बोला रे - बोला रे ,बोला रे बोला .."हमारा मनमोहन " !!

सभी मौनी बाबा टाईप मित्रों को मेरा बोल कर नमस्कार !! कृपया स्वीकार करें जी !!
                         मित्रो , कोई ज्यादा बोलता है , कोई बहुत ज्यादा बोलता है , कोई कम बोलता है तो कोई बहुत ही कम बोलते हैं यंहा तक की बोलने के पैसे भी लेते हैं । हम आज यंहा चर्चा कर रहे हैं हमारे प्रिय और इमानदार प्रधान मंत्री सरदार मनमोहन सिंह जी की जो कल बहुत दिनों के बाद बोले की " हे अफसर लोगो खुलकर प्रशासनिक निर्णय लो किसी कार्यवाही से डरने की जरूरत नहीं है ।" उनके इस ब्यान से एक दिन पहले उनके ही एक सलाहकार श्री कौशिक बासु जी ने जब ये भेद खोले की सरकार की गाडी रुक चुकी है और अब ये २०१४ से पहले नहीं चल सकती । उनका इतना कहना हुआ और देश में जैसे एक तूफ़ान आ गया हो ...की ये क्या हो गया .....फिर लगे दुसरे ब्यान आने ....कोई बोला की ये उनकी अपनी राय है तो कोई बोला की उन्ही से पूछो जिन्होंने ये सब बोला है ...आदि आदि !! 
                                हमारे प्रिय प्रधान मंत्री जी , १५ अगस्त , २६ जनवरी और संसद में ही कभी कभी बोलते हैं उसके इलावा हमने तो उन्हें बोलते देखा नहीं ...क्या आपने देखा है पाठको ..!! इनसे पहले जो हमारे कांग्रेसी प्रधान मंत्री श्री नरसिम्हा राव जी हुआ करते थे वो भी " मौनी - बाबा ' के नाम से मशहूर थे ! जब - जब उनको हाई कमांड निर्देश देता था तभी वो बोल पाते थे ...ऐसे ही सवाल हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री जी पर भी उठते रहते हैं !! इतने घोटाले होगये ...इतने अपराध हो गए , इतनी योजनाओं का पैसा लोग खा गए लेकिन इनका मुख किसी के भी खिलाफ नहीं खुला ....और जब खुला तो करम चारियों से भी बोले की तुम भी खुल कर खेलो ...आज तक किसी नेता को कुछ हुआ है जो तुम अफसरों को होगा ....??                                     देखने में भी यही आया है की ये अफसर लोग ही नेताओं को तरह - तरह के सुझाव देते हैं सरकारी धन के "सदुपयोग "का  और फंसते फिर बेचारे नेता ही हैं जी । क्या आपने कभी किसी बड़े सक्रेत्री स्तर के कर्मचारी को कभी देखा है किसी निर्णय पर सज़ा पाते हुए ....नहीं ना !! उस समय हम सब इन बेचारे नेताओं के पीछे पड़ जाते हैं  । ये नेता तो एक दम से चुनाव जीत कर विधायक या सांसद बन जाते हैं ..इन बेचारों को तो पता ही नहीं होता की किस प्रकार से सरकारी काम काज होता है ?  ये बेचारे तो दो या तीन कार्यकालों के बाद जाकर कंही परिपक्व हो पाते हैं उस से पहले तो ये संसद के पीछे वाले बेंचों पर बैठकर " ज्ञान " प्राप्त करते हैं ...जैसे भाजपा के विधायक करते पकडे गए थे ..??
                                     क्या इतना मजबूर प्रधान मंत्री  देश का होना चाहिए , अगर ये राजनितिक गठबन्धनों के कारण से मजबूरी होती है तो क्यों राजनितिक दल करते हैं गठबंधन ..?? एक बार अगर दोबारा चुनाव हो जाएँ अधरे बहुमत के फ़ौरन बाद तो आगे से जनता भी समझ जायेगी की एक ही पार्टी को बहुमत देना है ...!! तो एक बार फिर " गेंद " जनता के पाले में ही आ गयी है जी ... छोड़ो दूसरों पर आरोप लगाने ....करो स्वयं निर्णय ...की हम आज के बात किसी भी बुरे नेता और अफसर को देखेंगे नहीं .... सुनेंगे नहीं ....और उनके साथ बोलेंगे भी नहीं ...!! जो नेता हमें पसंद नहीं उसका हम स्वागत भी नहीं करेंगे और उसे वोट भी नहीं देंगे चाहे वो हमारे धर्म , जाती और इलाके का ही क्यों ना हो ? इसी तरह अब हम किसी एक राजनितिक दल से भी बांध कर ना रहें क्योंकि पहले इन राजनितिक दलों के प्रदेशिक और केंद्रीय नेताओं का स्तर बहुत ऊंचा हुआ करता था , लेकिन अब लगभग सभी दलों के नेता अपना विश्वास खो चुके है अपने निर्णयों के कारण तो हम क्यों उनका भार अपने सर पर उठाये फिरें ..??


                  क्या विचार है मित्रो आपका इस बारे में  , कृपया अवश्य अपने अनमोल विचारों से हमें अवगत करवाएं चाहे विचार हमारे साथ मिलते हों या नहीं लेकिन व्यक्त अवश्य करें क्योंकि हम आपके ये अनमोल विचार अपने ब्लॉग पर सहेज कर रखना चाहते हैं ...जिसका नाम है " 5th pillar corrouption killer " आज ही लाग आन करें  www.pitamberduttsharma.blogspot.com.  आप  चाहें  तो  हमारे ब्लाग के लेख कंही प्रकाशित भी कर सकते हैं । आपके सहयोग हेतु कोटि - कोटि धन्यवाद !!

Comments

  1. नेता भी रिसर्च करके मैदान में उतरते है ....जब तक हमारा देश आर्थिक स्वलाम्बीत नहीं बन जाता ...तब तक लोग फायदा उठाते रहेंगे ....लोग अपनी ताकत अपने नेता में ढूढ़ते है ....नेता उन्ही को चूसकर मजबूत होते है .

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