन का नारा भी एक ऐसा शब्द हो चुका है जो राजनीति सत्ता को चुनौतीदे सकता है 

 या फिर 2014 में जिन शब्दों ने सत्ता पलट दी अब वही शब्द सत्ता के लिये गले की हड्डी बन रहे है । या फिर अच्छे दिन की परिभाषा अपनी सुविधानुसार सत्ता और विपक्ष दोनों ही गढ रहे हैं। चिदंबरम घातक

मानते है तो जेटली एतिहासिक कदम । दोनों ही वित्त मंत्री । एक ही देश के लिये देखने का दो नजरिया है । तो ऐसे में सवाल इक्नामी का नही सियासत का ही ज्यादा होगा । और सियासत की इस चौसर में -कौन सा पांसा किस राजनीतिक दल को लाभ दे दें। या -कौन सा पांसा पंरपारिक राजनीति को ही उलट दें । या फिर कौन सा पांसा राष्ट्रनिर्माण के सपने तले वर्ग संघर्ष के हालात पैदा कर दें । यानी गरीबों के लिये इक्नामी में कौन सी भागेदारी रोजगार पैदा करती है इसका कोई विजन आजतक किसी सत्ता ने नहीं बताया । किसान को लागत से
ज्यादा देने का वादा सरकार क्यों नहीं कर पाती ये भी अबूझ पहेली है । और देश में असमानता की खाई कैसे कम होते हुये खत्म हो इसकी कोई दृश्टी किसी उक्नामिक प्रयोग में या बजट में उभर नहीं पाती है । तो क्या देश में अच्छे दिन शब्द भी सियासी सपने से ज्यादा कुछ नहीं है । क्या अच्छे दिन की चाहत में सिर्फ सत्ता बदलने का ख्वाब पालना देश का फेल होना है । क्योंकि अच्चे दिन का जिक्र चाहे 2014 में हुआ हो या 2017 में । दोनों
हालातों में ये समझान भी जरुरी है कि देश के संस्धानों को ही राजनीतिक सत्ता ने 2014 से पहले मनमोहन सिंह ने हड़पा और अब मोदी सरकार हडप रही है । और बीजेपी 2014 तक ये आरोप लगा रही थी । तो काग्रेस अब ये आरोप लगा रही है । यानी अच्छे दिन लाने के लिये देश में जिन संस्थानों को काम करना है दजब उन्ही संस्थानो का राजनीतिकरण राजनीतिक मुनाफे के लिये कर दिया जाता हो तो फिर अच्छे दिन किसके आयेगें । जाहिर है जनता के लिये तो अच्छे दिन हर सत्ता में मुश्किल है । और शायद उलझन इसी को लेकर है कि रास्ता देश का
सही है कौन सा । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस वक्त कारपोरेट के बीच बैठकर गुजरात वाइब्रेंट समिट में नीतियों और अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की वकालत कर रहे थे उस वक्त सिंगूर के किसान खासे खुश थे
कि अब उन्हे अपनी जमीन मिल जायेगी । तो क्या जिस बाजार इक्नामी के दायरे में एसईजेड बनाने की बात मनमोहन सिंह के दौर में हो रही थी । और जिस वक्त नैनो कार को सिंगूर में जगह नहीं मिली उसे गुजरात में जमीन तब सीएम रहते हुये मोदी ने ही दी । और अब सु्परीम कोर्ट ने जब 7 राज्यो को सेज पर नोटिस दे दिया है तो क्या इक्नामी का रास्ता हो क्या देश इसी में जा उलझा है । क्योकि एक तरफ वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने ब्लॉग में लिखते है मोदी ने नोटबंदी के जरिए अर्थव्यवस्था में पीढ़ीगत बदलाव कर दिया है। और दूसरी तरफ दुनिया की तीन बड़े रेटिंग एजेंसियों में एक " फिच " ने कल ही कहा है कि बड़े फायदे के लिए कुछ देर का परेशानी का सरकार का दावा अनिश्चित है । तो न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार ने तो अपनी संपादकीय
टिप्पणी में यहां तक लिख दिया कि, " क्रूरतापूर्वक बनाए और लागू किए गए नोटबंदी के फैसले ने आम लोगों की जिंदगी को काफी कठिन बना दिया है। इसके बहुत कम सबूत हैं कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिली है और ना इस बात की गारंटी है कि इस तरह के क्रियाकलापों पर भविष्य में रोक लग पाएगी,जब सिस्टम में कैश वापस आ जाएगा। और नोटबंदी के फैसले से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा है। " तो बाईब्रेट गुजरात के जरीये इक्नामी को समझा जाये । या नोटबंदी से ढहती बाजार इक्नामी को सही माना जाये ।क्योंकि सच यही है किनोटबंदी से दिसंबर में वाहनों की बिक्री 18.66 फीसदी गिर गई। ये 16 साल में सबसे बड़ी गिरावट है । जनवरी से मार्च में बिजनेस कॉन्फिडेंस 65.4 दर्ज हुआ,जो आठ साल में सबसे कम है । दिसंबर तिमाही में 8 बड़े शहरों में घरों की बिक्री 44 फीसदी गिरी,जो आठ साल में सबसे कम है । डॉलर के मुकाबले रुपया मोदी सरकार के काल में सबसे निचले स्तर को छू रहा है । असंगठित क्षेत्र के 14 करोड़ लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हुआ है,जिन्हें नौकरी वापस दिलाने को लेकर फिलहाल कोई योजना सरकार के पास नहीं है । यानी नोटबंदी के बाद के हालात ने नया सवाल ये तो खडा कर ही दिया है कि आखिर इक्नामी के रास्ते बाईब्रेट गुजारात की
चकाचौंध पर चलेंगे । या नोटबंदी के अंधेरे के बाद रोशनी आयेगी । या फेल होते सेज तले आखिर में देश को कार या सरकार पर नहीं किसानी पर ही लौटना पडेगा ।

Wednesday, January 11, 2017

जय जवान जय किसान का नारा कैसे लगायें ??????

अजीब संयोग है कि 11 जनवरी को देश के उसी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि है, जिसने देश को जय जवान जय किसान का नारा दिया। और शास्त्रीजी की 51वीं पुण्यतिथि के मौके पर ये सवाल उठ रहा है कि सीमा पर तैनात जवान को भी सूखी रोटी और नमक-हल्दी में रंगे पानी में दाल मिलती है और हर पांच घंटे में एक किसान खुदकुशी क्यों कर लेता है। तो कोई भी कह सकता है कि जय जवान जय किसान का नारा चाहे हिन्दुस्तान की रगों में आज भी दौ़ड़ता हो। और साढे तीन लाख जवानों की तादाद बीते 70 बरस में बढ़कर 47 लाख हो चुकी। और इसी तरह किसानों की तादाद भी 11 करोड़ से बढ़कर चाहे आज 21 करोड़ हो चुकी हो। लेकिन सच यही है ना तो जय जवान का नारा लगाते हुये बीते 70 बरस के दौर में कभी जवानों की जिन्दगी की भीतर झांकने की कोशिश किसी भी सरकार ने की और ना ही किसान को राहत पैकेज से आगे बढ़ाने की कोई

कोशिश बीते 70 बरस के दौर में किसी सरकार ने की। प्रति दिन प्रति जवान के भोजन पर 100 रुपये सरकार खर्च करती है। और प्रति किसान की औसत आय देश में प्रति दिन 40 रुपये से आगे बढ़ नहीं पायी है। यानी दुनिया के सबसे बडा लोकतांत्रिक देश के भीतर का सच कितना डराने वाला है, ये इससे भी समझा जा सकता कि एक तरफ किसान पीढ़ियों से पसीना बहाकर देश को अन्न खिला रहा है और जवान सीमा पर प्रहरी बनकर पिढियो से देश की रक्षा कर रहा है लेकिन जब आर्थिक-सामाजिक दायरे में जय जवान जय किसान का जिक्र होता है तो दोनों के ही परिवार गरीबी की रेखा के सामानातंर खडे नजर आते है । क्योकि देश में असमानता की खाई इतनी चौड़ी है कि एक तरफ औसतम प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय 295 रुपये बैठती है। जबकि 35 रुपये रोज के दायरे देश के 37 करोड़ नागरिक आ जाते है। 

और ऐसा नहीं है कि सरकारें समझती नहीं। चाहे सत्ता हो या विपक्ष। दोनों की बातो को सुनिये तो आप महसूस करेंगे कि गरीबों की किसान-मजदूरों के हालात भी सत्ता को पता है। और देश की संपत्ति चंद हथेलियों में सिमटी हुई है ये भी विपक्ष को पता है। बावजूद इसके ना जवान की हालत ठीक होती है ना किसान मालामाल होता है। तो ये समझना जरुरी है कि किसी भी सरकार ने बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कोई काम किया भी है या नहीं। क्योंकि जवानों का वेतन नौ हजार रुपये पार नहीं करता और किसानों की आय छह हजार से ज्यादा होती नहीं। और बीते 70 बरस के दौर में किसानी गले की फांस बनती है । तो किसान का बेटा ही सेना में जवान के तौर पर जाकर सीमा की रक्षा करता है। आंकडें बताते है कि सेना में 72 फिसदी जवान किसान परिवार से ही आते हैं। और संयोग देखिये पुंछ में तैनात जिस जवान ने खाने का कच्चा-चिट्टा मोबाइल में कैदकर देश को दिखा दिया। उसके पिता भी किसान हो और दादाजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में जवान थे। और उसके घर की माली हालात देखकर या सीमा पर तैनाती में मिलती रोटी- दाल देखकर अगर जय जवान जय किसान का नारा लगा सकते है तो लगाईये। लेकिन उससे पहले देश के सच को भी समझ लीजिये और फिर सोचिये कि जस जवान जय किसान तो दूर देश में जब न्यनतम इन्फ्रस्ट्रक्चर किसी भी क्षेत्र में नहीं है तो फिर जवान को कौन देखे या किसान का जिक्र कौन करें । क्योंकि 67 फिसदी जमीन पर सिंचाई होती नहीं। 72 फिसदी गांव में पीने का साफ पानी नहीं। 77 फिसदी देश को 24 घंटे बिजली का इंतजार आज भी है। सिर्फ 12 फिसदी आबादी को ढोने वाला पब्लिक ट्रास्पोर्ट सिस्टम खड़ा हो पाया है। 81 फिसदी आबादी के लिये सरकारी अस्पताल उपब्लध नहीं है। 72 फिसदी शहरी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते नहीं। न्यूनतम मजदूरी कोई ठेकेदार देता नहीं। रोजगार है नहीं । तो क्या जिस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हर सत्ता को ध्यान को ध्यान देना चाहिये उसने उसी से आंखे मूंद रखी हैं। और नोटबंदी के बाद देश के सोशल इंडेक्स चाहे नीचे चला गया हो। 

लेकिन उन हालातों को समझना जरुरी है कि आखिर क्यों नोटबंदी हो या कोई भी आर्थिक नीति देश को एक समान एक हालात में क्यों खड़ा नहीं कर सकती और करप्शन देश की रगों में क्यों दौड़ेगा। मसलन करप्शन भी जरुरत भी जीने के हालात से कैसे जोड़ दिया गया जब सरकार बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर भी देश को नहीं दे पा रहे है तो सिचाई के लिये पंप चाहिये , बिजली के लिये जेनरेटर-इनवर्टर चाहिये, -इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल चाहिये, शिक्षा के लिये कान्वेंट स्कूल चाहिये , सफर के लिये निजी गाडी चाहिये, मजदूरी के लिये ठेकेदार की गुलामी करने पड़े तो न्यूनत मजदूरी कौन देगा । यानी जब सरकार ही जनता की न्यूनतम जरुरतो को पूरा करना तक अपनी जिम्मेदारी ना मान रही हो तब होगा क्या टैक्स चोरी,करप्शन ,ज्यादा कमाई के लिये किसी भी हद तक जाने की चाहत और देश के मिजाज में जब ये हालात जुड जायेंगे तो क्या सेना भी इससे अछूत रह पायेगी। ये सवाल इसलिये क्योकि जिस जवान ने रोटी-दाल के सच को उभारा उस रोटी दाल के पीछेका सच ये भी है कि सेना के लिये तो आर्मी सप्लाई कोर है। लेकिन पैरा मिलिट्री फोर्स के लिये गृह मंत्रालय हर सेक्टर को बजट की रकम देता है। यानी जवान जब सिनियर अधिकारियों की लूट का जिक्र कर रहा है। तो साफ है कि हर सेक्टर में बटालिनों के जवानो के लिये जो बजट आता है। उस बजट से अनाज खरीद हर सेक्टर के अधिकारी करते हैं। और सीएजी ने 2010 और 2016 में अपनी रिपोर्ट में सप्लाई की इसी चेन में गडबड़ी का जिक्र किया।



"5th पिल्लर करप्शन किल्लर" "लेखक-विश्लेषक पीताम्बर दत्त शर्मा " वो ब्लॉग जिसे आप रोजाना पढना,शेयर करना और कोमेंट करना चाहेंगे ! link -www.pitamberduttsharma.blogspot.com मोबाईल न. + 9414657511

Monday, January 9, 2017

"मुलायम की "मुलायम - चाल"!!-पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतंत्र-टिप्पणीकार) मो.न.+ 9414657511

समाजवादी उसे कहते हैं जो सभी लोगों का बराबर ध्यान रख्खे,जाति-पाति,धर्म और इलाकेवाद में कोई भेदभाव ना बरते !लेकिन उत्तर प्रदेश के तथाकथित समाजवादी अब अपना धर्म भूल कर जनता को बरगलाने का काम कर रहे हैं !केवल अपने परिवार की चिंता करते नजर आ रहे हैं !अपनी विचारधारा को सभी राजनीतिक दल कभिका त्याग चुके हैं !कोंग्रेस केवल घोटाले करके बराबर-बराबर हिस्से बांटने में विश्वास करने लगी है ,कम्युनिस्ट लोग मेहनतकश का साथ छोड़ ,सत्ता पाने के लिए लालायित नज़र ज्यादा आते हैं तो क्षेत्रीय दल केवल एक परिवार का ही शासन चले इसी फ़िराक में लगे रहते हैं !वहीँ "अलग"किस्म की पार्टी नज़र आने वाली भाजपा भी कभी देशभक्ति करती नजर आती है तो उसके कई नेता सबसे बड़े बेईमान भी नज़र आते हैं !"राम मन्दिर बनाने की कसम खाने वाले "आधे तो बेचारे राम को प्यारे हो गए , या फिर "मार्ग-दर्शक"बना दिए गए !बेचारे मोदी जी अकेले दस-पन्द्रह लोगों के साथ क्या और कितना कर पाएंगे ये भी देखने की बात होगी !जनता सब जानती है शायद इसीलिए मोदी जी को अपना भरपूर समर्थन दे रही है !
                         राहुल गांधी ने ऐसा तीर छोड़ा है कि उनके दोनों हाथों में लड्डू आने की सम्भावना है , उन्होंने धीरे से ऐसी चाल चल दी है किअगर मुलायम-अखिलेश एक हुए तो इतना "ड्रामा"हो चुकाहै कि जनता उन्हें अपने वोट नहीं देगी ,और अगर अखिलेश बापू को छोड़ भैया से हाथ मिलाकर चुनावों में गए तो कोंग्रेस अपने को बड़ा साबित करने में लग जायेगी !क्योंकि उनकी भी वोट प्रतिशत बढ़ जायेगी ना !!समझते नहीं हो आप !!शीला जी तो पहले ही अपना दावा छोड़ चुकी हैं !और राज बब्बर साहिब तो एक आधा "डायलोग"मारने के ही आदि हैं जी !बड़े रोल वो फिल्मों में ही नहीं कर पाते आजकल तो राजनीति में उनसे बड़े कई नेता हैं जी उत्तर-प्रदेश में !
                          बहनजी हमारी बेचारी "माया"बदलवाने के चक्कर में ही उलझी पड़ी हैं !सारी टिकटें बाँट कर फ्री हो गयी हैं !दावेदार अपने-अपने क्षेत्र में घूमने चालु हो गए हैं लेकिन जनता उन्हें भाव नहीं दे रही है !क्योंकि खिलाने-पिलाने को कुछ है नहीं बेचारों के पास !अब चाहे कोई भी जाति का हो , वोटर खायेगा-पिएगा नहीं तो "गीत कैसे गायेगा "?बताइये आप बरसों पुरानी आदतें एक साथ तो नहीं बदलतीं ना जी !!
                              मुलायम जी कुछ मुलायम इसलिए भी हुए हैं की आज़म भाई ने समझाया है कि अपने साथ हमें भी क्यों "राजनितिक-बनवास"दिलाने को तुले हो मित्र !!मुलायम हो जाओ !लेकिन अब "राम और गोपाल चाचा के कहने पर अखिलेश सख्त हो गए हैं !राहुल भैया ने जो "मुंगेरी लाल के हसीं सपने " जो उन्हें दिखा दिए हैं जी !!
 इसलिए "मुलायम की "मुलायम - चाल"!!
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मेरी सुपुत्री सुकुमारी सुकृति शर्मा , जिसका आज जन्मदिन है - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र-टिप्पणीकार)

प्रिय मित्रो ! आज मेरी प्यारी बेटी "सुकृति शर्मा काजन्मदिन है !वो पहले "ज़ी टीवी ग्रुप" नॉएडा में और आजकल "पत्रिका राजस्थान" के टीवी चेनेल में प्रोड्यूसर एवम एंकर के पद पर जयपुर में कार्यरत है !आपके आशिर्वाद से अगले महीने दिनांक 23 फरवरी 2017 को उसकी पटना में शादी है !भगवत कृपा से बहुत ही बढ़िया परिवार हमें मिला है !मेरी बेटी पर मुझे नाज़ है !उसने अपने माता-पिता का नाम रोशन किया है !भगवान ऐसी बुद्धिवान बेटियां सबको दे !
                 ये सब यहां लिखने का तातपर्य केवल इतना ही है ताकि इसको पढ़कर लोग और ज्यादा अपनी बेटियों का सन्मान करना,उन्हें पढना-लिखाना और उच्चस्तर पर पहुँचता देखें !आपके आशिर्वाद की भी अत्यंत आवश्यकता है जी उसे !सधन्यवाद !!
                                   आपका मित्र ,
                                      पीताम्बर दत्त 



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Saturday, January 7, 2017

"सेक्स की भूख से पगलाए "कुत्तों"की राक्षसी छेड़छाड़"!त्रस्त समाज ! - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)- +9414657511

सभी विद्वत्जन कहते हैं कि इंसान को परमात्मा ने "बुद्धि"दी है इसलिए ताकि वो जान सके कि वो कौन हैं?क्यूँ है कहाँ से आया है ?कहाँ जाएगा?उसे इस जीवन में क्या करना है ?क्या नहीं करना है?क्यों बार बार आता है?और कैसे वो इस आने-जाने के चक्कर से "छुटकारा"पा सकता है !पश्चिमी वैज्ञानिक लोग तो मानते हैं कि "मानव पहले बन्दर"था धीरे-धीरे वह मनुष्य बन गया !लेकिन एशियाई देशों में इंसान का इतिहास अलग-अलग बताया जाता है !ज्यादा धार्मिक ग्रंथों में जाकर आपको बोर नहीं करना चाहता , इसलिए इतना ही बताता हूँ कि हमारे मास्टर जी तो किसी को "कुत्ते का बच्चा",किसी को खोते दा  पुत्तर"बताते रहते थे !लड़कियों को कुछ भी नहीं कहा जाता था ,हालांकि वो लड़कों से ज्यादा शरारतें करतीं थी !जैसे आज चेनलों के एंकर,महिला-आयोग की महिलाएं,अखबार के सम्पादक और "महान-नेता"किसी भी "अभद्र-महिला"को कुछ भी नहीं कहने देते !टीवी 24 ने तो ऐसी महिलाओं की रक्षा करने हेतु अपने पैनल में "हार्ड-कौर"नामक महिला को भी बुला रख्खा था एक बहस के कार्यक्रम में , जिसने भरपुर शराब पी रख्खी थी !बहरहाल !मुद्दे पर आते हैं !
                     मैंने ये भी देखा कि जिन बातों के बोलने पर मर्दों को कोसा जा रहा था , वही बचाव के तरीके और सुझाव एक महिला ndtv के प्राइम-टाइम में दे रही थी तो बहुत तारीफ़ हो रही थी !ये भी एक समस्या है आजकल !कोई भी बात कहने से पहले मैं ये कहना चाहूंगा कि पहले हमें ये तय करना पड़ेगा कि हम आधुनिकता में जिन चाहते हैं या हिन्दू संस्कृति के अनुसार !यहाँ हिन्दू का मतलब सभी एशियाई धर्मों से है! यानी जीवन पद्धिति से !
                                          अगर तो हमें पाश्चात्य संस्कृति पसन्द है तो फिर हमें अपने दिमाग की सोच को पूरी तरह से ना केवल बदलना होगा बल्कि "हिन्दू जीवन पद्धिति"क्या थी ?ये भी भूलना पड़ेगा जी ! दोनों हाथों में "लड्डू" लेकर नहीं इस बात का निर्णय किया जा सकता !क्योंकि दोनों संस्कृतियां बिलकुल ना केवल अलग हैं बल्कि कभी ना मिलने वाली भी हैं !एक पद्धिति सेक्स को जीवन की अमूल्य वस्तु मानते हुए ,इसे समय पर और सूयोग्य साथी के साथ ही उपयोग करने हेतु कहती है तो दूसरी इसे केवल आनन्द का विषय मानकर जब भी,जैसे-कैसे भी  और किसी के साथ भी सेक्स करने की आजादी देती है !ना कोई उम्र का लिहाज और ना ही किसी रिश्ते का ख्याल रख्खा जाता है !हाँ !! एक समानता अवश्य है दोनों में , वो ये कि जबरदस्ती कहीं भी मान्य नहीं है !  
                                    अब आते हैं हाल ही में हुई उन घटनाओं की तरफ जो पाश्चात्य नववर्ष की रात्रि के आस-पास हुई हैं !अपराधियों ने क्या सोचकर ये सब किया ? क्या वो उन लड़कियों के साथ पहले से परिचित थे ?दोनों का किस संस्कृति की तरफ झुकाव था ? ये सब सवालों और इन जैसे अन्य सवालों को जाने बिना हम अगर केवल लड़कों को ही दोषी मान लेने की आदत दाल लेंगे तो "न्याय"नहीं हो पायेगा जी !"पशुता"का कोई भी बुद्धिजीवी समर्थक नहीं हो सकता ,उन्हें भारतीय संविधानुसार सज़ा अवश्य मिलनी चाहिए ! लेकिन क्या लडकियां बिलकुल "दूध की धुली"हुई होती हैं हमेशां ही !उनकी बात कोई कब और कौन करेगा ?क्या हम "त्रिया-चरित्र"को भूल जाएँ!क्या मर्द लोग इस बीमारी के भुक्त भोगी नहीं हैं ?क्या महिलाओं द्वारा किये गए अपराधों की संख्या शून्य है ?
                              अगर नहीं तो ये पत्रकार,नेता,महिला-आयोग की महिलाएं, टीवी एंकर और सम्पादक लोग ड्रामे क्यों करते रहते हैं ?क्या जनता को बेवकूफ बनाना ही इनका काम रह गया है ?क्यों ये ऐसे लोगों के समर्थक नज़र आते हैं जो भारतवासियों को भारतीय संस्कृति के अनुसार रहने नहीं देना चाहते ?क्यों वामपंथी और कोंग्रेस्सी विचारधारा हिंदुओं पर पिछले 70 सालों से थोपी जा रही है !क्यों आतंकवाद की मदद से भारत को एक मुस्लिम या ईसाई देश बनाया जा रहा है ?क्या भारत का कोई क़ानून ऐसे गन्दे विचारों वाले लोगों के लिए नहीं है जो सोचते हैं कि  हम पत्रकारिता से,लॉखों-कविताओं से,फिल्मों-विज्ञापनों से और झूठे इतिहास लिखने-पढ़ाने से इस पवित्र भारत को गन्दा कर रहे हैं ??
आप अपने अनमोल विचारों से मुझे अवश्य अवगत करवाएं !
  जय - हिन्द , जय भारत और वन्दे - मातरम !


प्रिय मित्रो , 
सादर नमस्कार !!
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सधन्यवाद !!
आपका प्रिय मित्र ,
पीताम्बर दत्त शर्मा,
हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार,
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जिला-श्री गंगानगर।

"मीडिया"जो आजकल अपनी बुद्धि से नहीं चलता ? - पीताम्बर दत्त शर्मा {लेखक-विश्लेषक}

किसी ज़माने में पत्रकारों को "ब्राह्मण"का दर्ज़ा दिया जाता था और उनके कार्य को "ब्रह्मणत्व"का ! क्योंकि इनके कार्य समाज,द...