हम अपने "गुरु"जी को कितना जानते-पहचानते हैं और क्या हम उनका "कहा"मानते भी हैं ?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511 .

मित्रो !! आजकल टीवी चैनलों में तथाकथित "गुरुओं" के बारे में बहुत कुछ दिखाया, समझाया और बताया जा रहा है ! उनके गवाह भी पता नहीं कहाँ -कहाँ से आकर , अपना "ज्ञान" दिखा,सुना और बोलकर बता जाते हैं ?? वैसे तो सनातन धर्म "गुरुओं,देवताओं,देवियों और राक्षसों" से भरा पड़ा है ! जितने चाहो -जैसे चाहो वैसे ही गुरु और भगवान आपको और हमको मिल जाएंगे ! लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों हमें "वर्तमान"में जन्मे गुरु की "सेवा" करने की बड़ी ही इच्छा रहती है !??
                     मैं बदनाम हुए या जेल में पंहुच चुके "गुरुओं"की महिमा का बखान या कोई बुराई , अपने इस लेख में करके अपनी "T.R.P."नहीं बढ़ाना चाहता हूँ ! मैं तो सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि इन जैसों की आवश्यकता ही क्यों महसूस होती है ! आप सब अपने अंतर्मन में झाँक कर स्वयं ही इसका उत्तर मुझे और अपने आप को बताएं जी ! मैं तो अपने अंतर्मन की बात आपसे साँझा कर सकता हूँ !जो ये है -:
                         मैं एक ब्राह्मण परिवार में जन्मा व्यक्ति हूँ !मेरे माता-पिता ने सनातन धर्म का प्रचार करने का काम भी किया है ! इस कारण से मुझे  बताया गया है कि हर इंसान का पहला गुरु उसकी माता , दूसरा गुरु उसका पिता, तीसरा गुरु उसका शिक्षक होता है ! उसके बाद जो कोई जितनी "कलाओं" में निपुण होना चाहे उसे उतने ही गुरुओं की आवश्यकता पड़ती है ! इसी तरह से शायद सबका जीवन चलता है !
                               आगे चल कर जब उसे स्वर्ग जाने और नरक में ना जाने की चिंता सताने लगती है अपने कर्मों के कारण , तो वो परमात्मा से मिलने हेतु किसी धार्मिक गुरु की तलाश करता है ! जिस के लिए वो जिस घर में जन्मा है, उसी घर वालों के धर्म का ही गुरु तलाशना "आसान समझता है !बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो जन्मे तो किसी धर्म वाले घर में और शिष्य बनें किसी और धर्म के गुरु का ! हाँ !! लालच और बहलाकर अवश्य ऐसे लोगों की संख्या अवश्य बढ़ायी जा सकती है !
                            हमारे सनातन धर्म में तो स्पष्ट लिखा गया है कि " गुरु और शिष्य , दोनों एक दुसरे को ठोक-बजाकर  ही अपनाएं " !! फिर भी ई कलयुग में ना जाने कैसे कैसे चेले और गुरुओं से पाला पड़ जाता है जी !! भगवान ही बचाये इन "करामाती-खुराफाती"गुरुओं और उनसे भी खतरनाक उनके चेलों से ! भैया !वैसे ये भी देखने में आया है कि होशियार "चेले"तो गुरु को धत्ता बताकर अपनी नयी "दूकान" खोल लेते हैं !नए नियम बना देते हैं  दूसरों को भी उसके ही बनाये नियमों पर चलने हेतु मजबूर कर देते हैं !
                     "राधा-स्वामी,निरंकारी और सच्चा-सौदा "जैसे आधुनिक पन्थों में लिखी अच्छी बातों को तो छोड़िये जी !ऐसे लोग तो वेद,शास्त्र,रामायण,गीताऔरश्री गुरु ग्रन्थ साहेब की सच्ची बानी का कहा भी नहीं मानते ! अपने ही बनाये नियमों का महत्व बताते हैं ! ऐसे लोगों ने तो सीधे नरकों में ही जाना है ना जी ! ऐसे लोगों को कौन बचा सकता है ??इसलिए आज हम एकांत में बैठकर सोचें , और जानने की कोशिश करें कि हम अपने "गुरु"जी को कितना जानते-पहचानते हैं और क्या हम उनका "कहा"मानते भी हैं ?? नहीं मानते तो मानना शुरू करो जी !! आज से ही !

                                





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आपका अपना - पीताम्बर दत्त शर्मा -(लेखक-विश्लेषक), मोबाईल नंबर - 9414657511 , सूरतगढ़,पिनकोड -335804 ,जिला श्री गंगानगर , राजस्थान ,भारत ! इस पर लिखे हुए लेख आपको मेरे पेज,ग्रुप्स और फेसबुक पर भी पढ़ने को मिल जायेंगे ! धन्यवाद ! आपका अपना - पीताम्बर दत्त शर्मा , ( लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511

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