Wednesday, September 2, 2015

" सन्देशे फिल्मों के - कितने समाज सुधारक साबित हो रहे हैं "?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. 9414657511

"भाटी ऑन छुट्टी ","जुगाड़","सारे जहाँ से महंगा हिंदुस्तान","तीन थे भाई","परफेक्ट-मिस-मैच","बिन्नी और बबलू","15. पार्क एवेन्यू " और "महारथी" आदि-आदि ये चंद ऐसी फिल्मों के नाम हैं जिन्होंने सौ,दो सौ,और तीन सौ करोड़ नहीं कमाए हैं और  ये फ़िल्में "क्वीन"की तरफ मशहूर या "ऑस्कर" में गयीं हैं ! लेकिन ये "बी और सी"ग्रेड की फ़िल्में अपने अंदर कई "अच्छे-बुरे"दोनों प्रकार के सन्देश छिपाए हुए हैं !इन्हें भी देखना चाहिए ! आजकल थियेटर में तो बहुत ही कम जाना होता है ! 
                                पूरी फिल्म भी एक बार में नहीं देखी जाती , क्योंकि समय का अभाव रहता है !पहले जैसा आनंद भी नहीं आ पाता ! मुझे याद है जब मेरी मौसी की लड़की "शोले"फिल्म देख कर आई थी , और लौटने के बाद जब तलक उसने हमें गब्बर सिंह के सारे डायलॉग उसी अंदाज़ में नहीं सुना दिए तब तलक उसे भी चैन नहीं आया था !हालांकि उसमे मनोरंजन ज्यादा और सन्देश कम था लेकिन एक इतिहास बना गयी थी शोले !
                      संतों के "सन्देश"इतने असर कारक नहीं होते जितने फिल्मों के सन्देश असरकारक होते हैं ! मेरे शिक्षक गुरु जी कहा करते थे कि छात्रों को "पहाड़े"याद नहीं होते लेकिन फिल्मों  गाने और पूरी स्टोरी याद हो जाती है ! केवल फ़िल्में ही नहीं बल्कि ज्यादातर हीरो-हीरोइनें भी दर्शकों के प्रेरणादायक बन जाते हैं ! उनके जैसा चलना,खाना-पीना,बाल-बनाना,कपडे पहनना  और बोलना युवाओं की आदतें बन जाती हैं ! ऐसा हर पीढ़ी के दर्शकों में होता आया है !  
                             फ़िल्में हमारे समाज के हर क्षेत्र पर कभी सीधे बात करती हैं तो कभी जबरदस्त "कटाक्ष" भी करती हैं ! "पी. से पी. एम." में तो नेताओं को पूंछ एवं मुखोटे लगाकर कुत्ते तक दर्शा दिया गया है ! एक नेता तो 15 मिनटों में 10 बार दल बदल लेता है ! और एक हमारे मोदी जी हैं जो नितीश-लालू और मुलायम के विचारधारा को तिलांजलि दे देने पर आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं !धर्म के प्रचार-प्रसार और उसकी बुराइयों को भी हमारी ये फ़िल्में इस प्रकार से दिखाती हैं की जिससे दर्शकों का मनोरंजन भी हो जाता है और पथ-प्रदर्शन भी हो जाता है ! आजकल तो एक आधुनिक संत श्रीमान राम-रहीम खान (इन्सां) ने जनता को "प्रवचन" देने की बजाये फिल्मों से ही अच्छे सन्देश देने शुरू कर दिए हैं !उनका ये तरीका कुछ हद तलक कामयाब भी हुआ है शायद इसीलिए उन्होंने "MSG2" भी बना डाली है जो प्रदर्शन हेतु तैयार है ! पहली फिल्म का प्रचार तो सिख संस्थाओं और मीडिया ने उनकी बुराई  था ! देखते हैं कि अब कि बार क्या होगा !??? अपुन तो "जय - श्री - राम "!! बोलकर ही काम चला लेंगे ! जी !
                         



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