प्रगतिवादी मुस्लिम की व्यथा .......!!प्रगतिवादी मुस्लिम की व्यथा




कट्टरता से भला भी हो सकता है बुरा भी, यदि कट्टरता सकारत्मक हो तो परिवेश बदल सकता है, नकारात्मक  हो तो विध्वंशक हो जाता है. 

बाबरी मस्जिद काण्ड नकारत्मक कट्टरता का ही एक नमूना है, उसका इतिहास चाहे जो भी रहा हो, भले ही वह हमारे धर्म से सम्बन्धित न रहा हो, लेकिन फिर भी वह हमारी धरोहर है, क्योकि भारत में है, हमारे देश में है और हिन्दू मुसलमान सबका है. लेकिन इसी तर्ज पे कट्टरवादी मुसलमान चार हाथ और आगे है, हाल में ही शांति के प्रतिक बुध्ध्द जी की प्रतिमा का लखनऊ में तोड़े जाना इसी  बात का प्रतिक है, मुसलमान दशको पहले बाबरी का रोना तो रोते हैं लेकिन ठीक वही काम वो आजतक करते आ रहे हैं. 

इन सब के पीछे क्या कारण है ? कुरआन ? क्योकि मुल्ले (मुसलमान नहीं ) हर बात पे ईश्वरीय वाणी का हवाला दे हर बात पे बरगलाते हैं. ये हर मुसलमान के मन में भर दिया जाता है की कुरआन ईश्वरीय वाणी है. सारी जड बस यहीं से शुरू होती है. 

जिस समय कुरआन की रचना हुयी उसका उद्देश्य बड़ा स्पष्ट था, मानव जाती को सुधारना न की बिगड़ना. इसी सोच के साथ उन्होंने कुरआन की रचना की. उन दिनों अरब में शिखर तक लुट मार और पापाचार फैला हुआ था, औरतो का बिकना, हत्या, लूटमार, वहां का लोकाचार था. जिससे मोहम्मद दुखी रहा करते थे, शायद  वो एक सदात्मा थे .. तब उन्होंने अरब वासियों को सुधारने के लिए कुरआन लिखा (लिखवाया). 

और अपने विचारो से सबको अवगत करने की सोची.लेकिन बदलाव किसको पसंद है ? लोगो ने विरोध किया, यहाँ तक की लोग मोहम्मद के दुश्मन भी हो गए, मोहम्मद भागे भागेफिरने लगे, फिर उन्हें एक उपाय सुझा, क्यों न इश्वर  का सहारा ले कर इनको इंसान बनाया जाए, कहते हैं न की हिम्मते मरदा मददे खुदा, फिर उन्होंने अपनी बातो को इश्वर वाणी बताई ताकि कम से लोग उनको सुने, यदि  मन मात्र के भले के लिए कोई झूठ बोले तो उसे पाप नहीं माना जा सकता.जिससे लोगो में बदलाव हुआ, लोग रस्ते पे आना शुरू हुए. उनको ये नहीं पता था की  मानव इतना नीच है की उनके जाने के बाद कालांतर में ये मानव अपने कुकर्मो का बिल भी उन्ही के नाम पे फाडेगा. बाद में स्वार्थी मुल्ले मौलवी मोहमद के नाम पर ही उल जलूल व्याख्या कर लोगो को कट्टर बनाने का काम शुरू किया सिर्फ अपने फायदे के लिए, बिना ये समझे की मोहम्मद ने इसको इश वाणी का नाम क्यों दिया. किसी भी चीज के दो पहलू होते है, इश्वर के नाम पे सुधार की शुरुवात मोहम्मद ने  की और बिगाड़ की शुरुवात इनके स्वार्थी अनुयायियों ने. 

कुरआन पढ़ने से स्पष्ट मालूम पड़ता  है की वो सिर्फ अरब वासियों को ध्यान में रख कर बनाया गया था. अब आप ही सोचिये यदि कुरआन भगवान्/परमेश्वर का होता तो सिर्फ अरब आधारित क्यों लिखा जता ?? सारे तथ्यों का आधार अरब ही क्यों होता ? या तो उसमे पूरी दुनिया के बन्दों को मुसलमान मानना चाहिए क्योकि इश्वर ने सारे दुनिया के हर इंसान, जीव को बनाया है.  लेकिन उसमे गैर मुसलमान का जिक्र क्यों ?? क्या बाकी भगवान् के पुत्र/या उनके बनाये नहीं है ? क्या इश्वर कभी ये कह सकता है की तुम मेरे बेटे हो और वो नहीं ? क्या इश्वर भी धर्मांध हो सकता है. हाँ  चाहे तो वो ये कह सकता था की अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान, बुरे मुसलमान अपने पे ईमान लाये, न की इश्वर "गैर मुसलमान" शब्द का प्रयोग करता. क्या इश्वर मानव को दो भागो में विभक्त करना चाहता था ?  भाई धर्म अच्छी चीज है, उसका उपयोग गलत और सही हो सकता है. धरम ग्रन्थ हमारे लिए हैं हम धर्म ग्रंथो के लिए नहीं,  ठीक वैसे ही जैसे ताला चाभी घर के लिए बनाया जाता है, किसी घर को ताला चाभी के लिए नहीं बनाया जाता, क्योकि यदि हम धर्म के नाम पर धर्मांध हो गए तो हमारा फायदा, मुल्ले/पंडित/ पादरी और इन सबके पिता जी - नेता लोग उठा ले जाते है..और हमारे दिमाग में भी ये बाते बस इसीलिए भरी जाती है की हम इनके लगाम में रहे है. 

कालांतर में कुरआन में गुपचुप तरीके से न जाने कितने बदलाव हुए लेकिन ये बाहर नहीं आने दिया जाता की हमने कुछ बदलाव किया है, वो बदलाव नकारात्मक है.इन मुल्लो की परेशानी ये थी कुरआन को पूरी तरह से बदल भी नहीं सकते थे, क्योकि कुरआन आते ही कुछ अच्छे आलिम लोगो के हाथ में भी पहुची, वो इन मुल्लो का पोल खोल देते, इसलिए इन मुल्लो ने बड़े सुनियोजित ढंग से कुरआन में चुपके चुपके बदलाव किया. कई पीदियो तक.... मेरी बात की सत्यता जाचना चाहते हैं तो कुरआन की ही कई लेखको द्वारा टीका पढ़िए, सबने अपने अपने हिसाब से टिका  लिखा है. ये हाल सिर्फ कुरआन के साथ ही नहीं बाकी सारे धर्म ग्रंथो के साथ भी है . तो जब बदलाव हो ही रहा है तो सकारत्मक क्यों न हो. क्यों हम इश्वर के पाँव में जंजीर जंजीर बाध् उनको भी अपने बुरे कामो में घसीटते रहे ? 

कुरआन बस एक साहित्य है, किसी के अपने निजी विचार, जो मानव मात्र के भलाई के लिए बनायीं गयी और असरदार ढंग से काम करे इसलिए इश्वर का सहारा लिया गया. इससे जादा और कुछ नहीं ये कोई इश्वर की किताब नहीं. अब मुसलमान भाई कहते हैं, की कुरआन जैसी एक आयत लाओ जो "डिफरेंट" हो. भाई हर लेखक  अपना विचार होता है. अब मई ये कहूँ की तुम प्रेमचंद्र जैसी जैसे कोई एक कहानी लाओ, बिलकुल डिफरेंट, माने लोचा , कुरआन जैसी भी हो और डिफरेंट भी हो. अजब दिल्लगी है भाई.

फिर कहते हैं हिन्दू को धर्म नहीं, रामायण या गीता में कहीं भी इस शब्द का कोई उपयोग नहीं. बिलकुल सत्य वचन. हमारे परिवेश के कारन  हमें हिन्दू कहा गया. और रामायण और गीता में हिन्दू या किसी धर्म का नाम न होना ही उसका बड़प्पन है. क्योकि ये साहित्य मानव मात्र के कल्याण  के लिए है न की किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए.और इसके विपरीत कुरआन में मुसलमान का जिक्र आया है क्योकि उस जगह की परिस्थितिया और अरब जगह मुसलमान ही थे. मोहम्मद साहब ने बस इस शब्द का उपयोग न कर "बुरे" या "अच्छा"  मानव का शब्द इजाद किया होता तो शायद ही आज कोई वैमनस्यता होती. मुसलमान भाई भी कहते है की कुरआन किसी धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बजाय इसके की यही सबसे उच्च धर्म है,और मुसलमान सबसे बेहतर है.

 हम बेहतर है" वाला ऐटीटयूट भी गलत नहीं है, बशर्ते इसी को कर्मो द्वरा पूरा किया जाये बजाय की दुसरे धर्मो और उनके प्रतीक चिन्हों पे आघात करना, जरा सोचिये किसी की भावनावो पे चोट कर क्या आप इश्वर को खुश कर सकते हैं ? जरा सोचिये दुनिया की तस्वीर क्या होगी जब "हम बेहतर है" दिखाने के लिए सारे धर्म वाले आपस में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बेहतर से बेहतर कार्य के लिए करे. मुसलमान कहे हम बेहतर है  हमने १० को सहारा दिया, हिन्दू कहे की नहीं भाई हम भी है, हमने भी ५ को सामर्थ्यनुसार तो सहारा दिया है, इसाई कहे की हम ३ का पालन पोषण करते है. बुराई तब आ जाती है जब हम बिना कुछ किये दुसरे को कहने लगते है की तुम खराब हो.

एक प्रगतिवादी मुसलमान भाई के दिल की कसक ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ :- 
एक बात जो इस्लाम में बहस का मुद्दा हो सकती है या कहुं की सरे मज़हब का सुधर कर सकती है की क्या कुरआन और शरियत के बहार जाया जा सकता है क्या आज के समय के हिसाब से चला जा सकता है , तो में यही कहूँगा ( चाहे इसके बाद मेरे खिलाफ फतवों की बारिश भी हो जाये ) हाँ बिलकुल जाना चाहिए , और ये मुहम्मद सल्लालाहू अ.व ने भी कहा था की जब किसी नतीजे पर न जा सको तो अपने दिमाग से काम लेना हो सकता है हर बात का जवाब कुरान या हदीस न दे पाए. एक समय जो इस्लाम का सुनहरा दौर कहा जाता है उस वक्त तब एक शब्द का ज्यादा इस्तेमाल होता था एवं उसे ‘इज्तीहाद कहा जाता था। इस शब्द का अर्थ है स्वतंत्र चिन्तन। व्यवहार में यह शब्द हर आदमी औरत को यह आज़ादी देता था कि वे महजबी सीखों को आज के दौर की कसौटी पर कसें एवं फिर उन पर अमल करें। किन्तु जैसे-जैसे मुस्लिम साम्राज्य स्पेन से बगदाद तक फैला मुफ्तियों ने इस सल्तनत की रक्षा के लिए स्वतंत्र चिन्तन के द्वार बन्द कर दिये। इस तर्क एवं चिन्तन का स्थान फतवों ने ले लिया एवं मुसलमानों को सिखाया गया कि वे खुद सोचने की जगह इन फतवों पर अमल करें। इस्लाम के वर्तमान युग की त्रासदी यही है कि मुसलमान अपने दिमाग में उठने वाले सवालों को खुले में उठाने से डरते हैं एवं मुल्ला मौलवियों द्वारा जो कुछ भी कहा जाता है उस पर अमल करते हैं। और यही सरे फसाद की जड़ है ,
मेरा सभी मुसलमान भाई और बहनों से निवेदन है की ज़रा इस बात पर ज़रूर गौर करें.

अगर हम अपने उलेमा, राजनीतिज्ञों एवं मुल्लावों की तकरीरों को सुने तो वे हमेशा पश्चिमी सभ्यता के खोट गिनाते दिखेंगे किन्तु वही मुल्ला एवं पालिटीशियन अपने बच्चों को अमेरिका के स्कूल एवं कॉलेजों में दाखिले के लिए जमीन आसमान एक किये रहते हैं। तमाम अमीर मुसलमान परिवार पश्चिम में छुट्टियाँ मनाते नजर आते हैं। यहाँ तक कि धन से भरपूर खाड़ी के देशों में भी वहाँ की अवाम अपने को सोने के पिंजरे में बन्द महसूस करती है। आखिर क्या वजह है कि इस्लाम रचनात्मकता, नई सोच और मानवाधिकारों का गला घोटने वाला मजहब बन गया है। पाकिस्तान १९४७ में वजूद में आया था लेकिन एक साल बाद जन्म लेने वाले इजराइल से कहीं पीछे रह गया है।इस्लाम के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस मजहब का जन्म अरब में हुआ जहाँ घुमन्तु रेगिस्तानी कबीले रहा करते थे। कबीलों की एक विशेष संस्कृति होती है। उनका अस्तित्व किसी शेख का हुकुम मानने पर निर्भर करता है। वहाँ मर्द राज करता है एवं औरत की कोई अहमियत नहीं होती।
आज भी अरब लोग खुद को असली मुसलमान और बाकी इस्लामी दुनिया को धर्मान्तरित मुसलमान समझते हैं। बाकी दुनिया के मुसलमान भी इसी अरबी मानसिकता को पालने एवं रीति रिवाजों की नकल करना चाहते हैं। मांजी का मत है कि मुस्लिम जगत पर औरतों की यह पकड़ दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशवाद है। इक्कीसवीं सदी में जरूरत इस बात की है कि दुनिया के बाकी मुसलमान अरबों की इस कबीलाई सोच एवं रीति रिवाजों से छुटकारा पायें।
आप अरबी मुसलमान नहीं हैं आप हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं और हमको चाहिए की जो रिवाज हमारे हैं अगर हम गोर करें तो कहीं भी इस्लाम के खिलाफ नहीं हैं बल्कि अरब मुल्कों से कहीं ज्यादा बेहतर हमारे मुल्क के रिवाज हैं हमको खुद को अपने मज़हबी दायरे में रहकर खुद में बदलाव लाना चाहिए जो आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है.
अगर किसी को मेरी बात से दुःख या टेस लगे तो माफ़ करना लेकिन हकीकत से मुहं छुपाना कायरता होती है.
                                                 कमल कुमार सिंह

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