" अडवाणी-सुषमा-जेटली ने दिखाई अपनी नेता गिरी "... देर आयद-दुरुस्त आयद ..!!??

  राजनाथ सिंह का शुमार बीजेपी के अनुभवी और तेज-तर्रार नेताओं में होता है। बेशक अध्यक्ष बनने के बाद उनके सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन उनकी संगठन क्षमता सवालों से परे रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके राजनाथ इससे पहले भी बीजेपी अध्यक्ष पद संभाल चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत है उनका मिलनसार व्यक्तित्व और बेदाग छवि। क्या-क्या है राजनाथ की ताकत आप भी जानें-
राजनाथ की ताकत

1. राजनाथ की छवि साफ-सुथरी है। उनके खिलाफ किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं। उनका राजनीतिक करियर अब तक बेदाग रहा है।वो पूरी तरह विवादों से मुक्त रहे हैं।
2. राजनाथ खुद को भाजपा के अलग-अलग गुटों से परे रखते हैं। यही वजह है कि उनके सभी के साथ अच्छे संबंध हैं।
3. राजनाथ कोई भी फैसला लेने से पहले आरआरएस से सलाह अवश्य लेते हैं। यानी आरएसएस का उन्हें पूरा वरदहस्त प्राप्त है।
4. राजनाथ अपनी गलतियों के लिए सहयोगियों से क्षमा मांगने में हिचकिचाते नहीं हैं। यानी उनमें अहम की भावना नहीं है।
5. राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से आते हैं जहां लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं। यूपी की जनता उन्हें जानती और पहचानती है।
6. राजनाथ यूपी के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में वो राज्य की राजनीति से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। ये अनुभव लोकसभा चुनाव में उनके काम आ सकता है।
7. राजनाथ हिंदी भाषी हैं, अच्छा बोलते हैं और भाषण देने की कला में पारंगत हैं।
8. राजनाथ राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं और इसकी बारीकियों पर ध्यान देते हुए आगे का रास्ता तय करते हैं।
9. दूसरे कई नेताओं की तरह राजनाथ की जुबान फिसलती नहीं है। उनके बयानों पर विवाद नहीं होता। धीर-गंभीर छवि उनके व्यक्तित्व से मेल खाती है।
10. राजनाथ संघ के करीबी हैं और बीजेपी में सभी बड़े नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं।


 राजनाथ सिंह जी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने पर हार्दिक बधाई, उम्मीद है आपकी अध्यक्षता मे भाजपा भारत के साथ-साथ उत्तर प्रदेश मे भी पुनः जनता मे खोया विश्वास जगा पायेगी
जय हिंद
जय मां भारती
वन्दे मातरम
 क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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Comments

  1. भूतकाल में कुछ वजहों से भले ही श्री लाल कृष्ण आडवानी को मैं उतना पसंद न करता हूँ, किन्तु पिछले कुछ समय़ से इस नेता के प्रति मेरे दिल में एक सम्मान उम्डा है। उसकी भी वजहें है। अगर आप याद करे, तो यह पहले ऐसे राजनीतिक नेता थे जिन्होंने 2005 में ही यह कह दिया था कि अपने मन मोहन सिंह जी एक प्रधानमंत्री रूपी सामग्री लायक इन्सान नहीं है। उस वक्त भले ही सबके सबने , यहाँ तक खुद मन मोहन सिंह जी ने उन्हें भला-बुरा कहा था लेकिन आज सच्चाई सबके सामने है, और आज हर किसी की जुबाँ पर वही उदगार है जो आज से सात साल पहले आडवानी जी कह गए।

    अभी जिस तरह अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने आरएसएस की हठधर्मिता के समक्ष जिस दृडता का परिचय दिया उसकी जितनी सराहन की जाए वह कम है। हालांकि राजनाथ सिंह जी का पिछला कार्यकाल बहुत सफल नहीं ठहराया जा सकता किन्तु बदलाव जरूरी था, हर लिहाज से। मुझे जो सबसे ज्यादा जो एक बात ने क्षुब्द किया वह था आरएसएस का पूर्व अध्यक्ष गडकरी के प्रति ढुलमुल रवैया। इस संगठन से वैमनुष्यता रखने वाले भले ही इसे एक आतंकवादी संगठन कहते हो और जोकि गलत है , किन्तु इतना तो मैंने भी महसूस किया कि ( बड़े अफ़सोस के साथ लिख रहा हूँ ) कि यह एक साम्प्रदायिक संगठन है , जिसमे क्षेत्रवाद कूट-कूटकर भरा है। और जो लोग वाकई इसे एक वृहत परिदृश्य में हिन्दुओं का संरक्षक और एक सामाजिक संस्था के तौर पर इसकी साख पुन: स्थापित करने के इच्छुक है उन्हें यह मराठी फैक्टर, जो कुछ समय से इसके कार्य-कलापों में साफ़ परिलक्षित हो रहा है , उसको कमजोर करने की सख्त जरुरत है, वरना यह संभव है कि इस संस्था का आन्दोलन आगे चलकर अपनी प्रासंगिकता ही खो बैठे ।

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